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सांप्रदायिकता

अब मिलिए मुसलमान मजाज़ से

जावेद नक़वी

सेक्युलरिज्म की ब्राह्मणवादी सोच के दायरे में ये होना ही था कि 28 मार्च को मजाज़ की शान में जारी किए गए एक पांच रूपए के डाक टिकट में साम्राज्यवादी विरोधी और पूंजीवादी व्यवस्था का आलोचक कवि असरार-उल-मजाज़ का खूबसूरत चेहरा दिखे और उस चेहरे के पीछे मस्जिद की तस्वीर नजर आए।

हकीकत तो ये है कि मजाज़ जो कि एक रोमांटिक और अनीश्वरवादी शख्सियत था, उसका मस्जिद से लेना-देना ही नहीं रहा। ठीक वैसे ही जैसे फ़ैज़ और जोश या फिर उससे पहले मीर और ग़ालिब जैसे शायरों की शख्सियत थी। लेकिन हमारी सोच और बहुत हद तक सरकारी सोच उर्दू और मुसलमान या फिर उर्दू या मुसलमान और मस्जिद को एक ही समझती है। ऐसा केवल भारत में ही नहीं है।

पाकिस्तान के शुरू के दौर के रहनुमा भी ऐसे ही जाल में फंसे थे। तब तक, जब तक कि बांगलादेश वजूद में नहीं आ गया। बांगलादेश का वजूद में आना इस बात का सबूत है कि ऐसी सोच एक बड़ी भूल थी जिसकी भारी कीमत पाकिस्तान को चुकानी पड़ी। ख़ैर जो भी हो, गलत वजहों से ही सही पाकिस्तान में उर्दू बची रही और भारत की तरह उसे धीरे-धीरे मौत की तरफ नहीं बढ़ना पड़ा। कुछ समय पहले जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली के प्रबुद्ध वाइस चांसलर की कोशिश के बाद मीर तक़ी मीर के नाम पर एक कॉन्फ्रेंस हाल का उद्घाटन हुआ।

इसी परिसर में एक कमरा है जिसे मर्सिया निगारी के बेताज बादशाह मीर अनीस की याद में समर्पित किया गया है। इन कोशिशों का परिणाम क्या निकलता है ये तो भविष्य ही बताएगा। आखिरी बार जब मैंने मीर अनीस के बारे में कुछ सुना था तो वो कुछ यूं था कि जिस जगह पे मीर अनीस की कब्र मानी जाती है वो हिस्सा काटते हुए रेलवे लाइन गुजरेगी।
आज अगर हम ग़ालिब की मज़ार देख पाते हैं वो इसलिए कि फ़िल्मकार सोहराब मोदी ने हज़रत निजामुद्दीन औलिया की ख़ानक़ाह के पास ग़ालिब की कब्र पर संगमरमर लगवा कर महफूज कर दिया वरना उसके इर्द-गिर्द पहले की तरह ही तरह-तरह के जानवर तमाम तरह की हरकतें करते पाए जाते। कुछ साल पहले ग़ालिब की शताब्दी समारोह के समय पुरानी दिल्ली की गली क़ासिम जान में ग़ालिब की मशहूर हवेली से कोयले की टाल हटाई गई और उसे सुरक्षित किया गया। हालांकि अभी भी वहां पर पब्लिक टेलीफ़ोन बूथ मौजूद है लेकिन कम से कम आज ग़ालिब के अनगिनत चाहने वाले तंग गलियों से गुजरकर ग़ालिब की खूबसूरत हवेली के दर्शन कर सकते हैं।

शायद मैं कुछ ज्यादा ही शिकायतें कर रहा हूं। हमें ये तो मानना ही पड़ेगा कि उर्दू साहित्य और शायद भुला दी गई उर्दू ज़बान के लिए यह आम बात नहीं है कि मजाज़ जैसे शायरों को ये इज़्ज़त बख़्शी जाए। ऐसा शायद इसलिए है कि हमारा नया शासक वर्ग इसमें शर्म महसूस करता है। हम भूल जाते हैं की उर्दू ज़बान की तहज़ीब में प्रतिरोध के तेवर, इंसान द्वारा इंसान के शोषण का विरोध, इश्क-ओ-मोहब्बत के नग़में, रूहानियत या रहस्यवाद, साम्राज्यवाद विरोध, खुदा और मुल्लाओं के साथ शोखी भरी बातचीत भरी पड़ी है। इस ज़बान और इसके साहित्य में क़दम क़दम पर मुल्लाओं को मज़हब के बेईमान ठेकेदारों के रूप में पेश किया गया। हमारा नया भारतीय राष्ट्र मुल्लाओं के साथ गठजोड़ करके उर्दू को इन मुल्लाओं के धार्मिक नुसख़ों का एक ज़रिया बनाता जा रहा है। यही वजह है कि ग़ालिब पर आयोजित एक सरकारी समारोह के दौरान बाग़ी शायर साहिर लुधियानवी ने कहा :
ग़ालिब जिसे कहते हैं कि उर्दू का ही शायर था
उर्दू पे सितम ढा के ग़ालिब पे करम क्यों है

52 साल पहले एक बर्फीली सर्दी की सुबह लखनऊ के एक देसी शराबख़ाने से जिस नास्तिक मजाज़ को उठाया गया था आज वही मजाज़ भारत की राजधानी में एक धार्मिक मुसलमान के रूप में नजर आ रहा है। एक राहगीर की नज़र पड़ने पर मजाज़ को लखनऊ के बलरामपुर अस्पताल में भर्ती किया गया और शायद कुछ घण्टे और सांस लेने के बाद (निमोनिया या सिरॉसिस की वजह से) उसने दम तोड़ दिया। इस दर्दनाक हादसे की खबर बड़ी तेजी से चारों ओर फैल गई क्योंकि ये वो ज़माना था जब पूरे देश में प्रगतिशील लेखक संघ का डंका बजता था।

मजाज़ को मस्जिद के साथ पेश करने जैसी घटना केवल उन्हीं तक सीमित नहीं है। एक जमाने में कांग्रेस ने मोहम्मद अली जिन्ना के सेक्युलर मूल्यों को नज़रअंदाज करके जिन्ना जैसे राष्ट्रीय नेता को भारतीय मुसलमानों का एक छोटा-मोटा प्रतिनिधि बना कर पेश कर दिया था।

ऐसी हरकत का उलटा ही असर हुआ और जिन्ना सचमुच मुसलमानों के नेता बनकर उभरे। क्या भारत सरकार इस मुल्क के सबसे बड़े उदारवादी चेहरे पंडित जवाहर लाल नेहरू के साथ किसी स्टाम्प पर किसी मंदिर की तस्वीर छाप सकते हैं। जबकि ये सच है कि नेहरू ने दक्षिण भारत के अनेक भव्य मंदिरों को देखकर सराहा था। मेरा विश्वास है कि वे ऐसी हिम्मत नहीं करेंगे। उन्हें मालूम है कि तस्वीरें शब्दों से कहीं अधिक ताक़तवर होती हैं।

अलीगढ़ विश्वविद्यालय में सारा कुछ मस्जिद ही नहीं है जैसा कि डाक टिकट में दिखाया गया है। इस विश्वविद्यालय में अंग्रेजों द्वारा बनवाया गया स्ट्रेची हाल और अनेक सेक्युलर प्रतीक मौजूद हैं। इस यूनिवर्सिटी को देखते ही मुझे महान इतिहासकार इरफान हबीब और प्रगतिशील लेखक और कवि जज़्बी और सरदार जाफ़री जैसे लोगों की याद आती है। और फिर मजाज़ तो हैं ही। इस विश्वविद्यालय में उर्दू के मशहूर कवि शहरयार ने भी ज़िंदगी बिताई जिन्हें उमराव जान जैसी फिल्मों के गीतकार के रूप में जाना जाता है।

मस्जिद मजाज़ के साथ गलत प्रतीक कैसे है इसके लिए मैं मजाज़ की ही पंक्तियां उदाहरण के रूप में पेश कर रहा हूं। 1939 में ख्वाबे-शहर के नाम से उन्होंने ये कविता लिखी। कविता का शीर्षक स्वयं बताता है कि मान्यता रही है कि सुबह के ख्वाब अक्सर सच होते हैं। इस कविता में इंसानों द्वारा मजहब की तिजारत की बात कही हुई है। इसकी कुछ पंक्तियां इस तरह हैं :
मस्जिदों में मौलवी खुतबे सुनाते ही रहे
मंदिरों में ब्राह्मण श्लोक गाते ही रहे
इक न इक दर पर जबीन-ए-शौक घिसती ही रही
आदमियत जुल्म की चक्की में पिसती ही रही
रहबरी जारी रही, पैग़म्बरी जारी रही
दीन के परदे में जंग-ए-ज़रगरी जारी रही।

दक्षिण एशिया के मुसलमानों के साथ उर्दू को जोड़ देना भारत में उर्दू के साथ बहुत बड़ी बेइंसाफी होगी। इसमें दो तरह की असंवेदनशीलता शामिल है। एक तरफ़ तो ये बेइंसाफी है दक्षिण एशिया के उन मुसलमानों के साथ जो तमिल, मलयालम, तेलुगू, कोंकणी, गुजराती, बंगाली, बलोच, पंजाबी और पश्तो ज़बानें बोलते हैं और दूसरी तरफ उन शायरों के साथ होने वाली बेइंसाफी का क्या कहा जाए जिसमें हिंदू और सिख शायरों की एक लंबी सूची है। ब्रज नारायण चकबस्त, प्रेमचंद, फ़िराक गोरखपुरी, उपेंद्रनाथ अश्क, राजेंद्र सिंह बेदी, कृश्न चंदर, मालिक राम और राम लाल आदि। इनके अलावा अनगिनत एंग्लो इंडियन लेखक और शायर भी उर्दू की खि़दमत कर चुके हैं। डाक टिकट जारी करते हुए भारत के उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने मजाज़ को एक क्रांतिकारी कवि बताया जिसने एक पूरी पीढ़ी को प्रभावित किया। उनके अनुसार “उनकी कविताएं रूमानियत और क्रांति की प्रतीक हैं।” रसीदी टिकट के किसी कोने से झांकते हुए मजाज़ ने पूरे कार्यक्रम, जहां अपने भांजे फिल्मकार जावेद अख्तर और बहन हमीदा सलीम पर भी उनकी नजर पड़ी होगी, का ज़रूर मजाक उड़ाया होगा। भारत की मरती हुई जबान उर्दू में लिखे गए एक शेर में मजाज़ ने क्या खूब कहा है :
बख़्शी हैं इश्क ने हमको वो जुर्रतें मजाज़,
डरते नहीं सिसायत-ए-अहले-जहां से हम।  

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