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सांप्रदायिकता

प्राथमिक रिपोर्ट : ओड़िसा में संघ गिरोह का नंगा नाच

प्रवीण कुमार व फैसल अनुराग

ओड़िसा में क्रिसमस के समय 24-25 दिसम्बर 2008 को संघ गिरोह ने जिस हिंसक घटना को अंजाम दिया वह आकस्मिक नहीं थी। इसकी जोरदार तैयारी की गयी थी। इससे पूरे पूर्वी भारत को सांप्रदायिक हिंसा का शिकार बनाने का प्रयास किया जा रहा है। इसके इतिहास पर गौर करें तो ये घटनाएं स्थानीय जनों की अस्मिता और संसाधनों पर हक की मांग के खिलाफ पूंजी घरानों के इशारे पर शुरू की गयी लड़ाई है। 1947 के समय में यह इलाका पूरी तरह शांत था जबकि बंगाल में दंगे हो रहे थे। 1957 में टाटा के मजदूरों की बड़ी हड़ताल की सफलता और राउरकेला में आदिवासियों से जबरन ली गयी ज़मीन के बाद हालात इस तरह बन गए थे। उससे विकास का वह सच सामने आ रहा था जिसमें संवैधानिक प्रतिबद्धताओं के लिए जगह कम होती जा रही थी। इसी दौर में रांची में एचइसी बन रहा था। यही वह समय था जब कि झारखंड आंदोलन भी कमजोर हो गया था तथा केन्द्र का दबाव इतना तेज था कि आदिवासी राजनीति पर गैर-आदिवासियत का प्रभाव इतना बढ़ रहा था कि झारखंड पार्टी का अस्तित्व ही खतरे में डाल दिया गया। झारखंड पार्टी के कांग्रेस में विलय के साथ ही वृहत्तर झारखंड में आरएसएस की गतिविधियां तेज हो गयी। दरअसल आरएसएस ने स्वभाव से ही धर्मनिरपेक्ष झारखंड राजनीति के पराभव के समय का बेहतर इस्तेमाल करते हुए अपनी ताकत में इजाफा किया और उसने झारखंड के उन सीमावर्ती इलाकों में भी पैठ बना ली जो विरासत में साझापन के  लिए जाने जाते थे। 1964 के सांप्रदायिक दंगों ने इसे पनपने के लिए ज़मीन दी। संघ और उसके सहमना संगठनों ने पूरे इलाके में तनाव और विभाजन को गहरे रूप से पैठा दिया। 1964 के बाद से इस इलाके में लगातार होती सांप्रदायिक घटनाओं के पीछे की दीर्घकालिक योजनाओं की समझ तो लोगों में आयी। परन्तु गैर-कांग्रेसवाद की राजनीति का परिणाम भी इसमें शामिल हुआ जिसका सबसे ज्यादा फायदा संघ गिरोह को मिला। 1967 और 1977 वे मुकाम हैं जिन पर तफसील से विचार करने की जरूरत को नजरअंदाज किया जाता रहा है। यह भी देखा गया है कि संघ ने अनेक गैर-सरकारी संस्थाओं की नींव डाल कर अपनी ज़मीन को पुख्ता बनाया है तथा उनका मकसद पूरे आदिवासी अंचल को अपने अनुकूल ले जाने का है। इसमें अस्मिता के साल को सरलीकृत तरीके से इस्तेमाल की राजनीति तो शामिल है ही, यह बात भी शामिल है कि प्राकृतिक संसाधनों पर जन हक की लड़ाई वास्तव में साम्राज्यवाद के खिलाफ तीखा संघर्ष है और सांप्रदायिक विभाजन से ही इस पूरे इलाके में संसाधनों की लूट के लिए रास्ता साफ किया जा सकता है। इन हालातों को और भी गंभीरता से समझने में छत्तीसगढ़ में कांग्रेस-भाजपा संयुक्त अभियान के सलवा जुडुम से भी बहुत कुछ समझा जा सकता है। इन सभी घटनाओं के पीछे जो एकता है उसे हमें गंभीरता से जानने की जरूरत है। ओड़िसा की घटनाएं इसी सिलसिले में एक कदम भर हैं। क्योंकि ओड़िसा, झारखंड और छत्तीसगढ़ अभी संसाधनों की लूट की दृष्टि से देशी-विदेशी पूंजी घरानों के निशाने पर हैं। स्टील की सभी बड़ी हस्तियां यहां प्रयोग कर रही हैं और तीनों सूबों में सरकारें केवल ब्रोकर की भूमिका में रह गयी हैं। ओड़िसा में बिजद-भाजपा गठबंधन का सबसे घातक पहलू संघ गिरोह के उस सांस्कृतिक अभियान में है जो दलितों और आदिवासियों के बीच न केवल अपने प्रभाव का विस्तार कर रहा है बल्कि ब्राह्मणवाद को बचाए रखने के लिए इनके सकारात्मक उभार को खत्म कर रहा है। पादरी स्टेंस की हत्या की घटना को याद करने की जरूरत है जिसमें उनको उनके दो मासूम बच्चों के साथ जिंदा जला दिया गया था। उस घटना पर भी विस्तार से चर्चा नहीं की गयी थी। उसके बाद से संघ गिरोह ने अपनी रणनीति को और विस्तारित किया। हमने यह भी देखा है कि गुजरात जनसंहार के पहले गुजरात के आदिवासियों के साथ संघ ने किस तरह के और कितने प्रयोग किए थे। ऐसे ही प्रयोग अब पूर्वी भारत के संसाधनों से संपन्न राज्यों में किए जा रहे हैं। विश्व हिंदू परिषद का एक बड़ा संभाग रांची से संचालित हो कर पूर्वोत्तर सहित इन सभी सूबों में लोगों को भटकाने का प्रयास कर रहा है। शिक्षा और स्वास्थ्य के साल को लेकर इन संगठनों ने आदिवासी पहचान और दलित समानता के उभार को प्रभावित करने का पूरा प्रयास किया है। कंधमाल की घटना इसकी ही बानगी की तरह है। दरअसल हमें इस भ्रम का शिकार नहीं होना चाहिए कि संघ गिरोह सत्ता से बाहर है। सत्ता के विभिन्न रूप उसने अपना लिए हैं। गठबंधनों की राजनीति ने उसे अपने सांस्कृतिक अभियानों को राजनैतिक स्तर पर ज़मीन पर उतारने में मदद दी है। आज आदिवासी आंदोलनों की दिशा को धर्मनिरपेक्षता से विमुख करने में वे कामयाब हो रहे हैं। यहां तक कि उन आंदोलनों के भीतर से भी उनकी पैठ है जिन्होंने विस्थापन के खिलाफ संघर्ष किया है। झारखंड-ओड़िसा में संघ के इस इरादे को समझने की जरूरत है। संघगिरोह ने रणनीति के साथ इन आंदोलनों का विरोध नहीं किया बल्कि उसमें अपने लोगों को शामिल करा कर जनता का विश्वास पुख्ता किया और फिर आंदोलन को कमजोर करने के साथ ही लोगों के भीतर धर्म के नाम पर विभाजन पैदा किया। संघ ने आदिवासियों की पहचान को खत्म करने के लिए साहित्य भी बनाया है। हिंदू मिथकों के साथ उन्हें जोड़ा है तथा कई इलाकों में आदिवासियों के भीतर यह बात बैठा दी है कि वास्तव में सरना ही सनातन है। आदिवासी अपने आदिधर्म को सरना कहते हैं जिसमें प्रकृति की पूजा का ही विधान है लेकिन संघ प्रयोगों के बाद से उसमें कई तरह के देवी-देवता पैदा कर दिए गए हैं। वास्तव में इस पूरे प्रयास का मकसद आदिवासियों को हिंदू बनाने का है। इसीलिए चर्च की परिघटना को बढा़-चढ़ा कर पेश करने में उन्हें अफवाहों की भूमिका को कम करके नहीं आंका जा सकता। दरअसल वामपंथ के विभिन्न तरह के प्रयोगों की कामयाबी के बाद भाजपा और संघ ने पिछले चार दशकों में जिस राजनीति और रणनीति को अपनाया उसमें कामयाबी मिली है तो इसके ठोस ज़मीनी कारण भी रहे हैं। दसअसल इन इलाकों की जनसंख्या गणित को भी हमें विश्लेषित करना होगा और उससे यह समझने की कोशिश करनी होगी कि आखिर गठबंधन राजनीति सांप्रदायिक फासीवाद को ठोस किस तरह बनाता है। कंधमाल की घटना भी इस ओर काफी कुछ बताती है। कंधमाल की घटना पूर्वनियोजित थी और पिछले सात सालों से इसकी पृष्ठभूमि तैयार की जा रही थी। इसके पीछे राजनीति और आर्थिक कारण तो हैं ही पर उन सांस्कृतिक पहलुओं को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता जो मेहनतकश के भीतर दीर्घकालिक सांप्रदायिक विभाजन पैदा करता है और उसे टिकाए रखने के लिए निरंतर प्रयास करता रहता है। इन इलाकों में जिस तरह मठों, स्कूलों और संस्थाओं का जाल संघ गिरोह द्वारा खड़े किये जा रहे हैं वे दिन-रात इसी तरह के प्रयोगों में लगे रहते हैं। इसीलिए एक मामूली घटना को लंबे समय तक तनाव और फिर हिंसा का रूप बनाए रखने में उन्हें कामयाबी मिलती रहती है। कंधमाल तो इसी परिघटना का एक रूप है। इसमें सत्ता का संप्रेषण भी है और गठबंधन राजनीति का पूरा अपनी ताकत बढ़ाने में इस्तेमाल भी। इसीलिए बिजद की चुप्पी को भी समझना होगा। गुजरात जनसंहार के समर्थन और बचाव में जिस तरह जॉर्ज फर्नांडीस ने अपनी क्रूरता दिखायी थी वैसी ही भूमिका में बिजू जनता दल भी है। उसके स्थानीय नेताओं के संबंध जिस तरह संघ के साथ हैं उससे बिजद के सांप्रदायिक रुख को समझना होगा। साथ ही कथित रूप से प्रगतिशील कहे जाने वाले कुछ एनजीओ का भी जिन्हें कंधमाल जैसी घटनाएं अनहोनी नहीं लगती हैं और न ही ऐसी घटनाओं के खिलाफ लड़ने का कोई साहस या जोखिम ही वे उठाना चाहती हैं। मीडिया की भी यही भूमिका है जो संघगिरोह को ताकत ही प्रदान करता है। कंधमाल की घटना इस अर्थ में खास है और उस पर अभी से यदि सेक्युलर ताकतों ने मिल कर उससे निपटने की कोई योजना नहीं बनायी तो वह दिन दूर नहीं कि इन इलाकों में गुजरात जैसे जनसंहार का नंगा नाच फिर से देखने को मिलेगा।

कंधमाल क्षेत्र में दंगे की स्थिति पर एक नजर
कंधमाल मध्य ओड़िसा का आदिवासी बहुल जिला है। आम तौर पर यह जिला बहुत शांत प्रवृति का रहा है लेकिन पिछले सात सालों से इसे अशांत बनाने की कोशिश की गयी है। दलित तथा आदिवासियों के बीच विभाजन के साथ ईसाई बनाम अन्य का तनाव भी पैदा किया गया है और इसे सात सालों में ठोस जमीनी रूप देने का प्रयास किया गया है और आगे भी निरंतर जारी है। इस जिले में इसाईयों की आबादी 1991 जनगणना के अनुसार 15 प्रतिशत है। कुछ क्षेत्र जैसे नीचे, केषहर कोटागढ़, बालीगुड़ा, सारनगडा, फीरींगीया पुलिस स्टेशन में मिशनरियों के खिलाफ हालात बनाने के लिए सुनियोजित प्रयास किया गया। इस तरह के विकास के चलते गाँव के स्तर पर सामुदायिक रेखा में द्वंद भावना और तनाव की स्थिति हो गई है।

अपराध संबंधी गतिविधियों के दौरान दोनों समुदाय का संक्षिप्त विवरण ये है :

  • 28/11/1986 से 9/2/1987 के अवधि में टीकाबाली पुलिस स्टेशन के अंतर्गत आने वाले चाकापद आश्रम के स्वामी लक्षमानन्दा सरस्वती के द्वारा रथ यात्रा प्रारंभ की गई। इसके परिणाम से तनाव में और तेजी आई और कोग केसों का पंजीकरण हुआ।
  • पंजीकृत कोग केस की संख्या : 38
  • जलाए गए चर्च : 18
  • पिछले तीन साल में सामुदायिक रेखा में हुए अलग-अलग हादसों के परिणाम से कोग केसों का पंजीकरण हुआ।
  • 1997-निल, 1998-04, 1999-27

जातीय : जिले में आदिवासियों और पिछड़े वर्ग का जनसंख्या वितरण क्रमशः 1,00,000 (18 प्रतिशत) और 2,81,000 (51 प्रतिशत) है। वर्ष 1994 में इस जिले को जातीय दंगे का अनुभव हुआ था। उस अवधि के दौरान मुख्य मुद्दा आदिवासियों और पिछड़े वर्ग के ज़मीनों को गैर कानूनी और जबरन हथियाना था।

जातीय दंगे की अवधि के दौरान दोनों गुटों के अपराध संबंधी विवरण ये हैं :

सामान्य : कुल मिला कर इस जिले में कानून व्यवस्था की स्थिति अच्छे नियंत्रण में है, सिर्फ कुछ हिस्सों में पृथक्करण हिंसा की घटना हर कुछ वक्त के बाद देखने को मिलती है।

दंगों की शुरुआत कैसे हुई?
कंधमाल जिले के दारिंगबादी इलाके में 25 दिसंबर 2008 को दो समुदायों के बीच झड़प में कम से कम दो व्यक्ति घायल हो गए। उस ढांचे को भी क्षतिग्रस्त किया गया जिसका निर्माण क्रिसमस उत्सव के लिए किया गया था। ब्राह्मणी गाँव में केसरिया ब्रिगेडियर से जुडे़ कुछ साम्प्रदायिक लोगों ने खड़े किए हुए ढांचे और सजाये हुए गेट पर आपत्ति जताई और त्योहार को संगठित करने वाले लोगों को प्रताड़ित करना शुरू कर दिया और गेट बंद कर डाले। इसके अलावा उन्होंने डेली और साप्ताहिक मार्केट के स्टॉलों को भी तोड़ डाला। इस झड़प के बीच दोनों गुटों ने वहाँ मौजूद भीड़ के ऊपर पथराव किए और लाठी चलाई।

वहाँ की स्थिति नियंत्रण में रहे तथा क्रिसमस त्योहार में किसी तरह की घटना न घटे, इसे ध्यान में रखते हुए उस स्थान में अधिक पुलिस फोर्स की व्यवस्था की गई। सीनियर पुलिस और जिला प्रशासन अधिकारियों को भी उस स्थान पर स्थिति को नियंत्रण करने के लिए हड़बड़ी में भेजा गया क्योंकि हजारों की तादाद में लोग कड़े सुरक्षा इंतेजामात और उन्हें रोकने की मांग कर रहे थे जो उनके त्योहार को बिगाड़ रहे थे लेकिन पुलिस ने हिंसा करने वालों को रोकने की बजाय मूक दर्शक बन कर उनका साथ ही दिया।

जैसा कि मीडिया ने इस घटना को दिखाया कि हाल में हुए ओड़िसा के कंधमाल जिले में फैली हिंसा असल में सामाजिक स्वार्थ की झड़प थी न कि ये हिन्दू और क्रिश्चियन के बीच का संघर्ष था। न ही ये असल में हिन्दू और क्रिश्चियन मिशनरियों के बीच की झड़प थी बल्कि ये कुई आदिवासियों और आदिवासियों के बीच की झड़प थी। लेकिन इसे सांप्रदायिक रंग देने की भरपूर और कामयाब कोशिश में संघ गिरोह सफल रहा और ईसाई विरोधी माहौल बनाने में उसे कामयाबी मिल ही गयी। पाना गुट के ऊपर आदिवासियों कि स्थिति जो कि एक पृष्ठभूमि पर धुंधला सी गई।

असल में कुई समुदाय की ये मांग थी कि उन्हें आदिवासी श्रेणी में गिना जाए। लेकिन 1981 के रिकॉर्ड बताते हैं कि पाना हरिजन ओड़िसा के कई हिस्सों में अछूत माने जाते हैं और उदयगिरी तहसील के परिवर्तित क्रिश्चियन भी समान स्तर की मांग करने लगे, पर कुई आदिवासी द्वारा इसका कड़ा विरोध किया गया।

सन् 2000, को परिणाम के रूप में उनकी मांग को बाद में राष्ट्रपति के दफ्तर में भेजा गया ताकि कुई को आदिवासी समुदाय घोषित किया जाए। लेकिन कहीं पर भी कुई भाषा बोलने वाले लोगों को जनजाति होने का जिक्र नहीं किया गया है। परिणामस्वरूप 78 पाना गुट के लोगों ने उच्च न्यायालय में अपील की, पर सरकार ने सबूत पेश करने की मनाही कर दी।

फूलबनी कुई जनकल्याण संघ नामक एक गैर सरकारी संगठन ने इस मांग को पाना समुदाय के लिए पाने में पहल की तब कंधमाल जिले में कुई समाज समन्वय बैठक ने कड़ा विरोध किया कि ये गैर सरकारी संगठन पाना समुदाय से मिला है, इसलिए ये समस्या पैदा कर रहा है। उन्होंने धमकी देते हुए कहा कि अगर सरकार पाना हरिजनों की मांग को पूरा करता है तो स्थिति भयानक मोड़ लेगी।

रिपोर्ट के मुताबिक गाँव में तनाव पूर्ण स्थिति पैदा हो गई जब पाना हरिजनों ने खुद को कुई जनजाति बताना शुरू किया। कुई नेता और भी आक्रोशित हो गए, जब ये खबर फैली कि उड़ीसा माइन्स मंत्री पदमानभा बेहेरा पाना समुदाय का समर्थन कर रहे हैं। उन्होंने 25 दिस्मबर को बंद घोषित किया। इससे पहले विश्व हिन्दू परिषद के समर्थकों ने भी उसी दिन बंद का ऐलान किया। स्वामी लक्षमानन्दा सरस्वती पर हमले में किसका हाथ है, प्रमाणित हुए बिना ही इसे ईसाइयों का कारनामा बता दिया गया और बंद में इसे मुद्दा बना दिया गया। ईसाई धार्मिक स्थलों और ईसाईयों पर हमले शुरू कर दिए गए। देखते-देखते पूरे फुलबनी अंचल में सांप्रदायिक हिंसा और तनाव चरम पर पहुंच गया। दो दिनों तक विहिप ने खुल कर हमले किए इसके बाद ही प्रशासन सक्रिय हुआ। हालांकि कर्फ्यू का नाटक पहले ही दिन किया गया लेकिन विहिप को हिंसा करने की छूट प्रशासन ने दे रखी थी।

टी.वी. चैनल के रिपोर्ट के मुताबिक राज्य में हिंसा तब फैली जब कंधमाल जिले के चर्चों को कुछ हिन्दू कट्टरपंथियों ने ध्वंसित कर दिया। इस घटना ने दंगों को और हवा दी। हो सकता है कि ये तत्कालीन वजह रही हो पर असल दृश्य दो समुदायों के बीच सामाजिक स्तर पर पैदा किए गए विभाजन के कारणों की पड़ताल की मांग करता है। धर्म परिर्वतन का सवाल तो बहाना भर है। दरअसल धर्म-परिवर्तन की परिघटना को भी विकृत अंदाज में ही पेश करने का प्रयास किया जाता रहा है और यही कारण है कि एक मामूली घटना को व्यापक सांप्रदायिक घटना बनाने में विहिप को सफलता मिल ही गयी।

मीडिया की रिपोर्ट के मुताबिक दलित हिन्दू और पाना हरिजनों के क्रिश्चियन में परिवर्तित करने को इन घटनाओं का कारण बताया गया है लेकिन यह सच का एक छोटा हिस्सा है। हो सकता है कि यही घटना उत्प्रेरक होने कि वजह रही हो, लेकिन असल में वजह कहीं और गहरी है। यहाँ तक कि सरकार भी असल परेशानी को दूर करने में अभी तक जागरूक नहीं हुई है। सरकार अपनी जिम्मेदारी सिर्फ अदालती जाँच-परख और दंगे से पीड़ितों को मुआवजा देकर निभा रही है।
कंधमाल के उत्तेजित आदिवासियों ने उड़ीसा माइंस मंत्री पदमानभा बेहेरा के इस्तीफे की मांग की। बिगड़े माहौल के जिले फूलबनी में शांति सभा के दौरान वहाँ के आदिवासियों ने वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों को अंतिम चेतावनी दी। उन्होंने धमकी दी कि वो अपने आक्रोश को और बढ़ावा देंगे अगर सरकार उनकी मांगें पूरी नहीं करेगी। स्थानीय एम.एल.ए. बेहेरा को दोषी ठहराया गया कि वो पाना को जनजाति स्तर देने की कोशिश कर रहे हैं। अधिकारियों का कहना है कि सामुदायिक टक्कर और आदिवासियों के आक्रोश के बीच कोई कड़ी नहीं जुड़ी है। ये एक इत्तेफाक है कि सामुदायिक और जातीय संघर्ष साथ-साथ चल रहे हैं।

इस घटना की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए उड़ीसा स्टील और माईन्स मंत्री, पदमानभा बेहेरा ने इस्तीफा दिया। इस इस्तीफे ने एक बात साफ की कि ये हिन्दू कनधास या कुई जनजाति और क्रिश्चियन पाना के बीच की झड़प जनजाति का दर्जा पाने को की गई थी लेकिन इसे क्यों और किस तरह दंगों का रूप दिया गया इस सवाल पर ओड़िसा सरकार की 20 दिनों तक की चुप्पी बहुत कुछ बता देती है। वैसे तो धर्म परिवर्तन के चलते धार्मिक दंगे कई हुए हैं लेकिन कंधमाल की घटनाओं को जबरन धार्मिक रूप दिया गया जब कि यह किसी भी तरह से घार्मिक सवाल नहीं था। इसका कारण संघ गिरोह की वह तैयारी है जो पूरे इलाके को इस तरह के सांप्रदायिक तनावों और हिंसा में झोंक कर अपनी राजनीति करना चाहता है।

ओड़िसा के कंधमाल जिले के दंगों से सताए हजारों लोगों, जिनके घरों को ज़मीन में ध्वस्त किया गया, वो बर्फीली ठंड और बीमारियों से ग्रसित जंगलों में रह रहे हैं। वो घर जाने के नाम से भयभीत हैं। राजधानी भुवनेश्वर से 200 किलोमीटर की दूरी पर साम्प्रदायिक लोगों ने हजारों घर जला डाले और दर्जनों पीड़ित जो चर्चों में आश्रय ले रहे थे उनमें से पाँच लोगों कि जान चली गई क्योंकि ये घटना क्रिसमस के अवसर पर हुई थी।

जिला प्रशासन ने ये दावा किया कि जिन लोगों के घरों को आग लगा दी गई थी वे जंगलों में आश्रय लेने के लिए गए थे, वे अस्थाई सहायता केन्द्र में आश्रय ले रहे हैं, पर स्थानीय लोगों का कहना है कि अब भी हजारों कि संख्या में दंगे से पीड़ित लोग असहाय स्थिति में जंगलों में रह रहे हैं। फूलबनी जिला मुख्यालय से 100 किलोमीटर दूर 25 दिसम्बर को जब उस क्षेत्र में दंगे होने लगे तो कम से कम 3,200 लोग बराखामा गाँव से भाग निकले। बराखामा की जनसंख्या 5,000 से ज्यादा है और उनमें से 2,000 लोग पिछड़ी जाति पाना से हैं जो कि क्रिश्चियन हैं। उस क्षेत्र के तीन चर्च और दो सौ घर दंगे में क्षति ग्रस्त हो गए। लगभग 2,000 लोग गाँव वापस आ गए और बचे हुए 650 लोग बालीगुड़ा शहर के निकट प्रशासन द्वारा स्थापित किए गए सहायता कैम्प में आश्रय लिये हुए हैं। उच्च जिला प्रशासन अधिकारी ने आई.ए.एन.एस. को बताया कि लगभग 550 लोग अभी भी निकट के जंगल में रह रहे हैं। उन्होंने कहा कि प्रशासन उन्हें ढूंढने की कोशिश में है। भुवनेश्वर मौसम विज्ञान दफ्तर के अधिकारी ने कहा कि इस ठंड में पिछले सात दिनों से जिले का तापमान पाँच से छः डिग्री सेल्सियस है। जिन लोगों ने जंगल में आश्रय लिया है, उनके पास न भोजन है न कपड़े, साठ साल के बराखामा गाँव के निवासी अनादी नाईक ने बताया कि वे पत्नी के साथ जंगल की तरफ भाग गए जब सांप्रदायिक लोगों ने उनके एक कमरे वाले घर को तोड़ डाला। उनसे भय के बावजूद मंगलवार को कुछ खाने कि तलाश में वे वापस आ गए। नाईक ने कहा हम हिन्दू हैं फिर भी उन्होंने हमारे घर जलाए। उसके पास सिर्फ अपने शरीर को ढकने के लिए लंगोट बची थी, उसकी पत्नी के पास भी कपड़े के सिर्फ चंद टुकड़े ही थे। जंगलों में रह रहे स्वास्थ्य अधिकारी ने अपनी पहचान गुप्त रखने की गुजारिश करते हुए बताया कि जंगलों में रह रहे लोग डीसेंट्री, डायरिया, अंतड़ियों कि बीमारियों से ग्रसित हैं। तीन सहायता कैम्प उस क्षेत्र में खोले हैं जो 1,500 लोगों को आवास स्थान प्रदान कर रहे हैं। अधिकारी ने आगे बताते हुए कहा कि प्रशासन भोजन, कपड़े और कैम्प में पीड़ित लोगों का परीक्षण कर रहा है। लगभग एक महीने तक यह स्थिति बनी रही है और जब कि अब तक पीड़ितो में भय व्याप्त है तथा राहत और मुआवजे का इंतजार भी नवीन पटनायक सरकार की बेरुखी दरअसल सांप्रदायिक गठबंधन का ही नतीजा है जो विहिप को नाराज करने की हैसियत नहीं रखते हैं बल्कि विहिप जैसी ताक़तें ही उनका इस्तेमाल करती हैं।

इस घटना का विरोध जिस तरह होना चाहिए था नहीं हुआ। न ही विहिप की गतिविधियों पर अंकुश लगाने की कोशिश की गयी। लगभग माह भर चले इस सांप्रदायिक दंगे पर देश भी चुप रहा। केंद्र सरकार की ओर से भी जिस गंभीरता की अपेक्षा की जाती है वह नहीं देखी गयी। मामूली घटनाओं पर उड़ान भरने वाले कोई केंद्रीय मंत्री ने इसे अपनी उड़ान के लिए जरूरी नहीं समझा। इससे यह बहस उठी है कि प्राकृतिक संसाधनों से संपन्न राज्यों में जिस तरह का प्रतिरोध है क्या उसे कमजोर करने के लिए ऐसी विहिप कार्रवाइयों को नजरअंदाज किया गया? फरवरी के पहले हफ्ते में रांची में पूर्वी भारत के संघ के सभी प्रचारकों की एक गोपनीय बैठक अनगड़ा के पास हुई। इस बैठक में आदिवासियों को हिंदू बनाने की प्रक्रिया को तेज करने का फैसला लिया गया। इस बैठक में विहिप के ओड़िसा प्रयोग को सफल माना गया। दरअसल 1980 में नाना जी देशमुख ने जब सिंहभूम जिले को गोद लिया था तब उसके महत्व को नहीं समझा क्या? बंगाल ओड़िसा के इस सीमावर्ती जिले से संघ गिरोह को अपनी कार्रवाइयों को अंजाम देने में सुविधा हो रही है। कंधमाल घटना के खिलाफ जब भुवनेश्वर में कुछ धर्मनिरपेक्ष समूहों ने धरना दिया तो सौ मीटर की दूरी पर संघ गिरोह ने अपना तंबू लगा दिया और हजारों लोगों को जता कर जिस उग्र भाषा का इस्तेमाल किया उससे भविष्य का संकेत तो मिलता ही है। इस बात की आशंका पैदा होती है कि संघ गिरोह पूरी तरह इस बात के लिए आमादा है कि धर्मपरिवर्तन के सवाल को उठा कर वह पूरे इलाके में अल्पसंख्यकों को भयभीत कर दे और गठबंधन राजनीति की पूरी कीमत भी वसूल कर ले। दरअसल संघगिरोह की रणनीति दीर्घकालिक है। वह राजनीतिक परिवेश में अपनी ऐसी पैठ बना लेना चाहता है जिसमें फादर स्टेंस और उनके बेटों की हत्याएं उसकी बहादुरी मान ली जाएं। एन.डी.ए. के घटकों ने तो संघ गिरोह को प्रमाणपत्र ही देने का प्रयास किया था। दूसरी कोशिश यह है कि बिजद को भी अल्पसंख्यकों के खिलाफ करने में वह कामयाब रहे।दृपूरे दिसंबर-जनवरी के दंगों के दौरान बिजद नेताओं की भूमिका भी ऐसी ही देखी गयी। राज्य सरकार ने दमन कम करने के बजाय प्रयास यह किया कि वहां पीड़ितों का हाल जानने कोई नहीं जाए। इस गंभीर संकट से रू-ब-रू होने के बाद ऐसा लगता है कि इस इलाके में जो अपने को क्रांतिकारी आंदोलन की विरासत का संवाहक कहते हैं उन्हें भी अपने काडरों की भूमिका के बारे में सोचना चाहिए जिनमें से कई अल्पसंख्यक विरोधी अभियानों के हिस्सा बन गए। यह संकेत है कि संघगिरोह किस तरह पूरे इलाके में अपनी दुर्भावना की रणनीति और अल्पसंख्यकों के प्रति नफरत की भावना को गहरे स्तर तक पहुंचाने में कामयाब रहा है। ओड़िसा की सांप्रदायिक घटनाओं को यदि सेक्युलर ताकतों ने पूरी तत्परता के साथ मुकाबला नहीं किया तो आने वाले दिनों में इसका अत्यंत क्रूर रूप देखने को मिल सकता है।

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