Readings - Hindi

सांप्रदायिकता

अजमेर शरीफ के बम धमाके
चुप्पी के षडयंत्र को भेदने की जरूरत

सुभाष गाताडे

अभिनव भारत, मालेगांव बम धमाके में शामिल इस हिन्दू अतिवादी संगठन ने ही शायद अजमेर शरीफ बम धमाके को अंजाम दिया है। राजस्थान के आतंकवाद विरोधी दस्ते का कहना है कि अजमेर दरगाह में वर्ष 2007 में हुए धमाके की जांच के सूत्र अभिनव भारत के सदस्यों तक पहुंचते दिख रहे हैं।

एन.डी.टी.वी. को दिए एक विशेष साक्षात्कार में राजस्थान एटीएस के प्रमुख कपिल गर्ग ने इस बात को स्वीकारा है कि अभिनव भारत अब हमारे निशाने पर है। पिछले दिनों राजस्थान पुलिस की एक विशेष टीम ने मुम्बई जाकर मालेगांव धमाके के मास्टर माइंड लेफ्टिनेंट कर्नल एस पी पुरोहित और अन्य अभियुक्तों के नार्को परीक्षण और ब्रेन मैपिंग टेस्ट से जुड़े बयानों एवम रिपोर्टों को एकत्रित किया।

पुलिस सूत्रों का कहना है कि लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित पर किए नार्को परीक्षण और ब्रेन मैपिंग टेस्ट ने इस बात को उजागर किया कि एक अन्य सदस्य, दयानन्द पाण्डेय, जो मालेगांव धमाके का आरोपी है, उसने अजमेर धमाके की योजना बनायी थी जिसमें दो लोग मारे गए और लगभग 20 लोग अक्तूबर 2007 में घायल हुए।
(एनडीटीवी, अभिनव भारत अण्डर स्कैनर फॉर 07 अजमेर ब्लास्टराजन महान, मंगलवार, 14 अप्रैल 2009, जयपुर)

1.
डेढ़ साल से अधिक वक्त गुजर गया जब अजमेर शरीफ के बम धमाके में 42 वर्षीय सैयद सलीम का इन्तक़ाल हुआ था। महान सूफी सन्त ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की इस दर्गा पर 11 अक्तूबर 2007 को बम विस्फोट में जो दो लोग मारे गए थे, उनमें एक वहभी शामिल था। हालात बता सकते हैं कि सैयद सलीम की मौत बहुत दर्दनाक ढंग से हुई। जैसा कि बताया जा चुका है इस धमाके में तमाम लोग बुरी तरह घायल भी हुए, जब वह प्रार्थना करने की मुद्रा में थे।

न सैयद सलीम की पत्नी, न ही उनके दो बच्चे और न ही भाई-बहनों का उसका लम्बा चौड़ा कुनबा, किसी ने भी इस बात की कल्पना नहीं की होगी कि इतने मृदुभाषी शख्स की मौत इतनी पीड़ादायक स्थिति में होगी। उसके दोस्तों को आज भी याद है ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती—जिन्हें गरीब नवाज़ भी कहा जाता है—उनके प्रति अपने अगाध सम्मान के चलते ही सलीम ने अजमेर में रहने का फैसला किया था, और वहां पर सौंदर्य प्रसाधन का बिजनेस शुरू किया था। इतनी लम्बी चौड़ी कमाई नहीं थी कि बार-बार अजमेर से हैदराबाद आना मुमकिन होता, लिहाजा साल में एक दफा वह जरूर आते।

गौरतलब है कि सैयद सलीम के आत्मीयजनों के लिए उसकी इस असामयिक मौत से उपजे शोक के साथ-साथ एक और सदमे से गुजरना पड़ा और इसकी वजह थी पुलिस एवम जांच एजेंसियों का रूख जिन्हें यह लग रहा था कि सैयद सलीम खुद इस हमले के पीछे थे। मक्का मस्जिद बम धमाके और अजमेर के बम धमाके के बीच की समरूपता को देखते हुए राजस्थान की पुलिस टीम ने आकर इस बात की भी छानबीन की कि कहीं सैयद सलीम खुद आतंकवादी तो नहीं था। ऐसी घटनाओं को सनसनीखेज अन्दाज़ में पेश करने वाले मीडिया के एक हिस्से ने भी यह ख़बर उछाल दी कि ‘मृत व्यक्ति के जेब से कुछ ‘सन्देहास्पद वस्तु’ बरामद हुई।
—(डीएनए, 13 अक्तूबर 2007)

अपने इस दावे—कि इस घटना को ‘हुजी’ से जुड़े आतंकवादियों ने ही अंजाम दिया है—को बिल्कुल हकीकत मान रही राजस्थान पुलिस ने इस सिलसिले में छह लोगों को हिरासत में भी ले लिया था जिसमें दो बांगलादेशी भी शामिल थे। पुलिस के मुताबिक सिम कार्ड लगाए एक मोबाइल टेलिफोन के जरिए विस्फोट को अंजाम दिया गया। तत्कालीन गृहमंत्री शिवराज पाटिल ने यह भी कहा कि बम धमाके ‘सरहद पार दुश्मनों के इशारे पर’ हुए हैं।

हम अन्दाज़ा लगा सकते है कि मामले की तहकीकात कर रही राजस्थान पुलिस की टीम ने सैयद सलीम के परिवारजनों के साथ क्या व्यवहार किया होगा। माता-पिता, भाई-बहन, पत्नी सभी को खाकी के डर से रूबरू होना पड़ा होगा। ऐसे अन्य अनुभवों को देखते हुए हम सहज ही अन्दाजा लगा सकते हैं कि समूचे परिवार को ‘आतंकवादी’ के परिवार के तौर पर लोगों के ताने सुनने पड़ें होंगे।

अब जबकि सच्चाई से परदा हटने को है और खुद पुलिस यह कह रही है कि अभिनव भारत के आतंकवादियों ने अजमेर बम धमाके के अंजाम दिया है, ऐसे में यह पूछना क्या ज्यादति होगी कि पुलिस को चाहिए कि वह सैयद सलीम के परिवारवालों के नाम एक ख़त लिखे और जो कुछ हुआ उसके लिए मुआफी मांगे।

2.
आतंकवादी हमले का निशाना ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह थी, जिसे लोग ख्वाजा गरीब नवाज़ के नाम से भी जानते हैं। सूफी मत की खासियत के अनुसार इस दरगाह पर हिन्दु एवम मुसलमान दोनों प्रार्थना करने आते हैं। ख्वाजा गरीब नवाज़ का जब उर्स लगता है तो सैकड़ों हजारों लोगों का वहां ताता लगा रहता है और अजमेर शहर श्रद्धालुओं से भरा रहता है। आतंकी बम विस्फोट इस मायने में ऐतिहासिक था क्योंकि उसके सदियों पुराने इतिहास पर भी नज़र दौड़ायें तो पता चलता है कि वहां पहली दफा प्रार्थनास्थल के स्थान पर मासूमों का खून गिरा।

अक्सर जैसा कि उस वक्त़ की रवायत थी—जबकि हिन्दुत्व आतंक का मसला सूर्खियों में नहीं पहुंचा था—चन्द अतिवादी इस्लामिक संगठनों को इस बम काण्ड के लिए जिम्मेदार ठहराया गया। कई लोगों को गैरकानूनी ढंग से हिरासत में लिया गया, तमाम लोगों से पूछताछ की गयी, सूचना पाने के लिए तमाम लोग यातना का शिकार बना दिए गए। मीडिया भी इस मामले में पीछे नहीं रहा, उसने आतंकवादियों की योजनाओं और इस अमानवीय एवम बर्बर कृत्य के तर्जे अमल पर सनसनीखेज स्टोरी प्रकाशित की और बिना किसी सबूत के यह भी बताया कि इस घटना के सूत्र ‘सरहद पार’ जुड़े हुए हैं।

इस सम्बन्ध में एक अख़बार में प्रकाशित स्टोरी पर नज़र डालना समीचीन होगा, जिस अख़बार को आम तौर पर सेक्युलर विचारों का समझा जाता है। (आज भले ही हमे ऐसी स्टोरी ‘मनोरंजक’ लगे क्योंकि यह स्पष्ट है कि झूठ का पुलिन्दा मात्र है, लेकिन हम कल्पना कर सकते हैं कि समुदाय विशेष को निशाना बनाने में या उसका ‘आतंकवादीकरण’ करने में ऐसी रिपोर्टें कितनी ‘कारगर’ साबित होती होंगी।)

हैदराबाद पुलिस को इस बात के सबूत मिले हैं जो बताते हैं कि मक्का मस्जिद बम धमाके और अजमेर धमाके में जो ‘इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाईसेस’ (आईईडी) का प्रयोग हुआ वे हैद्राबाद में बने थे।

बांगलादेशी हुजी कार्यकर्ता अबू हामजा ने मई के प्रथम सप्ताह में हैद्राबाद में आठ आईईडी तैयार किए और विस्फोटक सामग्री लश्कर ए तोइबा से जुड़े आतंकी महाराष्ट्र के शेख अब्दुल नईम ने बांगलादेश से शहर में पहुंचायी। जबकि दो आईईडी का इस्तेमाल मक्का मस्जिद बम धमाके में किया गया, जबकि चार अन्य को अजमेर भेजा गया। मस्जिद में एक बम फट नहीं सका।

‘‘हम लोगों ने इस ताजे खुलासे के बारे में सूचित किया है। हालांकि अभी यह पता नहीं है कि अन्य दो बम कहां भेजे गए।’’ उन्होंने कहा।

मस्जिद धमाके के संदिग्धों पर जो नार्कोपरीक्षण किया गया उस दौरान इन तथ्यों का खुलासा हुआ और आतंकी हमले के बारे में विवरण तैयार करने में हैद्राबाद पुलिस को मदद मिली।

अब्दुल मोहम्मद शाहिद और खाजा, हैदराबाद के रहने वाले दोनों हुजी कार्यकर्ताओं ने—जो इन दिनों विदेशों में हैं—मस्जिद धमाके की योजना बनायी।

नईम ने विस्फोटकों को स्मगलिंग के जरिए हासिल किया और हस्मापेठ के रहने वाले किन्हीं इमरान को उसके रिश्तेदार शोएब जागीरदार के जरिए सौंपा।

पुलिस का कहना है कि खाजा का भाई खादेर, जो इन दिनों दुबई में हैं, उसने इस काण्ड में तकनीकी सहायता प्रदान की।

खादेर काम की तलाश में फरवरी में ही दुबई गया था और दो माह के अन्दर घर लौटा। हालांकि, वह कुछ दिनों तक हैदराबाद में ही रहा और मस्जिद धमाके के चन्द रोज पहले दुबई गया।

मई के पहले सप्ताह में मजनू, तनवीर और जबीं तथा दो अन्य के साथ—जो सभी बांगलादेशी थे—हामजा हैदराबाद आया।
उन्होंने इमरान के घर आईईडी बनाया और उन्हें रफी एवं कबीर को सौंपा, जो दोनों हैदराबाद के ही थे। शाहिद के बचपन के दोस्त करीम डब्ब्बा ने मस्जिद में आईईडी रखे।

इसमें विस्फोट करने के लिए मोबाइल फोन अलार्म प्रणाली का प्रयोग किया। पुलिस के मुताबिक शाहिद, दुबई में रहनेवाले उसके भाई समद के जरिए, विभिन्न आतंकी गुटों को वित्तीय मदद भेजता था।

डब्बा, जो एक गरीब मैकॅनिक था, उसे मस्जिद में विस्फोटक रखने के लिए एक हजार रूपए दिए गए। हालांकि पुलिस ने बम विस्फोट में शामिल लगभग 25 लोगों को पहचान लिया है, इनमें से आठ को उसने षडयंत्र में शामिल होने के आरोप में पहले ही गिरफ्तार किया है। शाहिद और खाजा अभी भी फरार हैं।

आईस्क्रीम बांटे

गौरतलब है कि यही लोग गोकुल चाट और लुम्बिनी बम धमाके में शामिल बताए जाते हैं।

‘‘हमारे पास इस बात के सबूत हैं कि हामजा ने ढाका में किन्हीं चौधरी के घर में आसरा लिया था और मस्जिद धमाके की ख़बर पाकर उसने आईस्क्रीम बांटे थे।’’

(मक्का मस्जिद, अजमेर ब्लास्ट बाम्बस् मेड इन हैदराबाद, जनवरी 12, 2008, हिन्दू, मारी रामू)

वे सभी जो हिन्दोस्तां के विभिन्न बम धमाकों के मामलों की खोजख़बर रखते रहे हैं वे बता सकते हैं कि मक्का मस्जिद बम धमाके (मई 2007) - जिसमें नौ निरपराधों की मौत हुई थी और बाद में हुई पुलिस फायरिंग में भी चन्द लोग मारे गए थे - की पुलिसिया कहानी धराशायी हो गयी है। यह बात अब इतिहास हो चुकी है कि किस तरह इस काण्ड के लिए पहले लश्कर ए तोइबा और सिमी को जिम्मेदार ठहराया गया था। हैद्राबाद के विभिन्न इलाकों से निरपराध मुस्लिम युवकों को उठाया गया था और महिनों तक गैरकानूनी हिरासत में रखा गया था। सभी को जबरदस्त यातनाएं दी गयीं ताकि वह इस अपराध में अपनी सहभागिता कबूल करें। अन्ततः नागरिक अधिकार संगठनों को इन गैरकानूनी हिरासत के खिलाफ उच्च न्यायालय में हेबियस कार्पस याचिकाएं दायर करनी पड़ीं तभी पुलिस ने इनमें से कइयों को छोड़ा। हालांकि इनमें से 21 लोगों पर उसने षडयंत्र में शामिल होने के आरोप लगा कर उनके खिलाफ आरोपपत्र भी दाखिल किए। उन सभी पर राज्य के खिलाफ युद्ध छोड़ने और विस्फोटक ले जाने जैसे गम्भीर आरोप लगे।

विगत दिसम्बर माह में हैदराबाद के सातवें अतिरिक्त मेट्रोपालिटन सेशन जज ने इनमें से 17 लोगों को बेदाग बिना शर्त बरी किया। दरअसल पुलिस के पास इनके खिलाफ कोई सबूत नहीं थे। गौरतलब है कि इन सतरह लोगों की रिहाई के चन्द रोज पहले शोएब जागीरदार और बाकी तीन को भी अदालत ने सबूतों के अभाव में बरी किया था।

3.
इरफान इंजीनियर, जो एक सामाजिक कार्यकर्ता एवं लेखक हैं, उन्होंने अजमेर बम धमाके के तत्काल बाद अपने एक आलेख में कुछ महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए थे। प्रस्तुत आलेख कई वेबसाइटों एवम ब्लॉग्स पर प्रकाशित हुआ। ‘अजमेर ब्लास्ट : हू वॉन्टस् कम्युनल डिसहार्मनी इन इण्डिया’ 14 अक्तूबर 2007, शीर्षक इस लेख में पुलिस एवम प्रशासन में मुसलमानों को लेकर व्याप्त चिन्तन पर प्रश्न खड़े किए गए थे।

...जैसा कि अन्दाज़ा था, बम धमाके के बारे में समाचार जानने के लिए टीवी खोलने के पहले ही, यह भविष्यवाणी की जा सकती थी कि इस काण्ड के लिए हुजी या ऐसा ही कोई मुस्लिम अतिवादी संगठन को जिम्मेदार ठहराया जाएगा। और वाकई, जैसे ही पुलिस एवम जांच दल के अन्य सदस्य वहां पर पहुंचे, उन्हें मालूम था कि इस अपराध के लिए किस पर दोषारोपण करना है।

हरेक को बताया जाएगा कि अधिक जांच के लिए पुलिस हुजी से सम्बधित किसी बिलाल को तलाश रही है। जैसे भी हो यह सच्चाई है कि लोगों की याददाश्त बहुत कमजोर होती है। हमारे मुल्क की यही दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है।

इस बम धमाके के लिए जो कथित कारण बताए जा रहे हैं उनमें यही बात प्रमुख है कि जिसने भी बम रखे वह साम्प्रदायिक दंगों को भड़काना चाहते थे। यहभी कहा गया कि सुन्नी इस्लाम का एक हिस्सा जो दर्गा के खिलाफ है, यही सम्भवतः एक कारण हो सकता है, इसलिए दर्गा को निशाना बनाया गया। अगर यही एकमात्र कारण है हुजी या किसी अन्य मुस्लिम संगठन पर दोषारोपण करने का तो निश्चित ही जांच का काम बहुत अधूरा हो सकता है और कमजोर साबित हो सकता है। दरअसल, जांच पड़ताल भी दिखावे की चीज़ बन कर रह जाएगा। दरगाह पर मुसलमानों के जाने का विरोध सिर्फ देवबन्दी और वहाबी इस्लाम के अनुयायी ही नहीं करते हैं।

उन लोगों को भी देखें जो मुसलमानो के दरगाह जाने का एवम वहां पूजा करने का विरोध करते हैं। अस्सी के दशक में शिवसेना ने उत्तर-पूर्वी बम्बई के इलाके कल्याण में स्थित हाजी मलंग दरगाह पर कब्जा करने की मुहिम चलायी थी। वर्ष 1982 से शिवसेना के अनन्त दिघे ने मलंग मुक्ति आन्दोलन नामक मुहिम चलायी थी। हर साल उर्स के दिन वहां शिवसैनिक प्रदर्शन करते थे। शिवसेना का कहना था कि हाजी मलंग दरअसल मच्छिन्द्रनाथ पंथ की समाधि है और उसे हिन्दुओं को सौंपा जाना चाहिए। शिवसेना-भाजपा गठबन्धन जब 1996 में सत्ता में आया तो तत्कालीन मुख्यमंत्री मनोहर जोशी ने उद्धव ठाकरे और गणेश नाइक के साथ जाकर वहां गणेश पूजा की थी।

...प्रश्न उठता है कि आखिर क्यों न शिवसेना को बम धमाके का जिम्मेदार माना जाए क्योंकि वह भी साझे प्रार्थना स्थलों के खिलाफ रहा है ? अगर यही आधार है तो सन्देह की सुई शिवसेना की तरफ मुड़नी चाहिए।

संघ परिवार ने बाबा बुढ़नगिरी स्थल को विवादग्रस्त बना दिया, जो कर्नाटक के चिकमगलूर से 40 किलोमीटर दूर स्थित है। बाबा बुढ़न सूफी सन्त थे और दत्तात्रोय के शिष्य थे। बाबा बुढ़नगिरी पहाड़ों में ही बस गए और उन्होंने वहां कॉफी की नींव डाली। उनकी मौत के बाद वहां एक दरगाह बना और सभी समुदायों के लोग वहां दर्शन करने के लिए पहुंचते हैं। दरगाह को यहभी सम्बोधित किया जाता है ‘गुरू दत्तात्रोय बाबाबुड़नगिरी दरगाह’। कर्नाटक में साझी संस्कृति की पहचान है वह जगह। ...संघ परिवार के लोग साझी संस्कृति की उपरोक्त जगह पर सिर्फ हिन्दुओं का दावा ठोंक रहे हैं। आखिर किस वजह से संघ परिवारी संगठनों को संदिग्धों की सूची में डाला नहीं जा रहा है क्योंकि वह भी मुसलमानों द्वारा दरगाह पहुंचने के खिलाफ हैं।

लेख में इस बात को समझने की कोशिश की गयी थी आखिर एक के बाद एक प्रार्थना स्थलों को क्यों निशाना बनाया जा रहा है। लेख में यह उम्मीद भी जाहिर की गयी थी कि जांच एजेंसियां अधिक गम्भीरतापूर्वक काम करेंगी, निष्पक्ष तरीके से सूबतों को इकट्ठा करेंगी और सभी कोणों से पड़ताल करेंगेी वरना हिन्दोस्तां में ऐसे तमाम प्रसंग सामने आएंगे जहां अल्पसंख्यकों को ही निशाना बनाया गया हो।

4.
कुछ दिन पहले अजमेर बम धमाके का मसला नए सिरेसे सामने आया। महाराष्ट्र आतंकवाद विरोधी दस्ते और राजस्थान आतंकवाद विरोधी दस्ते ने इस मामले को अंजाम देनेवालेां के बारे में कुछ महत्वपूर्ण तथ्य पेश किए। गौरतलब है कि इस महत्वपूर्ण जानकारी के बारे में ज्यादातर अख़बारों ने खामोश रहना ही मुनासिब समझा। कुछ गिनेचुने अख़बारों ने ही इसके बारे में लिखा।

इन प्रगटीकरणों सार यही था कि अजमेर बम धमाकों को उसी हिन्दुत्व आतंकवादी संगठन ने अंजाम दिया है, जिसने मालेगांव बम धमाके किए थे। यहां इशारा लेफ्टनन्ट कर्नल पुरोहित की अगुआई वाले अभिनव भारत की तरफ इशारा था। अंग्रेजी अख़बार ‘मेल टुडे’ ने (‘मालेगांव एक्यूजड हैड रोल इन अजमेर, कृष्ण कुमार, 19 अप्रैल 2009) लिखा :
महाराष्ट्र एटीएस का मानना है कि मालेगांव बम धमाके में जिन तीन संदिग्धों ने बम रखा था, उनकी गिरफ्तारी से ही हैद्राबाद के मक्का मस्जिद एवम अजमेर शरीफ बम धमाके के सुराग मिल सकते हैं।

बीते शनिवार को एटीएस के वरिष्ठ अधिकारी ने मीडिया को बताया कि मालेगांव धमाके का इन दो धमाकों से सम्बन्ध है क्योंकि ‘अभिनव भारत’ के लोगों ने ही इसे अंजाम दिया।

इन तीन संदिग्धों के नाम हैं शिवनारायण कालसांगरा, समीर डांगे और प्रवीण मुतालिक। एटीएस इन तीनों को ढूंढ रही है, जो उसके मुताबिक नेपाल में कहीं शरण लिए हुए हैं।

एटीएस के अधिकारी का वक्तव्य महत्वपूर्ण है क्यांेकि जयपुर पुलिस भी अभिनव भारत की अजमेर बम धमाके में भूमिका की जांच कर रहा है।

पुरोहित और दयानन्द पाण्डेय की आपसी बातचीत इस बात को उजागर करती है कि दोनों अन्य धमाकों भी शामिल थे।

जबकि पाण्डेय का यह दावा था कि हैद्राबाद बम धमाके को भी आई एस आई नहीं बल्कि हिन्दुत्व आतंकवादी संगठन ने अंजाम दिया, पुरोहित ने अपनी पीठ थपथपाते हुए कहा था कि उसने पहले मालेगावं बम धमाके जैसे दो काण्डों को अंजाम दिया है। एटीएस का मानना है कि ये दो काण्ड हो सकते हैं मक्का मस्जिद और अजमेर शरीफ धमाके।

अजमेर शरीफ बम धमाके को लेकर ‘अभिनव भारत’ की तरफ घुमती सन्देह की सुई को लेकर बरबस मालेगांव बम धमाके के मामले में जारी तफ्तीश की तरफ ध्यान जाना स्वाभाविक है। इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि महाराष्ट्र एटीएस प्रमुख हेमन्त करकरे की असामयिक मृत्यु के कारण यह मामला भी उतनी रफ्तार से नहीं बढ़ पा रहा है। करकरे के स्थान पर आए नए एटीएस प्रमुख का अपना पुराना रेकार्ड निश्चित ही उत्साह जगानेवाला नहीं है।

यह अकारण नहीं कि ऐसे कई आरोपी - जिनका मालेगांव बम धमाके को अंजाम देने से नजदीकी से सम्बन्ध था—वे आज तक गिरफ्तार नहीं किए जा सके हैं। फिर चाहे दिल्ली के अग्रणी डाक्टर आर पी सिंह हों, अभिनव भारत की अध्यक्षा हिमानी सावरकर हों या दिल्ली के संसदीय चुनाव में अपना भाग्य आजमा रहे एक विवादास्पद प्रत्याशी हों। सुश्री हिमानी सावरकर ने पुलिस को यह भी बताया था कि मालेगांव बम धमाके की योजना की उन्हें जानकारी थी। लेफ्टनेन्ट कर्नल पुरोहित ने जांचकर्ताओं का यहभी बताया था कि उन्हें विहिप के अग्रणी नेता तोगडिया ने आर्थिक सहयोग प्रदान किया था (सीएनएन-आईबीएन, 24 नवम्बर 2009) यह जुदा बात है कि इन आरोपों का खण्डन किया था।

सीएनएन में प्रकाशित रिपोर्ट बताती है कि किस तरह विश्व हिन्दू परिषद के अन्तरराष्ट्रीय सचिव तोगड़िया ने पुरोहित से सम्पर्क कायम किया था।

नई दिल्ली : मालेगांव बम धमाके के बारे में एक सनसनीखेज खुलासे में लेफ्टनन्ट कर्नल पुरोहित ने दावा किया है कि ‘अभिनव भारत’ को आर्थिक सहायता दिलाने में तोगडिया भी शामिल रहे हैं।
मालूम हो कि 29 सितम्बर 2008 को सम्पन्न मालेगांव बम धमाके के सिलसिले में ‘अभिनव भारत’ की जांच चल रही है जिसमें कमसे कम छह लोग मारे गए थे।

लेफ्टनन्ट कर्नल पुरोहित, जिसे धमाके का मास्टरमाइंड बताया जा रहा है, उसने यह दावा किया है कि तोगड़िया ने संगठन को कुछ वित्तीय मदद दी थी।

सी बी आई की जांच के दौरान पुरोहित ने यह दावे किए थे।

उसने इस बात को उजागर किया कि किसी दिन उसके पास एक व्यक्ति का फोन आया जो अपने आप को विश्व हिन्दू परिषद का महाराष्ट्र सचिव बता रहा था और उसने मुझसे यह जानना चाहा कि तोगड़िया पूछ रहे हैं कि नांदेड मामले की जांच कौन कर रहा है।

हालांकि तोगड़िया ने अभिनव भारत के साथ अपने सम्बन्धों को नकारा है। उनका कहना था कि यह आरोप निराधार है, आपराधिक बदनामी करनेवाले और गलत नियत से किए गए हैं और राजनीतिक कारणों से उन्हें उछाला जा रहा है।
(पुरोहित क्लेम्स तोगडिया फण्डेड अभिनव भारत, सीएनएन- आईबीएन, सोमवार, 24 नवम्बर 2008, 11:45 बजे, सोमवार, 24 नवम्बर 2008 को 12:53 को अपडेटेड)

हम यह भी देख सकते हैं कि मालेगांव बम धमाके के पहले ऐसे जो बम विस्फोट हुए जिनमें हिन्दुत्ववादी संगठनों के कार्यकर्ताओं की संलिप्तता प्रगट हो रही थी, उनमें जांच को आगे नहीं बढ़ाया गया।

अगस्त 2007 में हुए कानपुर बम धमाके इसका स्पष्ट उदाहरण हैं, जिनमें राजीव मिश्रा और भूपेन्द्र सिंह अरोड़ा जैसे दो नौजवान मारे गए थे। मालूम हो कि इन बम धमाकों के बाद विस्फोटकों का जो जखीरा बरामद हुआ था, उसे देख कर कानपुर के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया था कि इससे आधे कानपुर को तबाह किया जा सकता था। अभियुक्तों के घरों एवम ठिकानों पर की गयी छापेमारी में फिरोजाबाद के मुस्लिमबहुल इलाके के नक्शे भी बरामद हुए थे। क्या हुआ इस मामले का? राजीव और भूपेन्द्र के दो करीबियों का नार्को टेस्ट हुआ और उन्हें बाद में बाइज्जत रिहा किया गया, लेकिन उन्होंने जिन सूत्रों की ओर इशारा किया था, उन तक पहुंचने की पुलिस ने जरूरत नहीं समझी; जिनमें एक आई आई टी कानपुर का कार्यरत प्रोफेसर का नाम भी था।

इन बम धमाकों से जुड़े एक अन्य महत्वपूर्ण तथ्य की ओर कांग्रेस के एक नेता ने कुछ समय पहले इशारा किया था। पूर्वमुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह जो हिन्दुत्ववादी संगठनों के आतंकी रूझानों को उजागर करने में लम्बे समय से सक्रिय रहे हैं, यहां तक उनके मुख्यमंत्रीत्व काल में हुए नीमच बम विस्फोट आदि को लेकर भी उन्होंने हमेशा आवाज बुलन्द की है, उनका कहना था कि यह एक विचारणीय प्रश्न है कि जबसे मालेगांव बम धमाकों के मास्टरमाइंड हिन्दुत्व आतंकवादियों को गिरफ्तार किया गया है, तबसे पूरे मुल्क में बम धमाके नहीं हुए हैं।

क्या यह सोचने का मसला बनता है या नहीं?

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