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साझी विरासत

साझी विरासत : पांच वर्षों का सफर

श्रुति चतुर्वेदी

दक्षिण एशिया में तनाव की प्रकृति लगभग समान है और शायद ही कोई तनाव होगा जो इस क्षेत्र में नहीं देखा हो। जातिगत तनाव, सांप्रदायिक तनाव, लिंगभेद से उभरने वाले तनाव, नस्ल व प्रजाति आधारित तनाव और सरमायादारों तथा शोषितों के बीच का तनाव। आप नाम लीजिए और वह हाज़िर है। हम हिंसक तनाव झेलते हैं, हम अहिंसक तनाव झेलते हैं, हम ऐसे तनाव भी अनुभव करते हैं जो कि काफ़ी मुखर हैं और ऐसे भी जो कि धीरे-धीरे हमारी मानसिकता में पनपते हैं जिसकी झलक हमें समाज के आचरण में देखने को मिलती है। भारत की भी स्थिति कोई भिन्न नहीं है जहां हम पिछले कई सालों से हिंसक तनावों से रू-ब-रू हुए हैं। सांप्रदायिक झड़पें आम बात हैं, और जातिगत तथा लिंगभेद आधारित दमन की भी वही स्थिति है। आज इन तनावों में हर तरफ़ भारी इज़ाफे के साथ-साथ इनका रूप भी काफी निर्मम हो चला है।

जनता हर तरफ से शारीरिक व मानसिक आतंक का सामना कर रही है, जिसके लिए राजकीय तथा गैर-राजकीय कारकों ने कोई कमी नहीं उठा रखी है। एक तरफ़ आम जनता ऊपर गिनाए गए तनावों की चक्की में पिसती है और दूसरी तरफ़ राज्य के पास भी ऐसा ही करने के अपने तरीके हैं, चाहे वो सलवा जुडूम हो, चाहे उत्तर-पूर्वी राज्यों व जम्मू-कश्मीर में सैन्य मौजूदगी, या फिर मुक्त व्यापार और मूलभूत वस्तुओं के लगातार बढ़ते मूल्य।

चलिये अब हम विभिन्न तरह के सामाजिक आतंक की ओर नज़र डालते हैं, जिसमें जातिवाद को ही लीजिए: दक्षिण भारत दशकों से जातिभेद के चंगुल में जकड़ा हुआ है। यहां न सिर्फ़ तथाकथित उच्च जाति व निम्न जाति के बीच में तनाव है बल्कि दलित समुदायों के मध्य भी काफ़ी तनाव हैं। ऐसे भी कुछ उपजाति समूह हैं जिन्हें वर्ण-व्यवस्था में सबसे निचले पायदान पर रखा गया है जहां वे अत्याधिक शोषण, अपमान व यातना का शिकार बनते हैं। जाति व्यवस्था के हाशिये पर ढकेले हुए लोगों कि स्थिति कितनी बदतर हैं उसका जायज़ा कार्यशाला में बांटे गए अनुभव से ही हो जाता है- दक्षिण भारत के किसी हिस्से में दलितों तथा विजातियों को कुत्ता नहीं पालने दिया जाता है कि कहीं उनका कुत्ता उच्च जाति वालों की कुतिया से संपर्क बनाकर उसे अपवित्र ना कर दे।

दूसरा अनुभव एक महिला का था जिसे एक दलित से विवाह करने के कारण उसे अपने उच्च जातीय परिवार से बेदख़ल कर दिया गया। इन उदाहरणों से यह साफ़ हो जाता है कि लोग अपने दैनिक जीवन में किस तरह के अपमान व यातनाएं झेलते हैं। लैंगिक भेदभाव, छुआछूत आदि तनाव भी इस क्षेत्र के लिए नये नहीं हैं और धीरे-धीरे दक्षिणी भारत में दक्षिणपंथी उभार ने यहां सांप्रदायिक तनावों को भी हवा दी है तो कुल मिलाकर यहां तनावों की सूरत कुछ ऐसी है लेकिन, यह तस्वीर का सिर्फ़ एक पहलू है।

पूरे दक्षिण एशियाई क्षेत्र में और खा़सकर भारत में विभिन्न प्रकार की सांस्कृतिक अभिव्यक्तियां तथा रिवाज़ मौजूद हैं जिनमें काफी समानताएं होने के बावज़ूद प्रत्येक की अलग पहचान है। यह सांस्कृतिक रूप, रिवाज़ व स्वरूप, धर्मनिरपेक्ष परंपराएं हमें वह ताक़त व मौके उपलब्ध कराते हैं जिनसे हम एक संवेदनशील इंसान के रूप में सहिष्णुता तथा सह-अस्तित्व को अपनाते हैं। विभिन्न संस्कृतियों तथा समुदायों के बीच समानतायें सामाजिक ताने-बाने को व्यवस्थित रखती हैं जिससे समाज में सांस लेने व जीवन-यापन करने की गुंजाइश बनी रहती है। हम अक़सर कहते हैं कि समाज में मिले-जुले प्रकार के लोग रहते हैं, ऐसे भी लोग हैं जो तनाव पैदा करते हैं और जनता में फूट डलवा कर फ़ायदा उठाते हैं, और ऐसे भी लोग हैं जो अमन व सह-अस्तित्व चाहते हैं। आज भी, अमन व इंसानियत चाहने वालों की संख्या ज़्यादा है अन्यथा कोई भी समाज उन ताक़तों के आगे नहीं टिक सकता जो तनाव, युद्ध व हिंसा फैलाते हैं। उदाहरणार्थ, दक्षिण भारत का इतिहास, भाषा, संस्कृति और जन-आंदोलन उन समृद्ध विरासतों की खान है जहां उत्पीड़ित वर्ग के हक में आवाज़ उठाई गयी। द्रविड़ संस्कृति की खासियत उसे दूसरी संस्कृतियों से अलग कर एक साझी विरासत भी बनकर उभरती है जहां तमिल भाषा की प्राचीनता उनके गर्व का कारण बनती है। अतः इसी तरह के धागों से साझी विरासतों का ताना-बाना बुना जाता है ताकि जनता आपस में स्वस्थ संबंध बना कर ऐसे समाज का निर्माण करें जो अमन व साझेदारी पर खड़ा हो। 

एक सशक्त आंदोलन अमन और धर्मनिरपेक्षता के लिए :
अनुभव बतलाते हैं कि हिंसक तनावों में हमारी पहली प्रतिक्रिया होती है बातचीत द्वारा मध्यस्थता करना, जिसके लिए काफ़ी उत्साह व संजीदगी से कई मंच उभर कर आते हैं। फिर जैसे-जैसे तनाव थमता है और स्थिति सामान्य होती है हमारी शांति की कोशिशें और मंच भी थम जाते हैं। शांति और धर्मनिरपेक्षता के आंदोलनों की मौजूदगी के बावज़ूद तनाव व अमन के विभिन्न आयामों पर काम करने वाले एक सशक्त व सुसंगत आंदोलन की ज़रूरत है। हम उस समय हस्तक्षेप करने की कोशिश करते हैं जब लोग कोई भी बात सुनने और समझने से इंकार कर देते हैं और कभी-कभी शांति स्थापित करने की बजाय हम तनाव को और भी उग्र बना देते हैं। ज़रूरत यह है कि तथाकथित शांति के माहौल के दौरान ही हम अमन के मुद्दों पर अपना ध्यान केन्द्रित करें। कभी-कभी हम अहिंसक तनाव की स्थिति को कमतर आंकते हैं और जब तक खून-ख़राबा तथा आगजनी ना देखें हम समझते हैं कि स्थिति सामान्य है लेकिन, इस ‘शान्तिकाल’ के दौरान नफ़रत की आग लगातार सुलगती रहती है जहां अपने और गैर की भावना लगातार फलती रहती है जिसका फायदा तनाव फैलाने वाली शक्तियां उठाती हैं। दरअसल हमें इसी तथाकथित शांतिकाल के दौरान अपनी शांति मुहिम को और तेज़ करना चाहिए।

साझी विरासत व हमारे अनुभव :
बांग्लादेश, भारत, नेपाल, पाकिस्तान, श्रीलंका में काफ़ी समानताएं हैं। यहां के समाज सदियों से सिर्फ़ अपने शोषण, दुःख व नैतिक अधिकारों से वंचना में ही नहीं जुड़े हैं बल्कि यह दुश्वारियां हमें एक-दूसरे से जोड़ती भी हैं। साथ ही, हमारे पास ऐसी कई सांस्कृतिक व ऐतिहासिक विरासतें हैं जहां हम एक-दूसरे के संघर्षों व खुशियों का त्यौहार मनाते हैं। उदाहरण के लिए पूरा दक्षिण एशिया नववर्ष एक साथ मनाता है जो कि कृषि चक्र से जुड़ा वैशाख नाम का त्यौहार है। यह उपमहाद्वीप अपनी स्वाधीनता के संघर्ष में एक साथ लड़ा था। दुर्गा पूजा भारत और बांग्लादेश मे एक साथ मनाया जाता है। सिनेमा एक और माध्यम है जिसके द्वारा हम एक-दूसरे से जुड़ते हैं (ऐसे ही हमारे पास लोक-कला और लोक-परंपरा का भरपूर खज़ाना है) बंगाल व बांग्लादेश का बाउल व नज़रूल गीती, पंजाब के बाबा फरीद, अजमेर के संत मोइनुद्दीन चिश्ती, दक्षिण भारत के महान संत व कवि थीलूवलूर, त्यागराज आदि कुछ ऐसे नाम हैं जो हमारे समाज की जीवंत मिसाल रहे हैं। वसंत का त्यौहार जो कि पूरे दक्षिण एशिया में मनाया जाता है वह निज़ामुद्दीन औलिया के शिष्य अमीर ख़ुसरो ने प्रचलित किया था। कहते हैं, अपने भाई की मौत के बाद हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया शोकाकुल हो गये जिससे उनके शिष्य अमीर खुसरो काफी चिन्तित हो गये। इसी दौरान एक दिन अमीर खुसरो ने देखा कि कुछ लोग पीले कपड़े पहन कर गीत गा रहे हैं। पूछने पर उन्हें पता चला कि वे बसंत दिवस मना कर ग्रीष्म ऋतु का स्वागत कर रहे हैं। खुसरो को यह बात बहुत जंची और वे भी पीले कपड़े पहनकर औलिया साहब के सामने पहुंच गये। खुसरो को पीले कपड़ों में देखकर औलिया के चेहरे पर हंसी की लकीर उभरी और तभी से खुसरो इस दिन सभी समुदायों के लोगों को साथ लेकर इस त्यौहार को मनाने लगे। यह अमीर खुसरो ही थे जिन्होनें सितार, तबला तथा कव्वाली ईज़ाद की जिनका असर समुदाय, जाति, धर्म की सीमाओं को लांघ कर जाता है। इसी तरह कबीर, गुरु नानक और अन्य कई नाम हैं जो साझी विरासत के प्रतीक स्तंभ हैं। यहां यह कहना ज़रूरी होगा कि सारी साझी विरासतें समाज में सकारात्मक भूमिका नहीं निभाती हैं। अनुभव बतलाते हैं कि नकारात्मक तरह की भी साझी विरासतें होती हैं। वर्ण व्यवस्था के आधार पर समाज के एक हिस्से को दूसरा हिस्सा अपवित्र समझता है और यह मूल्य सदियों से पीढ़ी दर पीढ़ी दृढ़ होते हुए पूरे दक्षिण एशिया में किसी ना किसी रूप में मौज़ूद हैं। इसी तरह, पितृसत्ता का साया भी इस क्षेत्र पर छाया रहता है। इन मूल्यों को हम नकारात्मक साझी विरासत कह सकते हैं। लेकिन एक बात पर ध्यान देना ज़रूरी है शोषण और उत्पीड़न का लम्बा इतिहास होते हुए भी हमारे पास सह-अस्तित्व व सहिष्णुता की भी सदियों पुरानी परंपराएं हैं जो कि हमारी साझी विरासत का इतिहास हैं।

हमारे अनुभव :
पिछले चार सालों में हमारी कार्यशालाओं में कई समुदायों व अलग-अलग सामाजिक परिस्थितियों से लोग आते हैं जहां से हम अपने अनुभव ग्रहण करते हैं। कार्यशाला में प्रतिभागी दूसरे देशों व धर्मों पर पूर्वधारणा बनाए हुए होते हैं जो कि उनके परिवेश द्वारा निर्धारित होती है। कार्यशाला में चर्चा के दौरान व उनके व्यवहार से हमें उनकी आशंकाएं, विचार और धारणाएं जानने का मौका मिलता है। ज्यों-ज्यों आपसी समझ की प्रक्रिया आगे बढ़ती है प्रतिभागी इस हक़ीकत को भी समझने लगते हैं कि हम किस तरह एक मानवीय संस्कृति व जीवन शैली से आपस में जुड़े हैं। फिर यह विचार उनके व्यवहार में भी झलकने लगता है जो उन्हें दूसरी संस्कृति व पृष्ठभूमि से आए अन्य प्रतिभागियों से जुड़ने के लिए उकसाता है। यह बात आगे कुछ उदाहरणों द्वारा स्पष्ट हो जाएगी।

बांग्लादेश :
इस संदर्भ में ढाका, बांग्लादेश में हुई दक्षिण एशियाई स्तर की कार्यशालाओं के अनुभव काफ़ी लाभकारी रहे। दोनों ही कार्यशालाओं में भारत, पाक़िस्तान और बांग्लादेश से आये प्रतिभागी एक-दूसरे के प्रति आशंकाओं से घिरे थे। ऐसी ही एक घटना है कि बांग्लादेश के साथी जब बालीबॉल खेल रहे थे तो पाकिस्तान के सहभागियों को काफ़ी धक्का लगा। जब उन्होनें भी साथ खेलने की पेशकश की जिसको बांग्लादेशी साथियों ने यह कहकर ठुकरा दिया कि वे पाकिस्तानियों के साथ नहीं खेलते हैं। इससे पता चलता है कि लोगों के अन्दर कितनी नफ़रत भरी होती है। परन्तु कार्यशाला के संपन्न होने तक बांग्लादेश की जहांआरा परवीन ने पाकिस्तानी साथियों से काफ़ी घनिष्ठता बढ़ा ली। बाद में उन्हांेने जहांआरा का साक्षात्कार लिया जो कि हमारे दक्षिया एशिया साझी विरासत पत्रिका में भी छपा। इसी तरह साझी विरासत पर कार्यशाला के दूसरे चक्र में यह साफ़ दिख रहा था कि बांग्लादेशी साथी भारत को साम्राज्यवादी देश के रूप में ले रहे थे और 1971 के युद्ध के फलस्वरूप पाकिस्तान के प्रति भी उनकी तल्खियां साफ़ की थी। खुद भारत और पाकिस्तान  के सहभागियों के बीच जम्मू-कश्मीर और आतंकवाद पर कोई समान राय नहीं क़ायम कर पाए। लेकिन कार्यशाला के तीसरे दिन अनोखी बात हुई, पाकिस्तान से आये जावेद नाम के साथी ने लोककलाओं के विविध रूपों पर प्रस्तुति के दौरान मंच पर अपनी टीम के साथियों को बुलाकर बांग्लादेश के साथियों व वहां की जनता से अपनी सरकार द्वारा की गयी गल्तियों के लिए एक स्वर में माफ़ी मांगी और बांग्लादेशी सहभागियों को दोस्ती का न्यौता दिया। फिर पाकिस्तान से आए बशारत ने एक सूफी गीत प्रस्तुत किया जिसे दोनों ही देश के साथियों ने मिलकर गाया। कहना न होगा कि इस भावुक दृश्य के बाद कार्यशाला का रूप और निखर आया।

दक्षिण भारत :
दक्षिण भारत में हमारी पहली कार्यशाला में कॉर्नर स्टोन नामक संगठन के साथ चलाए गये सहभागी कार्यक्रम के दौरान हमारा उनके कार्यकर्ताओं के साथ विचारों का काफी आदान-प्रदान हुआ कि किस तरह साझी विरासतें अमन और मैत्री के महत्वपूर्ण औज़ार हैं। फलस्वरूप, कार्यशाला के सहभागी एक-दूसरे व आई.एस.डी. की टीम से मिलने के लिए मार्च में मदुरई में होने वाले ‘दलित कलईवेड़ा’ नामक दलित मेले में पुनः इकट्ठा हुए।

मणिपुर :
मणिपुर में कार्यशाला के दौरान एक और अनुभव प्राप्त हुआ- साझी विरासत के विभिन्न रूपों पर प्रस्तुतिकरण के दौरान एक समूह ने कांग्ला के किले को पहले तो अपनी विरासत में गिना परन्तु समूह चर्चा में कूकी व नागा साथियों ने कहा कि वे कांग्ला के क़िले को अपनी साझी विरासत नहीं मानते क्योंकि उसे मैतैयी राजा ने बनवाया था। जब यह कहा गया कि लालकिला भी मुग़ल शासक ने बनवाया था परन्तु हम उसे अपनी साझी विरासत का हिस्सा मानते हैं। काफ़ी लम्बी चर्चा के बाद कूकी और नागा साथी माने कि यदि वे खुद को कूकी या नागा की बजाय मणिपुरी समझें तो कांग्ला दुर्ग उनकी साझी विरासत होगी। यह द्योतक थी इस बात की कि वे स्वयं को मणिपुरी मानते हुए इस से जुड़ी साझी विरासत को भी अपना रहे थे।

झारखंड :
झारखंड में तनाव की स्थिति काफ़ी जटिल तथा बहुआयामी है। आदिवासी-गैरआदिवासी, अलग-अलग धर्म का पालन करने वाले, जो आदिवासी से ईसाई हो गये हैं या जो हिन्दू से इस्लाम अपना चुके हैं और फिर इन विविधताओं से पनपने वाले तनाव। हमारी कार्यशाला में इस पृष्ठभूमि से आये सहभागियों के बीच तनाव साफ़ नज़र आ रहा था। दो दिनों तक स्थिति काफ़ी मुश्किल भरी रही जहां सहभागी एक-दूसरे से सहयोग करना तो दूर बल्कि दूसरे समुदाय या धर्म के साथी पर कटाक्ष कर रहे थे। दूसरे दिन कार्य समाप्ति के बाद भोजनोपरान्त जब सब रंगारंग कार्यक्रम के लिए एकत्र हुए तो उन्होंने देखा कि पहले से ही सरना समुदाय के तमाम वाद्ययंत्रों की व्यवस्था की जा चुकी है। पहले तो सभी सहभागी इस प्रक्रिया में आनाकानी कर रहे थे परन्तु ज्यों ही उस इलाके का पहला लोकगीत प्रस्तुत किया गया एक-एक कर तमाम साथी शामिल होने लगे। कुछ ही समय में वहां पूरे सांस्कृतिक मेले का समां बंध गया जो कि रात दो बजे तक चला। कार्यक्रम सिर्फ़ यह देखकर बंद किया गया कि अगले दिन सहभागियों को सत्र में भी बैठना था। अगले दिन सत्र में जब यह बात उठी कि सहभागी बताएं कि कौन सी तस्वीर ज़्यादा सच्ची है पिछले दो दिन कार्यशाला में जो चल रहा था वह या फिर जो सब लोगों ने पिछली रात अनुभव किया। फिर काफ़ी गहन चर्चा के बाद यह उभर कर आया कि समाज में नफ़रत की जड़ें काफी गहरी होने के बावज़ूद हमारे पास ऐसी बहुमूल्य धरोहरें हैं जो कि हमें एक-दूसरे के करीब लाती हैं।
ऊपर दर्शाये गए अनुभवों के अलावा भी कई शैक्षिक स्तर की कार्यशालाओं में प्रतिभागियों के मुंह से सुनने को मिला कि वे खुद भी काफ़ी हद तक इसी रास्ते पर कार्य करते हैं क्योंकि समाज में तनाव कम करने का यह कारगर उपाय है। इसीलिए, हमारे नेटवर्क के साथी संगठन भी साझी विरासत पर और कार्यशालाओं की मांग कर रहे हैं। हमारा भी अब तक का अनुभव यह बतलाता है कि समाज में व्याप्त खाइयों को पाटने के लिए साझी विरासत एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती है।

नकारात्मक साझी विरासतें :
हमारे अनुभव यह भी बतलाते हैं कि साझी विरासत के कुछ रूप खुद तनाव का मुद्दा बन सकते हैं। समाज को धर्म, जाति, समुदाय, लिंग, क्षेत्र, भाषा व दूसरे नामों से तोड़ने वाली ताक़तें हमारी सकारात्मक व स्वस्थ परंपराओं को इस कदर तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करती हैं कि जनता यह विश्वास करने लगे कि इन्हीं विरासतों की वजह से समाज में संघर्ष व्याप्त है। मिसाल के लिए, मोहर्रम पर्व के दौरान ताज़िए को अक़सर ऐसा रंग दिया जाता है जिससे कि तनाव उपजे। ऐसी स्थितियाँ उन कार्यकर्ताओं के सामने विकट समस्या पैदा करती हैं जो साझी विरासतों को अपने काम का आधार बनाए हुए हैं।

साझी विरासतों की सीमाएं :
दुर्भाग्यवश साझी विरासतों की सीमाएं भी हैं। भूमण्डलीकरण के फलस्वरूप हमारी जीवन शैली में भारी बदलाव आया है जिससे हमारी साझी विरासतों को भी भारी ख़तरा है। कई स्वस्थ परंपराएं व कलाएं धीरे-धीरे मर रही हैं और कई तो पूर्णतः ख़त्म हो चुकी हैं। सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों के कई मंच अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। नौटंकी, जागर, कठपुतली, पाण्डवानी आदि कुछ मिसालें हैं जो इस तथाकथित विकास की मार झेल रही हैं। आज साप्ताहिक हाट-बाज़ार, मेले, त्यौहार सब मुक्त व्यापार की चपेट में आ चुके हैं। लोगों के लिए नाटक देखने जाने की बजाय घर पर टी.वी. देखना ज़्यादा आरामदेह है और उधर कलाकार भूखों मरते हैं। हस्तशिल्प, हथकरघा आदि का भी यही हाल है और हम लगातार ऐसे तंत्र खोते चले जा रहे हैं जो समाज के विभिन्न हिस्सों को बांधने का काम करते हैं।

इसके अलावा कुछ कलाओं के रूप उच्च वर्ग तक ही सिमट कर रह गये हैं जहां जनता से उनका कोई संबंध ही नहीं रह गया है। हमारे समाज में लालन-पालन उच्चवर्गीय कलाओं से प्रभावित रहता है और हम भी उसे अपनी साझी विरासत समझने लगे हैं। यदि हम ज़मीनी स्तर पर देखें तो उनका कोई नामलेवा नहीं हैं क्योंकि वे शास्त्रीय रूपों में बंधी हैं। किसी बात को नकार देना आसान है परन्तु यह भी देखने की ज़रूरत है कि क्यों कुछ कलाएं जनता से दूर होते हुए कुछ ही तबकों तक सीमित रह गयी और वहां भी क्या वे आपसी तंत्र को प्रगाढ़ करती हैं? और हमारे अनुभव कहते हैं कि हालांकि सभी शास्त्रीय कलाएं यह प्रश्न झेलती हैं तथापि वे आपसी जुड़ाव का कार्य करती हैं।

आप सोचेंगे कि अब जीवन्त साझी विरासतें कहां हैं जो लोगों को जोड़ती हों, तो जवाब में कहना पड़ेगा कि तमाम मुश्किलों व बाधाओं के बावज़ूद हमारी संस्कृति के कई तत्व हमें इस तनावपूर्ण माहौल में भी आपस में जोड़ने का काम करते हैं। लोक-कलाएं, कथाएं, हस्तकारी, लोक-संगीत, पर्व-त्यौहार, मेले और भी ना जाने क्या-क्या इस सूची में शामिल हो सकता है। हालांकि वे अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही हैं परन्तु वे विलुप्त नहीं हुई हैं और हर काल व समाज में उभर कर आती रहेंगी क्योंकि कड़वाहटों व टकराहटों से गुज़रते दक्षिण एशिया के ज़ख्मों पर मरहम रखने के लिए इससे कारगर कोई उपाय नहीं है।

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