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संस्कृति

लोकनृत्य राजस्थान

डॉ. द्वारका प्रसाद वर्मा

राजस्थान कई मायनों में देश के दूसरे इलाकों की तुलना में कुछ अलग-सा और अनूठा है। बात चाहे भूगोल या इतिहास की हो, चाहे शक्ति और भक्ति की हो अथवा फिर कला या संस्कृति की हो -- लोकरंगों की जितनी विविधता यहां देखने को मिलती है, शायद ही कहीं और मिले। राजस्थानी लोकनृत्यों की भी ऐसी ही समृद्ध परम्परा है।

लोक में प्रचलित इस अकूत साझी संपदा का संरक्षण करना, उसमें साझेदारी निभाना बहुत ज़रूरी है। यह लोक ही हमारी मौखिक और श्रुत-परम्पराओं का प्राचीन और महत्वपूर्ण माध्यम रहा है। कहने, सुनने और देखने की परम्पराएं इंद्रिय-गोचर हैं। जो कुछ देखा, सुना, छुआ, सूंघा और चखा जा सकता है, वह सब कुछ इस लोक में ही समाहित है।

इन लोक-परम्पराओं का अहम पहलू है सम्प्रेषण। यह सम्प्रेषण सिर्फ भाषा का ही नहीं, हाव-भाव का, इशारे का, चेष्टा और नकल का, हंसी और रुदन का तथा मौन और मदद का भी होता है। भाषा से पहले तो संप्रेषण का माध्यम संकेत ही था, जो इंसान के साथ आदिम काल से ही चला आया है। ऐसे अनेक माध्यमों में नृत्य इस प्राचीन परम्परा का सशक्त और कलात्मक माध्यम है। आज भी हमारी साझी अमूल्य और सामूहिक विरासत के रूप में देशभर में ये नृत्य शिद्दत के साथ मौजूद हैं।

लोकनृत्य समूह की रचनाएं हैं और समूह की भागीदारी ही इनका उद्देश्य है। सामुदायिक रूप में ही ये फलते-फूलते हैं और अभिव्यक्ति भी समूह में ही पाते हैं। समूह में ही हर व्यक्ति नृत्य रचता रहता है। कोई भी व्यक्ति, समुदाय या कबीला ऐसा नहीं है कि जहां नाच-गाना न हो। लोकनृत्यों में यों तो महिलाएं और पुरुष मिल-जुलकर अपनी साझेदारी निभाते हैं, बावजूद इसके कहना पड़ेगा कि इस साझी विरासत को महिलाओं ने ही संभालकर रखा है। लोकनृत्यों की सुंदरता, विविधता और निरंतरता को वहन करने में महिलाएं पुरुषों से कहीं दो कदम आगे ही हैं।

राजस्थान में प्रचलित लोकनृत्यों की विविधता का अंदाज़ इस बात से ही लगाया जा सकता है कि वहां सिर्फ महिलाओं और पुरुषों के ही नृत्य नहीं हैं, बल्कि बच्चों, किशोर-किशोरियों और जवान लड़कियों के लिए भी अलग-अलग नृत्य हैं। छोटे बच्चों के नाच का नाम है ‘खोदा’, जबकि किशोरावस्था के लिए है ‘छमछड़ी’। इसके अलावा जवान, लेकिन कुंवारी लड़कियों का बड़ा ही सधा हुआ और बिजली को भी मात देने वाला चक्करदार नृत्य है। ‘चकरी’ परम्परा में इसका नाम ‘राई’ था, लेकिन घाघरे की तेज गति व घूमती-इठलाती चकरियों के कारण इसे ‘चकरी’ कहा जाने लगा।

इतिहासपरक नृत्यों की पृष्ठभूमि में कोई घटना विशेष या कोई पुराना प्रसंग जुड़ा होता है। पुरानी घटना या किसी नायक विशेष को याद करते हुए ये नृत्य अपने हाव-भाव, पहनावे और अंग-संचालन से वीरता और बहादुरी के भाव व्यक्त करते हैं। ऐसे नृत्यों में इतिहास भी जीवंत हो उठता है। ‘आंगी-बांगी’, ‘मांडल का नार’ (शेर), ‘तलवारों की गैर’, तथा ‘घुड़ला’ नामक ऐसे ही लोकनृत्य हैं, जिनमें ऐतिहासिक प्रसंगों अथवा नायकों को फिर से प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया जाता है।

राजस्थानी लोकनृत्यों में मान-मनोवल के नृत्य हैं, तो उलाहनों-शिकायतों वाले नृत्य भी हैं। जुलूस और सवारी वाले नृत्यों की तो छटा ही निराली है। मेले-ठेले और उत्सव-पर्व वाले नृत्यों का तेवर ही अलग है। यहां शिकार नृत्य हैं, तो नुगरी-सुगरी आत्माओं को प्रसन्न करने वाले नृत्य भी हैं। आदमी को सम्मोहित कर मज़बूर करने वाले नृत्य हैं, तो करिश्मा और कौतुक दिखाने वाले अजूबे नृत्य भी यहां हैं। फसलों से जुड़े लोकनृत्यों की बहार भी यहां कम नहीं है, तो कठपुतली-नृत्यों की तो कोई सीमा ही नहीं है।

गीत-नृत्य, गाथा-नृत्य, नाट्य-नृत्य आदि अनेक रूपों में ये लोकनृत्य हमारी अनुपम विरासत हैं। इनमें से बहुत से नृत्यों की पहचान अथवा बनावट सीमावर्ती प्रदेशों का असर लिए हुए है। राजस्थानी नृत्यों में ‘बम’, ‘डांग’, ‘रसिया’ आदि पर ब्रज-संस्कृति की गहरी छाप है, तो ‘भवाई’ जैसा नृत्य गुजरात का नया ही रंग भर देता है। जसनाथी सिद्धों का ‘अग्नि’, रावलों का ‘खेड़ा’, कामड़ों का ‘तेराताली’ आदि लोकनृत्य अपने नजदीकी अंचलों से साझेदारी निभाते हुए इस कला को विस्तार देते हैं।

गेरू, रासतुड़ा, भणात, कीलियो-बोरियो जैसे नृत्यों को श्रम-नृत्य कहा जा सकता है। कठिन से कठिन काम करते हुए भी इनके सहारे आदमी खुद को हलका महसूस करता है। ये नृत्य श्रम को मनोरंजक बना देते हैं।

लोकनृत्यों की एक शाखा घूमंतु जीवन जीने वाले नट और कालबेलियों के नृत्यों की हैं। ये लोग जन्मजात कलाकार होते हैं और राजस्थान के अलावा दूसरे प्रदेशों में अपने नृत्य-प्रदर्शन से रोजी-रोटी कमाते हैं। चौमासे के चार महीनों को छोड़कर बाकी समय में अपने डेरों के साथ ये खानाबदोश लोग दूसरी जगहों के लिए निकल पड़ते हैं। अलवर जिले के कोई तेरह सौ नट-परिवार इसी तरह सैंकड़ों बरसों से यायावरी जीवन के अभ्यासी बने हुए हैं। इन परिवारों की जवान बहू-बेटियां हरियाणा, पंजाब, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि जगहों में जाकर शादी-ब्याह या दूसरे उत्सवों पर अपनी कला का प्रदर्शन करती हैं। यहां सबके अपने-अपने यजमान और इलाके बंटे हुए हैं, जहां से ये ‘नेग’ पाते हैं। इस प्रकार के डेरा-नृत्य भारत से बाहर भी हैं, जहां वर्षों पूर्व घूमते-घामते कलाकार वहां पहुंचकर डेरों के रूप में बस गये।

शास्त्रीय कलाओं की तरह लोकनृत्य किसी घराने के मोहताज नहीं हैं। ये अपने-आप में ही एक विशाल घराना है। अनेक शास्त्रीय कलाएं अपने मूल में लोक की धरोहर रही हैं। लोक कलाओं के विभिन्न रूपों से ही शास्त्रीय या शिष्ट कलाएं पैदा हुई हैं। लोक की पकड़ से ढीले होकर ये कला रूप शास्त्र के अंग बन गये। यदि शास्त्रीय नृत्यों की ही बात की जाए, तो देश भर में ऐसे कितने नृत्य हैं? संख्या के हिसाब से इनकी लोकनृत्यों से तुलना करना बेमानी ही होगी। शास्त्रीय नृत्यों में भरतनाट्यम, कत्थक, ओडिसी, मणिपुरी, कुचिपुड़ी, मोहिनीअट्टम आदि-आदि हैं। कत्थक नृत्य के नाम से ही पता लगता है कि कहने की मौखिक परम्परा यानी लोकगाथाओं की परम्परा से ही यह नृत्य निकला होगा। इसी प्रकार मणिपुरी (मणिपुर), ओडिसी (उड़ीसा), मोहनीअट्टम (केरल) आदि नृत्यों की ध्वनि से इनकी स्थानिकता की उपज का संकेत मिल जाता है। हमारे उस्तादी संगीत में भी ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जहां रागों के नाम ही इलाके विशेष के साथ जुड़े हुए हैं। राग जौनपुरी (जौनपुर), राग मुल्तानी (मुल्तान), राग सोरठ (सौराष्ट्र), राग मालव (मालवा) आदि अनेक राग हैं जो अपने-अपने लोक संगीत से रस खींचकर शास्त्रा की दुनिया में प्रतिष्ठित हैं।

लोक के साथ शास्त्र की साझेदारी की इस लम्बी परम्परा में कुछ अपवाद भी हैं, जो लोक और शास्त्र के क्रम को उलट-पुलट देते हैं। राजस्थान में ‘गवरी’ नामक लोकनृत्य का इतिहास इस दृष्टि से अजीबोगरीब ही कहा जायेगा। तीसरी-चौथी सदी में उदयपुर के पास उबेश्वर मंदिर का माहौल संगीत और नृत्यमय था। गौरी-तांडव नामक शास्त्रीय नृत्य कालांतर में ‘गवरी’ नाम से भील आदिवासियों की जिंदगी का कैसे हिस्सा बन गया? इस बारे में भीलों में बड़ा दिलचस्प मिथक प्रचलित है कि किसी समय पंडितों ने यह नृत्य सवा रुपये में उनके यहां गिरवी रख दिया था, जिसे वे आज तक वापस नहीं छुड़ा सके।

आधुनिक विज्ञान और टेक्नोलॉजी के असर से कुछ लोकनृत्यों की संरचनाओं में बदलाव भी आया है। कुछ की पहचान धूमिल हुई है तो कुछ लोकनृत्य अंतर्राष्ट्रीय स्तर की ख्याति भी पा गये हैं। कुछ ऐसे भी लोकनृत्य हैं जिनका परम्परागत नाम ही बदल कर दूसरा हो गया है। लोकनृत्यों की इस विपुल और प्राचीन विरासत को लोक ने अपनी साधना और लगन के बल पर लोकजीवन में, मनुष्य के जीवन में उसका एक अंग बनाकर प्रतिष्ठित कर दिया है। ये लोकनृत्य मनोरंजन करने वाली कोरी कलाबाज़ी नहीं हैं, बल्कि ये इतिहास, संस्कृति, कला, दर्शन और कुल मिलाकर जीवनधर्मिता के वाहक हैं। ये लोकनृत्य हम सभी के हैं।

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