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साँची कहौ तौ मारन धावै

अफ्रीका और आतंकवाद

खुर्शीद अनवर


हम दक्षिण एशिया के लोग कुछ मुद्दों पर अपने दायरे में सीमित रह कर तमाम समस्याओं को सिर्फ उपमहाद्वीप के संदर्भ में देखते हैं। आतंकवाद का मसला हो तो कहना ही क्या! पड़ोसी है पाकिस्तान।

सब कुछ वहीं तक सीमित कर देना और उसे ही केंद्र मान लेना हितकर भी लगता है और अक्सर चटपटा भी। वहाबी आतंकवाद और उससे जुड़े तार हम सिर्फ  पाकिस्तान और अफगानिस्तान तक देखने के आदी हो गए हैं। जरा इसे व्यापक पैमाने पर देखा जाए तभी इसकी भयावहता का अंदाजा बेहतर ढंग से लगाया जा सकता है। आतंकवाद और इसके केंद्र सऊदी अरब के जाल अल-कायदा के जरिए कहां तक फैले हैं इसका जायजा अफ्रीका के संदर्भ में भी लेना होगा। एक नजर वहाबी आंदोलन, अल-कायदा, सऊदी अरब और अफ्रीका में चल रही गतिविधियों के मद््देनजर।

वर्ष 2007 में माली के गॉउ शहर में भीषण आतंकवादी हमले के बाद सोमालिया के आतंकवादी संगठन अल-शबाब ने संगीत और नृत्य पर पाबंदी घोषित करते हुए इस पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने की घोषणा की। जगजाहिर है कि अल-शबाब सोमालिया में अल-कायदा के सहयोगी संगठन के बतौर सक्रिय है। अल-शबाब के आतंकवादियों ने युगांडा में 11 जुलाई 2010 को छिहत्तर लोगों की सिर्फ इसलिए हत्या कर दी कि युगांडा सरकार ने सोमालिया में आतंकवादियों से लड़ने के लिए अपने सैनिक भेजने का फैसला लिया था। अक्तूबर 2011 से लेकर मार्च 2013 तक अल-शबाब ने केन्या में इसी मुद््दे को लेकर बम विस्फोट किए और सैकड़ों जानें ले लीं। केन्या में हाल में ही, 21 सितंबर को भयावह हमले करके लगभग अस्सी लोगों को मौत के घाट उतार दिया।

अल-शबाब के अलावा अफ्रीका में बोको हराम नाम से एक खतरनाक आतंकवादी संगठन लगातार सक्रिय है और यह भी अल-कायदा समर्थित है। हाल में ही इसने नाइजीरिया में उनतीस मासूम छात्रों और एक अध्यापक की हत्या कर दी। ये हत्याएं जो 29 सितंबर को हुर्इं, बोको हराम की नाइजीरिया में चल रही लगातार बमबारी की ही कड़ी थीं। 25 और 26 सितंबर को नाइजीरिया के फुलातारी और कानूनगरी इलाके में ऐसे ही हमलों में लगभग तीस लोगों की जान गई। बोको हराम का नेतृत्व अबू बकर शेकू अल-कायदा का एक खतरनाक वहाबी दरिंदा है जिसने इन हमलों के बाद एलान किया जो एक वीडियो के रूप में वितरित किया गया।

इस वीडियो में अबू बकर शेकू ने एलान किया कि ‘दुनिया जान ले कि मैं अल्लाह के अलावा किसी के हाथों नहीं मर सकता। मुझे रोकने की कोशिश न की जाए, मैं रुक नहीं सकता। यह युद्ध उससे ज्यादा खतरनाक है जितना कि तुम सोचते हो, यह युद्ध तुम्हें निगल जाएगा।’ आगे यही खतरनाक आतंकवादी जो कहता है उससे अल-कायदा के इरादे साफ हो जाते हैं। ‘मैं अल्लाह की कसम खाकर कहता हूं कि नाइजीरिया में लोकतंत्र को जीवित नहीं रहने दूंगा। हम इसके खिलाफ जंग छेड़ रहे हैं और इसे हरा कर छोड़ेंगे। लोगों की सरकार, लोगों द्वारा सरकार और लोगों के लिए सरकार जैसी अवधारणा जल्द खत्म हो जाएगी और अल्लाह की सरकार और अल्लाह के लिए सरकार कायम होगी।’

साफ है कि अल-कायदा और उसके सहयोगी संगठन इंसानी खून को पानी की तरह बहा रहे हैं। पाना प्रेस, नाइजीरिया के अनुसार 2009 से लेकर अब तक बोको हराम ने लगभग छत्तीस सौ हत्याएं की हैं और स्कूल, चर्च, मस्जिद, बाजार सहित अनेक सार्वजनिक स्थलों पर हमले किए हैं। हालांकि नाइजीरिया की सेना इनके खिलाफ जंग छेड़े हुए है लेकिन इनकी गतिविधियां रुकने का नाम नहीं लेतीं।

बोको हराम और अल-शबाब की गतिविधियां स्वत:स्फूर्त नहीं हैं। मशहूर सोमाली विद्वान अब्दुल गेल्लाह लिखते हैं कि 1991 में सोमालिया के राष्ट्र के रूप में बिखरने के साथ ही आम लोग सहारे की तलाश में भटकते रहे। और इसी समय ‘चरमपंथ के लिए धन’ की मुहिम शुरू हुई जिससे बेरोजगार, भूखे सोमाली नौजवान आकर्षित होने लगे।

इन्हें चाहिए था पेटभर भोजन और सुकून और इसी का फायदा उठाया वहाबी इस्लाम ने। सोमालिया के पूरे गृहयुद्ध के दौरान सऊदी अरब ने कभी भी अपेक्षया शांत उत्तरी सोमालिया की तरफ किसी तरह की सुरक्षा या सहायता का हाथ नहीं बढ़ाया, जबकि दक्षिण सोमालिया की तरफ जहाजों में लद-लद कर वहाबी साहित्य और सामग्री पहुंचती रही। नतीजे के तौर पर दक्षिणी सोमालिया में अल-शबाब और उसके जरिए पूरे अफ्रीका में बाद के दिनों में बोको हराम को मजबूती मिलती रही।

सोमालिया जो मुख्यत: सूफी परंपरा का अनुयायी रहा है, वहां सऊदी हस्तक्षेप ने वहाबियत का जहर भर दिया। अब्दुल गेल्लाह ने अल-शबाब से लड़ने वाले एक सैनिक का हवाला देते हुए लिखा कि किस तरह इसमें सऊदी अरब की पूरी तरह से मदद अमेरिका करता रहा है।

‘सऊदी अरब को बहरीन से जोड़ने वाले पुल से कुछ किलोमीटर की दूरी पर तैनात अमेरिका का पांचवां बेड़ा आंखें बंद कर लेता है जब वहाबी अतिवाद से संबंधित सामग्री सोमालिया सहित अन्य अफ्रीकी देशों में भेजी जाती है और दूसरी तरफ अमेरिका जिभूती के आसपास के इलाकों में नवयुवक अफ्रीकियों को गिरफ्तार करके उन्हें यातनाएं देता है जिनका आतंकवाद से कोई लेना-देना नहीं।’

आइए जरा अफ्रीका में इन गतिविधियों के लिए खर्च होने वाले धन के स्रोत की तरफ नजर डालें। 1980 के दशक से मजबूती पकड़ने वाले वहाबी आंदोलन को सऊदी अरब, अमेरिकी देखरेख में लगातार तमाम तरह की सहायता पहुंचाता रहा है जिसमें धन के अलावा खतरनाक हथियार भी शामिल हैं। पिछले साल 23 मई को ‘रायटर’ ने लिखा किया कि यमन जो वहाबी गतिविधियों का केंद्र बन चुका है, वहां से दुनिया भर में अल-कायदा के लिए धन और हथियार मुहैया कराया जा रहा है। सऊदी अरब से धन पाकर वहाबी इमाम पूरे अफ्रीका में वहाबी विचारधारा और अल-कायदा की गतिविधियां फैला रहे हैं।

वर्ष 2003 में अमेरिकी सीनेट समिति ने खुद स्वीकार किया था कि पिछले बीस वर्षों में सऊदी अरब ने वहाबियत के प्रचार और प्रसार के लिए 87 अरब डॉलर खर्च किए हैं। इनमें 210 इस्लामी केंद्र, 1500 मस्जिदें, 202 कॉलेज और 2000 मजहबी मदरसे तैयार किए जाना शामिल है। इसी अनुमान के अनुसार सऊदी अरब वहाबी मिशन के लिए प्रतिवर्ष तीन अरब डॉलर खर्च करता है। डेविड मैक कॉरमैक ने ‘एन अफ्रीकन वोर्टेक्स: इस्लामिज्म इन सब-सहारन अफ्रीका’ में लिखा कि अफ्रीका में वहाबी विचारधारा फैलाने का रियाद (सऊदी अरब) का तरीका है गैर-सरकारी संगठनों के द्वारा काम करना।

इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण संगठन मुसलिम वर्ल्ड लीग है। इसे सऊदी सरकार ने तैयार किया और इसकी देखरेख की। मुसलिम वर्ल्ड लीग के महासचिव डॉ अब्दुल्ला अल तुर्की (जो सऊदी अरब के इस्लामी कार्यकलाप के मंत्री रह चुके हैं) के द्वारा लीग का 99 प्रतिशत धन सऊदी अरब से लीग दफ्तर तक पहुंचता है। 1972 में एक और सऊदी ‘स्वतंत्र संस्था’ द वर्ल्ड एसेंबली आॅफ मुसलिम यूथ तैयार हुई। इस संगठन को अफ्रीकी नवयुवकों के बीच वहाबी विचारधारा फैलाने का काम दिया गया। इसके महासचिव शेख साल्हे बिन अब्दुल अजीज ने फौरन सब-सहारा अफ्रीका में लगभग पचास मस्जिदें बनवार्इं जिनमें वहाबी इमाम बिठाए गए। इसके लिए सारा धन सऊदी अरब से ही आया।

वर्ष 1974 से सऊदी फंड फॉर डेवलपमेंट के नाम से अफ्रीका और एशिया में परियोजनाएं तैयार हुर्इं। सिर्फ सब-सहारा अफ्रीकी देशों में 1975 से लेकर 2002 तक 1.9 अरब डॉलर सऊदी अरब के जरिए पहुंचे। यह सारा का सारा धन इस्लाम फैलाने के नाम पर वहाबियत फैलाने का काम करता रहा है। इसके अलावा गिनी में किंग फैजल मस्जिद के लिए 2.13 करोड़ डॉलर और इसी नाम से चाड में मस्जिद के लिए 1.6 करोड़ डॉलर, माली में 67 लाख डॉलर और कैमरून में 51 लाख डॉलर पहुंचाए गए और हर जगह सऊदी अरब से मान्यता प्राप्त इमाम बिठाए गए जो वहाबियत को फैलाने का काम करते रहे।

अचरज नहीं कि इस धन का एक बड़ा हिस्सा आतंकवादियों के पास पहुंचता है, जिनका रिश्ता अल-कायदा समर्थित समूहों से है। सोमालिया स्थित सऊदी अरब के अल-हरामैन चैरिटी का सीधा रिश्ता अल-इत्तेहाद-ए-इस्लामिया से है जो कि अफ्रीका में अल-कायदा का ही एक समूह है। सऊदी अरब, अमेरिका, अल-कायदा और इनके सहयोगी संगठनों की अफ्रीकी देशों में इन खतरनाक गतिविधियों के लिए इतनी बड़ी मात्रा में धन ऐसे इस्लाम के नाम पर खर्च किया जाता है जो इस्लाम है ही नहीं। वहाबी इस्लाम, इस्लाम का एक खतरनाक दुश्मन है जो केवल इस्लाम के लिए नहीं, सारी मानवता के लिए खतरा बन चुका है। इन्होंने दक्षिण एशिया में पाकिस्तान और अफ्रीका में सोमालिया को अपनी गतिविधियों का केंद्र बना रखा है। सोमालिया जो लगभग ढाई दशक से अफरातफरी की स्थिति में है और गृहयुद्ध से उबर नहीं पा रहा है, वहां नवयुवकों को लालच देकर बंदूक पकड़ा देना और धीरे-धीरे उनके दिमाग में वहाबियत का जहर भर कर उन्हें कट््टर आतंकवादी बना देना कोई मुश्किल काम नहीं।

बोको हराम, अल-शबाब और हाल ही में बने संगठन अंसार-उल-दीन ने ऐसी स्थिति का भरपूर फायदा उठाया और अफ्रीका के सूफी इस्लाम को वहाबियत की तलवार पकड़ा दी। सऊदी अरब से आने वाले धन से पाकिस्तान में छपकर वहाबी सामग्री अरब के दूरदराज देशों में पहुंचाई जाती है और मस्जिदों, मदरसों और अन्य इस्लामी (वहाबी इस्लाम) संस्थाओं के जरिए आम इंसानों में वहाबियत के बीज बोए जाते हैं और जो इसे न स्वीकारे उसे मौत स्वीकारना पड़ता है।

यह सारा खेल जिस समय सऊदी अरब की देखरेख में अल-कायदा और उसके सहयोगी संगठन कर रहे हैं, उसी समय दो सभ्यताओं के टकराव और आतंकवाद के खिलाफ तथाकथित जंग का एलान करने वाले देश अमेरिका द्वारा इन्हें किस तरह का समर्थन हासिल है, इसका उल्लेख ऊपर किया जा चुका है। अगर खुले तौर पर न सही तो भी मूकदर्शक के रूप में सारी गतिविधियों को होने देना भी आतंकवाद का ही समर्थन है। वरना 2003 की सीनेट की रिपोर्ट के बाद अमेरिका ने अफ्रीका में आज तक कोई ऐसा हस्तक्षेप क्यों नहीं किया जिससे इन गतिविधियों पर रोक लगाई जा सके।

इस संदर्भ में एक आखिरी बात यह है कि सऊदी अरब क्या सिर्फ पेट्रोल के पैसे आने के दम पर इन आतंकवादी गतिविधियों को समर्थन दे रहा है? सऊदी अरब की सालाना राष्ट्रीय आय का सात प्रतिशत हिस्सा हज के द्वारा आता है। एक अनुमान के अनुसार यह आय तीन सौ अरब डॉलर प्रतिवर्ष है। कहीं ऐसा तो नहीं कि हज जैसी पवित्र इस्लामी परंपरा से आने वाला धन इंसानी खून बहाने के लिए इस्तेमाल हो रहा हो। जिस तरह से सऊदी अरब और उसके तमाम आतंकवादी संगठन दुनिया भर में इंसानी खून बहा रहे हैं उसमें वे किसी भी हद तक जा सकते हैं।

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