Readings - Hindi

सांप्रदायिकता

मालेगांव बम विस्फोट काण्ड
आखिर उन 'दो साइकिलसवारों' का क्या हुआ ?

सुभाष गाताडे

क्या आप में से किसी को मोहम्मद अफरोज का चेहरा याद है, जिसे 9/11 के बाद मुम्बई पुलिस ने गिरफ्तार किया था। कितना हल्ला हुआ था कि हिन्दोस्तां में ‘अल कायदा का पहला नुमाइन्दा’ पकड़ा गया है। पुलिस द्वारा यही कहानी गढ़ी गयी थी कि यह ‘खतरनाक आतंकवादी’ अपने द्वारा चालित हवाई जहाज को ब्रिटिश हाऊस आफ कामन्स और आस्ट्रेलिया पर गिराना चाहता था। अपने इन आरोपों की जांच के लिए पुलिस की टीम इन मुल्कों में भी भेजी गयी थीं। सभी जानते हैं कि किसी भी तरह के सबूतों के अभाव में ये टीमें खाली हाथ लौट आयी थीं। अन्त में यही बात साबित हुई कि समूचे आरोप गढ़े गये हैं। और मोहम्मद अफरोज को बाइज्जत रिहा किया गया था। मीडिया जिसने ‘अल कायदा के पहले हिन्दोस्तानी एजेण्ट’ के पकड़े जाने पर इस मामले को लगातार सूर्खियों में बनाये रखा था, उनमें से किसी ने यह जानने की कोशिश बाद में नहीं की कि इस मुल्क के एक होनहार युवा और उसकी परिवार की जिन्दगी के साथ इस किस्म का आपराधिक खिलवाड़ करने के लिये मुम्बई पुलिस के अधिकारियों पर कोई कार्रवाई भी हुई थी या नहीं। मीडिया के सामने नयी सनसनी मौजूद थी, इस मामले को भूला दिया गया।

साफ है अफरोज का मामला थोड़ा पुराना पड़ा है, लेकिन आपको उस ग़रीब, मासूम कश्मीरी फल विक्रेता का चेहरा जरूर याद होगा, जिसे पिछले साल दिल्ली में हुई सीरियल बम काण्डों के सूत्रधार के तौर पर पेश किया गया था। उसे लाने के लिए दिल्ली पुलिस की स्पेशल टीमें कश्मीर गयी थीं। अपने इस ‘प्राइज कैच’ पर फूला नहीं समा रहे पुलिस अफसरानों ने ही कुछ ही दिन बाद उसे पूरी तरह निरपराध घोषित किया था। इस बात को दावे के साथ कहा जा सकता है कि मुल्क़ के एक सम्मानित नागरिक और उसके परिवार को भयानक मानसिक, शारीरिक यातनायें पहुंचाने के लिए एवम उसकी सामाजिक बदनामी करने के लिये ‘कानून सुव्यवस्था’ के किसी भी अलम्बरदार से किसी तरह की कोई सफाई तक नहीं मांगी गयी होगी।

वैसे सबसे ताज़ा मामला, जो पुलिस प्रणाली के अन्दर मौजूद पूर्वाग्रहों को बेपर्दा करता है, वह सूबा जम्मू-कश्मीर से सामने आया है। चार साल पहले जम्मू के रघुनाथ मन्दिर पर हुए आतंकी हमले के लिए कर्ताधर्ता माने जाते चार आरोपियों को उच्च अदालत ने बाइज्जत बरी किया है। रघुनाथ मन्दिर पर हुए आतंकी हमले को पूरे मुल्क ने अपने टेलीविजन के पर्दे पर ‘सजीव’ देखा था। बाद में पुलिस ने इस षडयंत्र का पता लगाने के लिए विशेष टीमें गठित की थीं और इन चारों को हमेशा की तरह मीडिया के सामने पेश किया था। मुमकिन है पुलिस की मार से बचने के लिए उन्होंने यह ‘कबूला’ भी हो कि वही सूत्रधार थे। लेकिन अदालत के सामने मुकदमा आते-आते ही पुलिस द्वारा खड़े किये गये ‘झूठ’ को बेपर्दा होने में समय नहीं लगा। उच्च अदालत ने न केवल पुलिस को फटकार लगायी बल्कि उसे हिदायत दी कि भविष्य में अपने काम में वह सावधानी बरते।

निश्चित ही आज़ाद हिन्दोस्तां में जबकि यह सच्चाई नये सिरे से सामने आयी है कि किस तरह जेल ही एकमात्र जगह है, जहां मुसलमानों का अनुपात उनकी आबादी की तुलना में काफी ज्यादा है, (ऐसे आठ राज्य जहां उनकी औसत आबादी 14.82 फीसदी है, वहां जेल में डाले गये मुसलमानों की तादाद 23.4 फीसदी है - सच्चर कमेटी की रिपोर्ट) मोहम्मद अफरोज, वह गरीब कश्मीरी फल बिक्रेता या वे निरपराध चार कश्मीरी युवा जैसों से बनी यह फेहरिस्त अन्तहीन मालूम पड़ सकती है। और यह तस्वीरें तब आंखों के सामने जोरदार ढंग से नमूदार हो जाती है जब पुलिस के आला अफसर जोरदार ढंग से कोई ऐलान करते हैं और मीडिया के सामने बताते हैं कि किस तरह उन्होंने फलां फलां साज़िश को बेपर्दा किया है। यही वजह है कि सूबा महाराष्ट्र पुलिस से सम्बद्ध ‘आतंकवाद विरोधी दस्ते/ एण्टी टेररिजम स्क्वाड’ द्वारा मालेगांव बम विस्फोट काण्ड (8 सितम्बर 2006) की साजिश का पर्दाफाश करने का दावा करते हुए जो कहा जा रहा है, वह बात भी सन्देह से परे नहीं जान पड़ती।

शब-ए-बारात, एक ऐसा दिन जब मुस्लिम लोग अपने गुजर चुके आप्तजनों को याद करते हैं, उनकी कब्रों को साफ-सुथरा करते हैं और वहां नमाज अदा करते हैं। यह कहना मुष्किल है कि इस साल शब-ए-बारात के दिन महाराष्ट्र के मालेगांव में जुटे लोगों में कितने लोगों को इस बात का इलहाम रहा होगा कि वे अपनी आखरी नमाज अदा कर रहे हैं। इस मानवनिर्मित ट्रेजडी से 31 लोगों की मौत हुई और सैकड़ो लोग घायल हुए। (आठ सितम्बर 2006)

महाराष्ट्र पुलिस के आतंकवाद विरोधी दस्ते (एण्टी टेररिस्ट स्क्वाड) की बात पर यकीन करें तो मालेगांव में हुए बम विस्फोटों की गुत्थी अब सुलझ गयी है। ख़बरों के मुताबिक अब तक सात लोग पुलिस द्वारा हिरासत में लिये गये हैं। पुलिस के मुताबिक यह किसी अतिवादी मुस्लिम संगठन की साजिश थी जिसका मकसद था साम्प्रदायिक दंगों को भड़का देना। पुलिस का यह भी कहना है कि ‘विस्फोटों में इस्तेमाल किये गये बम अभियुक्त शब्बीर बैटरीवाला के गैरेज में एकत्रित किये गये थे।’

गौरतलब है कि इस अहम मसले में सामने आये ‘सच’ को उजागर करने के लिये बुलायी गयी प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान महाराष्ट्र के डीजीपी ने न पाकिस्तानी गुप्तचर एजेंसी आई.एस.आई. का नाम लिया और न ही लश्कर का नाम लिया, जिन्हें अक्सर ऐसी घटनाओं का असली जिम्मेदार बताया जाता है। पुलिस के मुताबिक यह किसी अतिवादी मुस्लिम संगठन की साजिश थी जिसका मकसद था साम्प्रदायिक दंगों को भड़का देना।

निश्चित ही पुलिस अफसरानों द्वारा ऐसे सभी मामलों में जिस आत्मविश्वास के साथ मीडिया के सामने घटना का विवरण पेश किया जाता है, उससे किसी को यह गलतफहमी नहीं होनी चाहिये कि अभियुक्तों के खिलाफ उसके पास पोख्ता सबूत भी हों। और खासकर जहां तक इस बम काण्ड के लिए जिम्मेदार तत्वों को चिन्हित करने का सवाल है, अभी कुछ दिन पहले तक इस काण्ड में हिन्दुत्व ब्रिगेड से जुड़े आततायियों के शामिल होने की बात जोरों से थी।

दरअसल मालेगांव के बहाने पहली दफा हिन्दुत्व के आतंकवाद का मसला जोरदार तरीके से बहस के केन्द्र में आया था। जो बात विभिन्न जनपक्षीय समूहों द्वारा, अल्पसंख्यकों के हिमायती संगठनों द्वारा लम्बे समय से कही जा रही थी, वह बात प्रतिष्ठित अख़बारों से लेकर जांच एजेंसियों के एजेण्डे पर, आम नागरिकों से लेकर खुद वजीरे आज़म मनमोहन सिंह के वक्तव्य तक सबके मुंह से सुनाई दी थी। गौरतलब था कि निर्गुट आन्दोलन के सम्मेलन के लिए जाते हुए पत्रकारों से बात करते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने साफ कहा कि मालेगांव बम विस्फोटों के सम्बन्ध में शक की सुई बजरंग दल की ओर भी मुड़ी है। अपने नपे-तुले वक्तव्य में उन्होंने साफ किया कि इस बम विस्फोट में बजरंग दल के शामिल होने के आरोपों को ‘न फिलवक़्त पुष्ट किया जा सकता है और न ही खारिज किया सकता है’।

बम्बई से निकलने वाले अंग्रेजी अख़बार ‘डीएनए’ में प्रस्तुत की गयी रिपोर्ट के मुताबिक :
बजरंग दल का नाम अभी भी जांच के घेरे में ही है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि ‘‘कोई कारण नहीं कि प्रस्तुत मामले को खारिज कर दिया जाये। हम लोगों को अभी भी ऐसी कोई बात नहीं पता चली है जो प्रमाणित करती हो कि बजरंग दल इस काण्ड में शामिल नहीं था’’। विभिन्न बम काण्डों में इसके कार्यकर्ताओं की भूमिका के चलते ही यह अतिवादी हिन्दू समूह मालेगांव काण्ड में जांच के घेरे में है। (PM doesn’t rule out Bajrang role, Josy Joseph, Wednesday, September 13, 2006 00:50 IST, DNA India)

और यह कोई पहला मौका नहीं था कि जब शक की सुई बजरंग दल की ओर घूमने की बात सामने आयी हो। देश के अग्रणी अख़बार ‘टाईम्स आफ इण्डिया’ ने (9 सितम्बर 2006) अपनी एक रिपोर्ट में महाराष्ट्र के पुलिस महानिदेशक पी. एस. पसरीचा के हवाले से जो ख़बर प्रकाशित की थी उसमें भी इस बात का विरोध उल्लेख था। ख़बर में बताया गया था कि ‘पुलिस इस बात का पता लगाने की कोशिश कर रही है कि क्या शुक्रवार को मालेगांव के बम विस्फोटों में बजरंग दल या लश्कर के किसी समूह का हाथ था। बजरंग दल के बारे में यह मालूम ही है कि परभणी की मोहम्मदी मस्जिद और पवना तथा जालना के मस्जिदों पर इस साल के शुरू में हुए बम विस्फोटों में उसने इसी रणनीति का इस्तेमाल किया था।’

निश्चित ही कुछ लोगों को इस सन्देहास्पद व्यक्तियों की सूची मंे बजरंग दल या संघ परिवारी संगठनों के नाम देख कर अचरज हुआ था। लेकिन जिन्होंने अप्रैल माह में महाराष्ट्र के नांदेड में एक संघ कार्यकर्ता के घर हुए बम विस्फोट तथा उसमें बजरंग दल के कार्यकर्ताओं की मौत की ख़बर पढ़ी थी, उन्हें इस बयान पर कोई भी आश्चर्य नहीं हुआ था। आडवाणी की भारत सुरक्षा यात्रा के दिनों में सामने आयी इस घटना ने लोगों के होश उड़ा दिये थे। मृतकों के घरों पर छापा मारने पर वहां नकली दाढ़ी, मुस्लिमों द्वारा आम तौर पहने जाने वाले कपड़े तथा कई मस्जिदों एवम् गुरुद्वारों के नक्शे मिले थे।

यह अकारण नहीं कि इसके कुछ समय बाद ही महाराष्ट्र में सक्रिय अतिवादी हिन्दू संगठन की कार्रवाइयों के बारे में राज्य की गुप्तचर सेवा ने एक क्लासिफाइड रिपोर्ट महाराष्ट्र सरकार को पेश की थी। (DNA – Hardcore Hindu Body Behind Nanded Blast, Dharmendra Tiwari. Sunday, June 11, 2006 20:17 IST) इस रिपोर्ट में महाराष्ट्र में पहली दफा सामने आये आतंकवादी हिन्दू संगठन की कारगुजारियों पर रौशनी डाली गयी थी और उस पर नकेल डालने के लिए विशेष कदम उठाने की सलाह दी गयी थी।

विचारणीय प्रश्न है कि आखिर किस तरह हिन्दुत्व ब्रिगेड के आनुषंगिक संगठनों को मालेगांव काण्ड की संलिप्तता से ‘क्लीन चिट’ दी गयी ?

अगर घटनाओं को सिलसिलेवार ढंग से देखें तो पता चलता है कि एक तरफ प्रधानमंत्री शक की सुई हिन्दुत्व की अतिवादी जमातों की ओर होने की बात कर रहे थे और उसी दौरान बिना किसी प्रमाण के अफवाहों कोे फैलाने का सिलसिला शुरू हो चुका था। किन्हीं अनाम सूत्रों का हवाला देते हुए पुलिस की ओर से कहा जाने लगा कि इसमें बजरंग दल का हाथ नहीं है। ऐसी ख़बरें किस ढंग से प्रसारित की जाने लगीं इसका अन्दाज़ा ‘हिन्दुस्तान टाईम्स’ जैसे प्रतिष्ठित अख़बार में छपी इस ख़बर से लगाया जा सकता है कि किस तरह ‘जेहादी आतंकवादियों’ को इसके लिये जिम्मेदार ठहराया जाने लगा :

‘‘लश्कर-ए-तोइबा के सरगना राहील ने सहयोगियों के साथ बम विस्फोटों की योजना बनायी - पुलिस के मुताबिक, लश्कर-ए-तोइबा के कमाण्डर राहील अब्दुल शेख (जो 11/7 को बम्बई में हुए बम काण्ड का भी कथित सरगना है) ने मालेगांव काण्ड के लिए अपने सहयोगियों अब्दुल लतीफ खान और जुनैद हुसैन के साथ मिल कर योजना बनायी होगी। ये दोनों प्रतिबन्धित स्टुण्डेण्ट्स इस्लामिक मूवमेण्ट आफ इण्डियाके सदस्य रहे हैं। अधिकारियों के मुताबिक मई महीने से खान और हुसैन दोनों फरार हैं और हो सकता है उन्होंने बम विस्फोट को अंजाम देने के लिए राहील से निर्देश प्राप्त किये हों।एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया कि मई माह में बांगलादेश भागने के पहले राहील कुछ समय तक मालेगांव रुका था’’

अल्पसंख्यकों के समूहों को इस काण्ड के लिए दोषी ठहराने का सिलसिला शुरू हो चुका था, इस तथ्य के बावजूद कि
‘‘इस्लामिक आततायी समूहों ने 1990 में कश्मीर में विद्रोह की स्थिति शुरू होने के बाद से भी कभी मस्जिदों या ऐसी दुकानों पर हमले नहीं किये हैं जहां धार्मिक किताबें बेची जाती हों। (इण्डियन एक्स्प्रेस, 18 सितम्बर 2006)

भारतीय पुलिस सेवा के एक रिटायर्ड अधिकारी एस. एम. मुशरिफ ने 10 अक्तूबर 2006 को के. सी. कालेज, बम्बई में आयोजित एक सभा में इस बात को उजागर किया था कि इस काम को कैसे अंजाम दिया गया होगा। ‘मालेगांव काण्ड: आखिर दोषी कौन ?’ इस विषय पर उपरोक्त सभा का आयोजन ‘सबरंग’, ‘कम्युनैलिजम काम्बैट’ की ओर से किया गया था (देखें, प्रेस विज्ञप्ति (www.sabrang.com) उनके मुताबिक ‘‘कार्यपालिका को गलत सूचनायें देने का काम इण्टेलिजेन्स ब्युरो की ओर से ही किया जाता है और हाल के समयों में उपरोक्त एजेंसी काफी पूर्वाग्रहों का शिकार रही है।’ वे कह रहे थे ‘इण्टेलिजेन्स ब्युरो का काम होना चाहिये घटनाओं के बारे में विशिष्ट जानकारी देना, न कि लोगों के एक हिस्से के खिलाफ अफवाहें फैलाने में जुट जाना। इसके बजाय यही देखने में आया है कि वही ऐसी अफवाहें फैलाता है, जिन्हें बाद में मीडिया में स्थान मिलता है। मीडिया को चाहिये कि वह पुलिस या सरकारी गलत सूचनाओं का वाहक न बनें बल्कि खुद जांच करे और घटनाओं के अलग-अलग परिप्रेक्ष्य सामने रखे।’

इस दौरान मीडिया में बैठे लोग, जो हिन्दुत्व के विचारों के समर्थक हैं, वे भी हिन्दुत्व ब्रिगेड को क्लीन चिट देने में अपने स्तर पर भी जुटे थे। एक तर्क यह भी पेश किया गया कि इसके पहले संघ परिवारी संगठन जिन बम काण्डों में फंसे थे, वहां पर बेहद अनगढ़ बमों का इस्तेमाल हुआ और कहा गया कि आरडीएक्स बनाने के लिए जिस तरह की तकनीकी विशेषज्ञता की जरूरत होती है, वह उनमें नहीं होती। यह जुदा बात है कि उन्हीं दिनों अंग्रेजी साप्ताहिक ‘आउटलुक’ ने एक कवर स्टोरी करके बताया कि आरडीएक्स प्राप्त करना कितना आसान काम है। मीडिया द्वारा गढ़ी जा रही इस ‘आरडीएक्स कथा’ से झुंझला कर ही शायद मशहूर शायर जावेद अख्तर ने के. सी. कालेज की बैठक में कहा ‘क्या आरडीएक्स पर कोई मुहर लगी रहती है जो मुसलमानों के साथ उसके रिश्तों को स्थापित करती है।’

पुलिस की कहानी कितनी छिद्रों से भरी है, यह इस बात से पता लगता है कि जहां काण्ड के मुख्य सूत्रधार के तौर पर बताया जा रहा व्यक्ति शब्बीर बैटरीवाला, घटना के एक महीना पहले से ही ‘गैरकानूनी गतिविधियां निवारण अधिनियम’ (पोटा के स्थान पर बनाया गया कानून) के अन्तर्गत जेल में बन्द रहा है और उसके खिलाफ एकमात्र सबूत उसकी फैक्टरी में आरडीएक्स के अंशों का पाया जाना बताया जाता है।

लेकिन उसी पुलिस ने अपनी जांच के दौरान अहमदनगर के शंकर शेलके के घर से जो बम के खोल और आरडीएक्स बरामद किया, इस काण्ड के लिए पुलिस को कोई अहमियत नहीं जान पड़ती। 16 सितम्बर को शंकर शेलके केे घर से बरामद 195 किलोग्राम आरडीएक्स बरामद हुआ, अगले ही दिन इस व्यक्ति ने कथित तौर पर खुदकुशी की और घटना के बाद उसका कर्मचारी फरार हो गया। उसके कुछ दिन बाद औरंगाबाद से कुछ किलोमीटर दूर एक हिन्दू सरपंच के घर से 300 किलोग्राम अमोनियम नायटेªट, टाईमर्स और फ्यूजर्स बरामद हुए, लेकिन पुलिस ने मालेगांव काण्ड का पर्दाफाश करने में इन तथ्यों से कोई मदद नहीं ली।

इसी दौरान तमाम सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मालेगांव तथा इलाके के मुस्लिम नेताओं ने सरकार और महाराष्ट्र के पुलिस अधिकारियों को यह अपील भी की कि मालेगांव बम विस्फोट की तह तक जाने के लिए इसके पहले के इन काण्डों - अहमदनगर, औरंगाबाद में बरामद आरडीएक्स तथा बम बनाने की सामग्री, अप्रैल माह में संघ परिवार के सदस्य के घर हुए बम विस्फोट आदि काण्डों के बीच - के अन्तर्सम्बन्ध को तलाशें, लेकिन जैसा कि स्पष्ट है ‘आतंकवाद विरोधी दस्ते’ ने भी पहले से अपना इरादा कर लिया था और मालेगांव काण्ड के बम्बई टेªन विस्फोटों और फिर इन सबके आईएसआई के साथ रिश्ते को स्थापित करना है। (और वह उसने कर दिखाया)

अपने एक आलेख ‘मालेगांव ब्लास्ट: पार्टिजन एप्रोच एण्ड बायसड पुलिस’ में असगरअली इंजीनियर (अंग्रेजी पत्रिका ‘सेक्युलर पर्सपेक्टिव - 16-30 नवम्बर 2006) पुलिस की कार्यप्रणाली पर रौशनी डालते हुए कहते हैं :

मैं नाशिक जिले के पुलिस अधीक्षक ग्रामीण से मिला जिसे मालेगांव बम विस्फोट की जांच का जिम्मा सौंपा गया है और उसके साथ मेरी लम्बी चर्चा हुई। यह स्पष्ट था कि उसकी समझदारी यही थी कि यह किसी मुस्लिम का काम है और इसमें कोई हिन्दू शामिल होने की सम्भावना नहीं है।

उसका तर्क यह था कि मालेगांव शहर एक मुस्लिम बहुल इलाका है और कोई भी हिन्दू मुस्लिम बहुल इलाके में ऐसा नहीं करेगा। उसका तर्क निश्चित ही विचित्र था। सिर्फ मालेगांव ही मुस्लिम बहुल इलाका है, जिला भी नहीं। अगर ग्रामीण क्षेत्रों को जोड़ दें तो वहां हिन्दू ही बहुमत में हैं। और फिर जिला, राज्य और देश का क्या ? उन्होंने यह भी तर्क दिया कि अगर किसी हिन्दू ने इस काम को किया होता तो उसने लोगों को अधिकाधिक हानि पहुंचाने की कोशिश की होती और रात में बम रखा होता जबकि तमाम लोग वहां जुटनेवाले थे।

लेकिन आठ सितम्बर को जब डेढ़ बजे बम विस्फोट हुए, वह भी बहुत भीड़ वाला समय था जबकि शुक्रवार के दिन और खासकर शब-ए-बारात के दिन लोगों का रेला नमाज़ अदा करने आता है। और अगर लाउडस्पीकर्स चन्द मिनटों के लिए रूके नहीं होते, हजारों लोग उस वक़्त मस्जिद से बाहर निकले होते और नुकसान और ज्यादा होता। निश्चित ही इस बात का कोई स्पष्टीकरण नहीं था।

असगर अली इंजिनीयर पुलिस अधीक्षक राजवर्धन से हुई मुलाकात का जिक्र करते हुए यह भी सूचित करते हैं कि उनके मुताबिक उन्होंने कई हिन्दुओं से भी पूछताछ की है। इंजीनियर द्वारा यह पूछे जाने पर कि उनके क्या नाम थे ? इस पर वह जवाब नहीं देते। इंजीनियर पुलिस के दोहरे रवैये की चर्चा करते हुए कहते हैं कि जब किसी मुसलमान से पूछताछ की जाएगी तो उसके नाम तत्काल मीडिया के लिए जारी किये जाएंगे लेकिन अगर हिन्दुओं से पूछताछ हुई तो नाम बताना भी कुफ्र हो गया।

अपने एक आलेख ‘विक्टिम्स आफ टेरर’ (22 नवम्बर 2006, टाईम्स आफ इण्डिया) में राजनीतिक विश्लेषक ज्योति पुनवानी पुलिस द्वारा मुसलमानों को निशाना बनाने की पुलिसिया रणनीति का उल्लेख करते हुए बताती हैं :

मालेगांव की गिरफ्तारियों के बाद, प्रबुद्ध मुस्लिम सोच रहे हैं कि क्या भारत सरकार ने अमेरिका के तर्ज पर मुसलमानों के एक सम्प्रदाय को दूसरे सम्प्रदाय से लड़ाने की कोई रणनीति अपनायी है। अहले हदीस को माननेवाले लोग कुरान पर सख्ती से अमल करते हैं, उनकी स्त्रिायां पूरा नकाब पहनती हैं। इस नकाब को फाड़ना, और आरोपियों के चेहरों पर उसे फेंकना, उसे पैरों के नीचे फेंकना और यह धमकाना कि ऐसा सलूक परिवार की हर स्त्राी के साथ होगा, ऐसे कदम से पुलिस पीड़ितों और समुदाय पर क्या असर छोड़ना चाहती है।

साफ है अपनी पक्षपाती छवि और ढीले ढाले रवैये के चलते मीडिया में आलोचना का शिकार होती रही महाराष्ट्र पुलिस और सूबे के आकाओं के लिए आज सबसे बड़ा मसला विश्वसनीयता का ही है, मुस्लिम समुदाय के प्रति उनके पक्षपातपूर्ण रवैये से उनकी बातों पर शायद ही किसी को यकीन रह गया है।

अभी ज्यादा दिन नहीं बीता है जब जुलाई माह में बम्बई की लोकल ट्रेनों में हुए बम धमाकों में तमाम लोग मारे गये थे। विस्फोटों के तत्काल बाद बम्बई पुलिस ने न केवल लश्कर-ए-तोइबा जैसे संगठनों एवम् सीमापार से ऐसी गतिविधियों को मिलते समर्थन पर हल्ला मचाना शुरू किया, बल्कि अपराधियों की तलाश करने के नाम पर बम्बई के विभिन्न अल्पसंख्यक बहुल इलाकों को अपना निशाना बनाया। इतना ही नहीं हाल के समयों में विदेश यात्रा किये अल्पसंख्यक समुदायों के परिवारों में भी पहुंच कर पुलिस ने जांच-पड़ताल के नाम पर उन्हें आतंकित किया। यह अकारण नहीं था कि अल्पसंख्यक समुदाय के सांसदों या अग्रणी लोगों ने प्रधानमंत्री से मिल कर इस मामले में हस्तक्षेप करने की मांग की थी।

अप्रैल माह में मराठवाड़ा के नांदेड में बजरंग दल/राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता के घर पर हुए बम विस्फोटों में जिसमें बजरंग दल के दो कार्यकर्ता मारे गये थे। इस बात का भी खुलासा हुआ था कि आडवाणी की यात्रा के दौरान बड़े पैमाने पर साम्प्रदायिक दंगे करवाये जायें। संघ के जो कार्यकर्ता मारे गये थे, उनके घरों की तलाशी में न केवल इलाके में अल्पसंख्यक समुदाय के धार्मिक स्थलों के नक्शे मिले बल्कि अल्पसंख्यकों द्वारा आम तौर पर पहने जाने वाले कपड़े एवम् टोपी भी मिली थी। इस मामले की तह तक जाने में भी पुलिस ने कोई रुचि नहीं दिखायी थी।

वर्ष 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद बम्बई में हुए दंगों में पुलिस की पक्षपातपूर्ण भूमिका को तो दंगों की जांच के लिये बने श्रीकृष्ण आयोग ने भी नोट किया है। इस दंगे में आयोग द्वारा गम्भीर आलोचना का शिकार हुए कई पुलिस अधिकारी आज भी अपने पदों पर कार्यरत हैं।

वैसे मालेगांव काण्ड में महज पुलिस ही नहीं राज्य प्रशासन का जिस तरह का रवैया रहा उसमें भी उसका अल्पसंख्यक विरोध छिपा नहीं। बम विस्फोटों में मारे गये लोगों की हालत पर जहां वह घड़ियाली आंसू बहाती रही वहीं उसने जुलाई में बम्बई की लोकल ट्रेनों में हुए बम विस्फोटों में (जिनमें ज्यादातर हिन्दू मारे गये थे) की तुलना में मालेगांव में बम विस्फोट में मारे गये लोगों के(जिनमें ज्यादातर मुस्लिम मारे गये थे) परिवारजनों को महज 1/5 वां भाग मुआवजा दिया। (द मिल्ली गैजेट, 14 सितम्बर 2006)

गौरतलब है कि मालेगांव की आबादी का 75 फीसदी समुदाय जोकि अल्पसंख्यक हैं उसे किसी अप्रिय घटना की आशंका थी, इसलिये शब-ए-बारात के पहले स्थानीय अमन कमेटी की बैठक में उन्होंने इस पर विस्तार से चर्चा की थी। पुलिस अधिकारियों को भी सूचित किया था, लेकिन किसी के कान पर जूं नहीं रेंगी थी।

अल्पसंख्यकों के खिलाफ जिस किस्म का संस्थागत भेदभाव चलता है, वह सबके सामने था। 6 सितम्बर को समाप्त हुए गणेशोत्सव तक जहां पुलिस ने सुरक्षा व्यवस्था को चाकचौबन्द रखा था, वहीं आठ सितम्बर शब-ए-बारात के दिन उसने कब्रिस्तान के पास जहां नमाज अदा करने हजारों लोग जुटे थे, वहां मामूली सिपाही भी नहीं भेजा था। सुरक्षा व्यवस्था को कड़ा रखने की बात ही दूर थी।

पुलिस के इस पक्षपातपूर्ण रवैये का ही नतीजा था कि 14 नवम्बर 2006 को मालेगांव के मुसलमानों ने दिनभर के शान्तिपूर्ण बन्द का आयोजन कर अपने गुस्से का इजहार किया। यही वह दिन था जब सूबे के मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख वहां एक अस्पताल का शिलान्यास करने के लिये आये थे।

वही अस्पताल जिसकी योजना नब्बे के दशक में बनी थी, लेकिन बम काण्ड के बाद मंत्रिमण्डल ने इसके लिए राशि मंजूर की। लोग बताते हैं कि अगर कोई ठीक अस्पताल मालेगांव में होता तो बम काण्ड में घायल कई लोगों की जान बचायी जा सकती थी !

बम्बई से प्रकाशित होने वाले एक अग्रणी अंग्रेजी दैनिक में अक्तूबर के दूसरे सप्ताह में पीटीआई के हवाले से एक ख़बर छपी जिसका शीर्षक था ‘मालेगांव के मुस्लिम संगठन को चेतावनी भरे पत्र मिले।’ ख़बर के मुताबिक :

पुलिस ने बताया कि मालेगांव के एक अग्रणी मुस्लिम संगठन को धमकी भरा पत्र मिला है। संघ परिवार और भवदीय ब्राह्मण संघकी ओर से हिन्दी में भेजा गया पत्र जमिअतुल उलेमा के नाम सम्बोधित है, जो मालेगांव से तीन किलोमीटर दूर वाजिरखेड़े गांव से पोस्ट हुआ है। पुलिस ने हालांकि पत्र में लिखी बातों को उजागर नहीं किया। मंगलवार रात अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया। पुलिस मामले की जांच कर रही है। (पीटीआई, बुधवार, 11 अक्तूबर 2006)

यह अनाकलनीय है कि आखिर क्यों पत्र में लिखी बातों के बारे में रहस्य बना कर रखा गया है। वैसे कई सारे सूत्र हैं जो अभी भी छूटे हैं। मसलन बम काण्ड के बाद वारदात के स्थान से बरामद दो साइकिलों के बारे में बताया गया था कि इन साइकिलों का प्रयोग बम विस्फोट कराने में हुआ है। मालेगांव के ही दुकान से नयी खरीदी गयी इन साइकिलों के बिक्रेता द्वारा दिये गये तथ्यों के आधार पर यह चित्र तैयार किये गये थे। बिक्रेता ने यह भी बताया था कि दोनों लोग हिन्दी बोल रहे थे। अभी भी उन दो साइकिलसवारों का पता नहीं लग सका है। क्या ऐसे महत्वपूर्ण सबूत के बिना पुलिस ऐसा दावा कर सकती है कि उसने साज़िश का पता लगा दिया है।

आखिर जहां तक पुलिस द्वारा कई अहम सुरागों को छोड़ देने की बात है तो अंग्रेजी साप्ताहिक ‘आउटलुक’ की राधिका कोप्पीकर को यहां उद्धृत करना समीचीन होगा (13 सितम्बर 2006, वेब पर)

‘‘जांचकर्ता जितनी आसानी से किसी हिन्दुत्व संगठन के शामिल होने की बात को खारिज करते हैं उससे यह सामने आता है कि यह हकीकत है कि पुलिस ने कई सुरागों पर गौर नहीं किया है। उस ‘फर्जी दाढ़ी’ के मामले पर गौर करें, जैसा कि यहां कहा जा रहा है। अकील अहमद अन्सारी नामक दर्जी जो बड़ा कब्रिस्तान के करीब रहता है उसने पुलिस और आसपास खड़े लोगों को बताया था कि उसने साईकिल के पास पड़ी एक लाश उठायी थी और वह एम्ब्युलैन्स में बैठे वालंटियरों को सौंपी थी। इस लाश का निचला हिस्सा गायब था और एम्ब्युलैन्स में रखते वक्त उसकी दाढी निकल आयी थी। कहने का तात्पर्य यही था कि वह फर्जी दाढ़ी थी और इसीलिये घटना को अंजाम देने वालों में से किसी की वह लाश थी। इसे इत्तेफाक ही कहा जाना चाहिये कि वे दोनों अस्पताल जिन्होंने लाशों का पोस्ट-मार्टेम किया, उन्होंने बताया कि उन्होंने 30 के करीब लाशों की शवपरीक्षा की है और इनमें से किसी भी लाश का नीचला हिस्सा गायब नहीं था।’’


वे सभी जो महाराष्ट्र की हाल की साम्प्रदायिक परिस्थिति से वाकिफ हैं, ‘फर्जी दाढ़ी’ का महत्व जानते हैं। वह नांदेड ही था, जहां अप्रैल माह में संघ से जुड़े एक व्यक्ति के घर पर हुए बम विस्फोट में बजरंग दल के दो कार्यकर्ता मारे गये थे, और जैसे कि पहले ही उल्लेख किया जा चुका है, मारे गये लोगों के घर से फर्जी दाढ़ी तथा अल्पसंख्यकों द्वारा पहने जाने वाले ड्रेस भी बरामद हुए थे।

कहने का तात्पर्य यह है कि अभी इस मसले को नये सिरे से देखने की जरूरत है, ताकि मासूमों के बहे खून के असली कातिलों की शिनाख्त हो सके। वरना अपने पक्षपाती रवैये के चलते घृणा का पात्र बनी महाराष्ट्र पुलिस और कितने मासूमों को ‘अपराधी’ घोषित करेगी इसका हिसाब लगाना भी मुश्किल होगा।

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