Readings - Hindi

साझी विरासत

उर्दू भाषा और साहित्य

फ़िराक़ गोरखपुरी

मुसलमानों को हिन्दुस्तान में आकर बसे हुए कई शताब्दियां बीत चुकी थीं। भारत की भिन्न-भिन्न भाषाएं बन चुकी थीं। उनमें अभी गद्य तो नहीं, लेकिन कविता की ध्वनि गूंजने लगी थी और सभी भाषाओं में हिंदुओं के साथ-साथ उनकी ध्वनि में अपनी ध्वनि मिलाकर वे कविता कर रहे थे। ख़ुसरो, कबीर साहब, मलिक मोहम्मद जायसी, रसखान, आलम और इन्हीं के सदृश कई सौ दूसरे मुसलमान पुरुष और स्त्री हिंदी कविता को मालामाल कर रहे थे। साथ ही कई मुसलमान और कुछ हिन्दू फ़ारसी में भी काव्य रचना कर रहे थे। इसके अतिरिक्त फ़ारसी में बहुत रचा हुआ और परिष्कृत गद्य भी लिखा जा रहा था।

दकन में मुसलमान उत्तरी भारत से जा बसे और कुछ शताब्दियों के बाद ही दकन की बोलियां बोलने लगे। लेकिन आज से लगभग पांच सौ वर्ष पूर्व उत्तरी भारत की जो बोली थी, उसे भी वे अपने साथ दकन लेते गये थे। अभी इस भाषा में उत्तरी भारत में साहित्य का सर्जन नहीं हुआ था, लेकिन दकन में उत्तरी भारत की भाषा में कई सौ वर्ष पूर्व कविता होने लगी थी और कुछ गद्य की पुस्तकें भी लिखी गयीं। इस कविता और इस गद्य में पहले-पहल आज की उर्दू कविता की झांकी मिलती है। इस हिंदीनुमा दकनी भाषा में पहले-पहल अरबी-फ़ारसी के शब्द हिंदी शब्दों के साथ नगीने की तरह जड़े हुए देख पड़ते हैं। फ़ारसी काव्य के जितने प्रकार और जितने छंद हैं, उन्हें भी दकनी हिंदी में काम में लाया गया।
अट्ठारहवीं शताब्दी की दो-तीन दहाइयां बीत चुकी थीं। मुग़ल राज्य अभी जीवित था, उसे 1897 तक जीवित रहना था, लेकिन वह अन्दर से जर्जर हो चुका था। दकन प्रांत के सूबेदार आसिफ़जाह ने अपने को स्वतंत्र कर लिया था। ऐसा ही अवध के नवाब ने भी किया था। यही हाल बंगाल का भी था। कई और नवाबों ने भी अपने को स्वतंत्र या अर्ध-स्वतंत्र घोषित कर रखा था। जाटों और सिखों की शक्ति दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही थी। मराठों ने भी बड़े-बड़े प्रान्तों पर अपना आधिपत्य स्थापित कर रखा था। ईस्ट इंडिया कंपनी के अंग्रेज़ व्यापारियों का प्रभाव प्रतिदिन बढ़ता जा रहा था। उसी समय अहमदशाह अब्दाली और नादिरशाह ने हिन्दुस्तान पर आक्रमण कर दिया और जी भर कर उसे लूटा और अपमानित किया। इसी डांवाडोल युग में जब हिंदुस्तान में अराजकता फैल रही थी, दिल्ली में उर्दू कविता की पहली बोलियां सुनाई पड़ीं और इसी युग में उर्दू के दो महाकवि ‘मीर’ और ‘सौदा’ ने ऐसी काव्य रचना की जिसे रहती दुनियां तक हम भूल नहीं सकते।

दिल्ली में ऊंचे घराने के मुसलमानों की एक सभ्यता बन चुकी थी। इस सभ्यता के कई केन्द्र भारत के कई नगरों में बन चुके थे और बनते जा रहे थे। ऐसे हर केन्द्र में एक पाठशाला रही होगी, जहां अरबी और फ़ारसी की शिक्षा दी जाती होगी और उर्दू शायरी से सम्बन्धित वार्तालाप होते होंगे। हैदराबाद दकन, मुर्शिदाबाद, पटना, लखनऊ, मुरादाबाद, फर्रुख़ाबाद, काकोरी, मानिकपुर ऐसे सैकड़ों क़सबों में ज्ञान और साहित्य की साधना होती रही होगी और कविता की तूती बोलती रही होगी।

भारत में रहने वाले मुसलमानों के जीवन के कतिपय तथ्यों को अवश्य जान लेना चाहिए। एक तो इनमें नागरिकता की स्पष्ट झलक मिलती है और ऊंचे और सभ्य घराने के लोग गांव की बोली नहीं वरन् इनके बच्चे-बच्चियां, स्त्री-पुरुष, रिश्तेदार और इनसे मिलने-जुलने वाले लोग तथा नौकर तक खड़ी बोली बोलते रहे होंगे। दूसरा सत्य इनके जीवन का यह होगा कि इन घरानों की स्त्रियां अनपढ़ और अशिक्षित नहीं रही होंगी। इन्हें अरबी में क़ुरआन पढ़ना और इसे उर्दू में समझना था। दिल्ली और कई बड़े-बड़े शहरों में भटियार-ख़ाने स्थापित हो चुके थे। भटियारों की ज़बान कैंची की तरह चलती थी। प्रतिदिन के व्यवहार में प्रयुक्त होने वाले मुहावरों और टकसाली भाषा की वर्षा हो रही थी। मगर भटियारख़ानों और कारवां सरायों में तो लोग केवल यात्रा-काल में ही आते-जाते होंगे। दिल्ली और कई शहरों में नानबाइयों की इतनी दुकानें खुल चुकी होंगी कि बहुत से घरों में खाना पकाने की आवश्यकता ही नहीं रही होंगी। घर की स्त्रिायाँ और लड़कियां सीने-पिरोने, कढ़ाई के कामों और बेल-बूटाकारी के कामों में अपना समय लगा रही होगी। ऐसे घरों के पुरुष और लड़के अपना अधिकांश समय घर की स्त्रियों के साथ उठने-बैठने, बातचीत करने, भोजन और ब्यालू करने में व्यतीत करते होंगे। टकसाली उर्दू में बातें होती होगी। कोई बात कहने में जहां भूल-चूक हुई, औरतें तुरंत टोक देती होंगी। उर्दू भाषा दिन प्रतिदिन सांचे में ढलती जा रही थी। जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर सैकड़ों तरह के खोन्चे वाले बैठते थे और सब अपनी-अपनी बात दिल्ली की उस टकसाली बोली में कहते थे जो चार-पांच सौ बरस पहले बन चुकी थी और बनती जा रही थी और जिसके सांचे ‘मीर’ और ‘सौदा’ के युग तक अस्सी-नब्बे प्रतिशत की सीमा तक तैयार हो चुके थे। यह बोली सांचे ढालती जा रही थी और सांचों में ढलती जा रही थी।

इस बोली की हैसियत जब एक कच्चे माल की थी तब यह बोली जाटों की बोली थी। कड़ी, खुरदरी, बेलचक, अनगढ़ और कर्णकटु। इस बोली में न तो ब्रजभाषा का माधुर्य था और न अवधी की कोमलता। इसमें अच्छे गीत तक न थे। उर्दू से पहले जो काव्य रचना खड़ी बोली में की गयी थी, वह कुछ उन साधुओं और सन्तों की देन थी जो निर्गुण सम्प्रदाय के थे, जो राम और रहीम की एकता बताते थे। खड़ी बोली की इस कविता में एक्का-दुक्का अरबी-फ़ारसी शब्द भी आ गये थे। लेकिन सांसारिक जीवन के काव्य का प्रणयन इसमें बहुत अल्प हुआ था। प्रेम और सौंदर्य की कथाएं उर्दू से पूर्व खड़ी बोली में मिलना कठिन है। हां, नीति और धर्म सम्बन्धी काव्य-रचना अवश्य मिल सकती है। उर्दू के रूप में जब यह कविता आगे बढ़ी तो इसमें सभ्यता और संस्कृति अपने पूर्ण शृंगार के साथ परिलक्षित हुई। आये दिन की बातें, कोमल-कांत भावनाएं, दर्शन और नीति, जीवन और सृष्टि पर दूर तक पहुंचने वाले अनुभव और विचार, वर्णन के सैकड़ों रूप और शैलियां इस भाषा में आविर्भूत हो गयीं।

यहां एक प्रश्न उठता है। वह यह कि जब उर्दू कविता से सैकड़ों वर्ष पूर्व की हिंदी कविता और भारतवर्ष की दूसरी भाषाओं की कविता में अरबी, फ़ारसी शब्द या तो नहीं थे या न होने के बराबर थे तो फिर उर्दू कविता में अरबी-फ़ारसी की विदेशी शब्दावली का इतना प्रयोग क्यों हुआ? इन विदेशी शब्दों की आवश्यकता ही क्या थी? यह सच है कि उर्दू को छोड़कर भारत की अन्य भाषाओं की कविता में विदेशी शब्द नहीं होते या न होने के बराबर हैं। लेकिन दक्षिणी भारत की भाषाओं को छोड़कर उत्तरी भारत की भाषाओं में कई हज़ार अरबी और फ़ारसी के शब्द मिलते हैं। उर्दू कविता का पंचानबे प्रतिशत भाग ऐसा है कि जिसमें वे ही अरबी और फ़ारसी के शब्द आते हैं जिन्हें अशिक्षित मुसलमान भी बोलते और समझते हैं। फिर ये शब्द विदेशी कहां रहे? पहले बताया जा चुका है कि हज़ारों अरबी और फ़ारसी शब्द मुसलमानों के आने के पश्चात ही हमारी बोली में घुल-मिल गये थे और सैकड़ों वर्ष तक उर्दू कविता के आविर्भाव से पूर्व करोड़ों आदमी इस घुली-मिली भाषा को बोलते रहे हैं। उर्दू कविता ने लगभग साठ-सत्तर हज़ार शुद्ध हिंदी शब्दों में तीन हज़ार के लगभग अरबी-फ़ारसी शब्द जोड़ दिये हैं, जिन्हें पढ़कर सीखना पड़ता है। ऐसे शब्दों की पूर्ण संख्या तो नहीं किंतु एक बड़ी संख्या नीचे दी जाती है जिन्हें अनपढ़ बोलते हैं।

आदमी, मर्द, औरत, बच्चा, ज़मीन, काश्तकार, हवा, आसमान, गरम, सर्द, हालत, हाल, ख़राब, नेकी, बदी, दुश्मनी, दोस्ती, शर्म, दौलत, माल, मकान, दुकान, दरवाज़ा, सहन, बरामदा, ज़िन्दगी, मौत, तूफ़ान, सवाल, जवाब, बहस, तरफ़, तरफ़दारी, तरह, हैरान, बेहोश, होशियार, चालाक, सुस्त, तेज़, सवार, राह, शेर, मुहल्ला, क़िस्सा, ग़ुस्सा, ग़म, दर्द, ख़ुशी, आराम, किताब, हिसाब, ख़बरदार, बीमार, दवा, शीशा, आईना, प्याला, गुलाब, बाग़, बहार, मुरव्वत, मुहब्बत, सूरत, आबरू, हिन्दी, हिन्दू, हिन्दुस्तान, सादा, दिल, दिमाग़, चेहरा, ख़ून, रग, शरारत, सलाम, रईस, रिआया, मालग़ुज़ारी, शोर, ग़ुल, जमा, बाक़ी, ख़ैरियत, ख़बर, तकलीफ़, तक़ाजा, फ़ायदा, फ़क़ीर, फ़ौरन, बहाना, जादू, कबूतर, कमर, गरदन, आवाज़, ज़बान, ख़र्च, मैदान, वकील, पेशकार, अमीन, क़ानूनगो, तहसीलदार, बसूल, खि़दमत, ग़ुलाम, आज़ाद, रंगीन, नमक, मंज़्ाूर, नज़र, लगाम, चिराग़, तकिया, परदा, जगह, नज़दीक, दूर, क़रीब, ख़तरा, बयान, गुमान, दीवानख़ाना, मसनद, ज़ाहिर, कुश्ती, रोज़, ज़ोर, ताक़त, ख़ास, तूती, रौशनी, तरद्दुद, गिरानी, बुख़ार, हैज़ा, त़ाऊन, बदहज़्मी, हलवा, हलवाई, कागज़, लिफ़ाफ़ा, मोटर, नहर, शिकायत, ज़हर, वज़्न, आस्तीन, मालिक, जायदाद, महल, मुश्किल, मेहरबानी, ज़रा, कम, ज़ियादह, ताक़, हुक्म, अमल, फ़ुरसत, हिम्मत, बेहूदा, मंज़िल, इख़्तियार, ज़ुल्म, ज़िक्र, फ़िक्र, फ़साद, रज़ाई, रूमाल, बख़िया, रफू, जहाज़, निशाना, तीर, कमान, सन्दूक़, बेवक़ईफ़, ख़ाली, ख़ारिज, क़ै, क़िस्म, पसन्द, क़र्ज़, क़ौल, फ़रार, फ़ौज, मुल्क, बादशाह, शहज़ादा, शादी, रोब, ख़ुलासा, दग़ाबाज़, हरामज़ादा, नमकहलाल, फ़लाँ, वापसी, रुख़सती, तबादला, किनारा, बन्दगी, बरफ़ी, तमाशा, ख़़्याल, याद, बारीक, शुरू, ख़त्म, अख़ीर, ख़ज़ाना, मेवा, शराब, अंगूर, बादाम, शगून, इन्कार, राज़ी, मेहतर, दरज़ी, चीज़, तश्तरी, बर्क़, वादा, नक़द, मोहलत, पान, ज़र्दा, सफ़र, लाश, कफ़न, दफ़न, मेहराब, बदतमीज़, सुखऱ्, मज़ा, हजामत, ख़ाक, बिस्तर, कुर्सी, दाग़, दाखि़ल, सितार, तबला, जुलूस, जलसा, ज़माना, गिरफ़्तारी, इन्तेज़ार, मुख़्तार, लेकिन, क़िस्मत, मतलब, अगर, दुनिया, ग़ैर, दीवार, परवरिश, क़ाफ़िला, जारी, बुज़ुर्ग, तमाम, कुछ, मेहमान, मस्जिद, शौक़, बरकत, ग़रज़, बेकार, बला, आह, हाय, वाह, जहाँ, बेजा, हज़ार, तकरार, ग़ज़ब, कीना, सीना, वाक़िफ़, हस्ती, बुलबुल, हैसियत, शाम, सुबह, इक़बाल, इम्तहान, चमन, चाक़ई, उस्तरा, इलाज़, ख़ुद, असर, दौलत, इन्सान, क़दम, जर्राह, ख़ातिर, क़सूर, ख़फ़ा, माफ़ी, जान, शिकार, कमन्द, जुर्म, खि़लाफ़, रहम, रस्म, क़ायदा, मज़दूर, बदन, नर्म, शौहर, बरात, बदहवास, नामुमकिन, देर, बरफ़, सरहद, नज़ला, पेशी, नुमाइश, हवाला, दरजा, साहब, ग़लत, सही, तबीयत, शायद, हमेशा, बराबर, ग़नीमत, शैतान, ताल्लुक, दफ़्तर, अफ़सर, सिलसिला, बाज़ार, मसाला, परवाह, जहन्नम, रुत्बा, ख़ौफ़, शानदार, साल, फ़र्क, लुत्फ़, सितारा, परी, देव, मौसम, दरया, वारदात, आराज़ी, क़दर, चैन, कमाल, क़ुरबानी, पंजाब, इन्साफ़, जोश, बग़ल, बे, दावत, आराज़ी, मर्ज़, मरीज़, बिस्तर, आबपाशी, आबकारी, सरकारी, हुज़ूर, उज़्रदारी, बन्दोबस्त, यार, रुक़्क़ा, पर्चा, पुरज़ा, दारोग़ा, सन्दरी, बन्द, अख़बार, सिवा, बेशी, फौजदारी, दीवानी, लिहाज, ज़बरदस्ती, किराया, क़द्दू, मुरब्बा, अचार, ख़रबूज़ा, तरबूज़ा, सब्ज़ी, दाना, पेशवा, कारिन्दा, पैसा, पेंच, बाज़ी, प्यादा, वज़ीर, पोलाव, प्याज़, सुराही, क़यामत, दीवाल, नोक, तारीख़, ताश, तालाब, जाहिल, लायक, निहायत, क़ाबिल, परहेज़, बनफ़्शा, बेअदबी, तजुरबा, तै, गुज़र-बसर, माहवारी, मुर्दा, शरबत, राय, मज़बूत, कमज़ोर, कार्रवाई, खाना, परवाना, हाता, सुराग़, तन्ख़्वाह, तरक़्क़ी, जुरमाना, अशरफ़ी, कैफ़ियत, फरेब, मल्लाह, नक़्ल, बुरादा, मुलाक़ात, असली, नक़ली, बुरी, रेहन, शमा, शमादान, तसला, सुरमा, रस्म व रिवाज, रफ़ा-दफ़ा, रिआयत, रसीद, जं़जीर, सिफ़ारिश, ज़नाना, सायत, गज़, ख़ेमा, शामियाना, सायबान, सिपाही, सुपुर्द, शुतुरमुर्ग़, शाल, दुशाला, क़तार, सजदा, बग़ावत, ग़द्दार, तूफ़ान, क़ीमा, रान, तैनात, मुसाफ़िर, करामात, मात, फ़ज़ीहत, कसर, कसरत, कश्मीर, क़ुलक़ुल, जोश, कूच, दामन, तौशक, सलाह, अन्दर, जिगर, दम, नाराज़, देहात, माजून, हलाल, हलालख़ोर, दवात, जिन, मालूम, मरदुमशुमारी, ज़ारबन्द, तंग, दिक़, गोश्त, लानत, मलामत, पैबंद, अमल, दस्तावेज़, मखमल, क़ालीन, फ़र्श, नाश्ता, रेशम, मुलायम, काफ़ी, ताकीद, रंज, क़िला, अफ़सोस, साज़, मज़ाक़, मुंशी, नीलाम, मुक़ाबला, मवक्किल, नीयत, अनार, इफ़रात, आतशबाज़ी, अमरूद, इन्क़लाब, इन्तेज़ाम, बारूद, खि़लाफ़, ग़िलाफ़, बाक़ी, बक़ाया, इजलास, नवइयत, मुआइना, आबला, एहतियात, इजाज़त, दाखि़ल, ख़ारिज, जानवर, हैवान, जानदार, तोप, बन्दूक़, जालसाज़ी, अन्दाज़, रोज़गार, अलावा, जारी, मुजरिम, मुलज़िम, मालिश, मजाल, नदारद, ऐब, ख़ोंचा, ज़ुकाम, चासनी, बालाई, आमदनी, दस्तकारी, मीनाकारी, ख़ैरात, अजाबख़ाना, चरख़ा, जल्द, चौगान, मशहूर, ख़रगोश, तातील, वारिस, रियासत, हुक़्क़ा, फ़रशी, जू, कबाब, शोरबा, तराज़ू, हर्ज, अस्तर, इत्र, शकर, आबादी, मुहक्मा, मुहताज, पौदा, निहाल, अरमान, मुराद, डफ़, अंजीर, हम्माम, पहलवान, क़लाबाज़ी, पोशाक, गोशवारा, क़त्ल, क़ाबिल, जहन्नम, तबाही, शफ़्तालू, शलजम, बेहतर, तौबा, नमाज़, ख़ैर, ख़ैरियत, दास्तान, अफ़साना, चोबदार, ख़िदमत, खि़दमतगार, बुनियाद, आशिक़, माशूक़, महबूब, कमीना, ख़ौफ़, अदा, नाज़, पैमाना, वास्ता, सतर, निग़ाह, निगहबान, मामूली, एहसान, शुक्रिया, शामिल, जाहिल, सनद, साबित, सबूत, वजह, सबब, सुरख़ाब, खेज़ाब, अन्देशा, इनाम, ईमान, दीवान, फ़रियाद, पाबंद, पलंगपोश, मंसूबा।

विस्तार के भय से हम यही आठ-नौ सौ शब्दों की गणना कर रहे हैं। कितने अरबी-फ़ारसी शब्द हमारी बोली में आ चुके हैं, इसका अनुमान इसी बात से किया जा सकता है कि बच्चों के लिए जो संक्षिप्त शब्द कोश ”बाल शब्दसागर“ के नाम से कई वर्ष पूर्व हिंदी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार एवं समालोचक बाबू श्यामसुन्दर दास ने प्रकाशित किया था, उसमें लगभग चार-पाँच हज़ार अरबी-फ़ारसी शब्द सम्मिलित हैं। बाहर से आकर हिन्दुस्तान में बस जाने वाले मुसलमानों ने सत्तर-अस्सी हज़ार शुद्ध हिन्दू शब्द, हिन्दी मुहावरे, हिन्दी कहावतें, टकसाली हिन्दी के टुकड़े अपना लिये और टकसाली हिन्दी के व्याकरण को भी अपना लिया जो शताब्दियों के मेल-जोल से टकसाली हिन्दी का अंश बन चुके थे। इसी मिलीजुली हिन्दी का नाम बाद को उर्दू पड़ गया। उर्दू शब्द शाहजहाँ के काल में पहले-पहल फ़ौज के लिए प्रयोग किया गया था। मुग़ल फ़ौज का नाम था उर्दू-ए-मोअल्ला अर्थात् महान् सेना। इस फ़ौज के साथ बहुत बड़ा बाजार था जो उर्दू बाज़ार (फ़ौजी बाज़ार) कहलाता था। इस बाज़ार का अस्सी-नब्बे प्रतिशत व्यापार हिन्दुओं के हाथ में था। अधिकांश मंडियाँ, आढ़तें और दुकानें हिन्दू महाजनों की थीं। वस्तुओं के क्रय-विक्रय के साथ शब्दों का लेन-देन भी शुरू हो गया और इसी तरह मुसलमानों ने सत्तर-अस्सी हजार शुद्ध हिन्दी शब्द और हिन्दी भाषा के समस्त टुकड़े और नियमावली अंगीकार कर ली।

शहर की बोली की नोक-पलक दुरुस्त करने में धर्म और शिक्षित वर्ग का बड़ा हाथ होता है। चूँकि मिली-जुली हिन्दी अर्थात् उर्दू, अब दिल्ली शहर और बाद को दूसरे शहरों और क़स्बों की बोली बनी गयी और इस बोली को रचने और सँवारने में उन मुसलमान घरानों की सेवाएँ प्राप्त हुईं जिनमें पुरुष और स्त्री सभी पढ़े-लिखे होते थे और जो गँवारपन का भी शिकार नहीं हो सकते थे। केवल वे ही अरबी-फ़ारसी शब्द मिली-जुली हिन्दी में आये जिनसे कान के परदों को ठेस न लगे। इन घरानों ने उर्दू को न गँवारों की भाषा बनने दिया और न मौलवियों की ही भाषा। पढ़े-लिखे सभ्य मुसलमान घराने जनसाधारण से अलग या कटे-कटे नहीं रह सकते थे। बोली के विषय में जनसाधारण के समीप ही रहे होंगे। बोली के सम्बन्ध में दिल्ली की या जहाँ-जहाँ दिल्ली की बोली पहुँच चुकी है वहाँ की ज़िन्दगी को टुकड़े-टुकड़े नहीं होने दिया गया। अवश्य ही यह ज़िन्दगी बोली के मामले में टुकड़े-टुकड़े हो जाती अगर ये मुसलमान घराने एक ओर से देहातीपन या गँवारपन को न रोकते और दूसरी तरफ़ हिन्दी से ताल-मेल न खाने वाले बड़े-बड़े मोटे-मोटे उन अरबी-फ़ारसी शब्दों को हिन्दी में ठूँसते जो हिन्दी के गले में शुष्क निवाले की तरह अटक कर रह जाते। इन मुसलमान घरानों ने ज़बरदस्ती या धाँधली से अंधाधुंध अरबी-फ़ारसी शब्दों को अपनी हिन्दी में फटकने न दिया होगा। इन्हें उस भाषा को परवान चढ़ाना था जो जनसाधारण की भाषा थी। लीजिए, लगे हाथों इस बात का भी जवाब मिल गया कि उर्दू में अरबी-फ़ारसी शब्दों का बाहुल्य क्यों नहीं होती है। उर्दू का वह भाग जिसमें अरबी-फ़ारसी शब्दों की बहुतायत होती है, उर्दू साहित्य का एक बटे सौ भाग है। बोल-चाल के रूप में उर्दू भाषा शताब्दियों तक साँचे में ढलती रही, तब कहीं जाकर उर्दू में पहला शेर कहा गया और उर्दू कविता में लोगों ने अपनी बोली की गूँज और झन्कार सुनी। वातावरण और हृदयों का सन्नाटा दूर हो गया। घर-बार और बाज़ार की भाषा ने कविता की देवी का रूप धारण कर लिया।

हाँ, तो अरबी-फ़ारसी के वे ही दो-चार हज़ार शब्द उर्दू में सम्मिलित किये गये जिनकी बनावट और जिनका रूप-रंग और जिनकी आवाज़ पचासों हज़ार शुद्ध हिन्दी शब्दों से मिलती थी। शुद्ध हिन्दी का एक शब्द ऐसा नहीं होता जिसमें हर अक्षर की पूरी और अलग आवाज़ सुनाई दे। इसी तरह की ध्वनि वाले अरबी-फ़ारसी शब्द उर्दू में अपनाये गये।

दिल्ली में उर्दू साहित्य के जन्म लेने से पूर्व जो भाषा प्रचलित थी, उसमें अरबी-फ़ारसी के शब्द शुद्ध हिन्दी शब्दों से इस तरह घुल-मिलकर ज़बानों पर चढ़ गये थे कि उन्हें एक-दूसरों से अलग किया ही नहीं जा सकता था। बहुत-से अरबी-फ़ारसी शब्द तो ऐसे थे जिनके कई-कई मतलब होते थे। ये शब्द टकसाली बोली और मुहावरों की जान थे। उदाहरणस्वरूप “साफ़” शब्द ले लीजिए और इसके रंगारंग प्रयोग देखिए
(1)        तुमने बात समझा दी मेरा दिल साफ़ हो गया।
(2)    उसने रुपया देने से साफ़ इन्कार कर दिया।
(3)    रामचन्द्र की लिखावट बहुत साफ़ है।
(4)    तुम्हारा लिखा हुआ मुझसे साफ़ नहीं पढ़ा जाता।
(5)    साफ़-साफ़ बताओ, तुम क्या चाहते हो।
(6)    जादूगर के हाथ की सफ़ाई देखने के क़ाबिल है।
(7)    मोटेमल पाँच सेर खाना साफ़ कर गये।
(8)    सफ़ाई के गवाह कल पेश होंगे।
(9)    मेरा हिसाब साफ़ हो गया।
(10)   दाग़ का मिसरा है “साफ़ छुपते भी नहीं, सामने आते भी नहीं।”
(11)   साफ़ बात तो यह है।
(12)   उनकी नीयत साफ़ नहीं है।
(13)   थोड़ा दो गज़ की टट्टी साफ़ कूद गया।
(14)   एक बार मैं अपने एक मुसलमान दोस्त की दावत में शरीक था। वे चमचे से खा रहे थे, मैं हाथ से। जब मिठाई आयी तो मुझे हाथ धोने के लिए उठना पड़ा और मैंने उनसे कहा, भाई तुम्हारे हाथ तो साफ़ हैं। उन्होंने कहा, हाथ भी साफ़ हैं और दिल भी साफ़ है। मैंने कहा, जी हाँ, हाथ भी साफ़ हैं, दिल भी साफ़ है और दिमाग़ भी साफ़ है।

ख़राब शब्द लीजिए और उसके भिन्न-भिन्न प्रयोग देखिए :
(1)        बड़ा ख़राब आदमी है।
(2)    सैकड़ों आदमियों की दावत थी और आये कुल दस-बारह आदमी। बहुत-सा ख़ाना ख़राब हो गया।
(3)    खाने के सजे-सजाये थाल में छिपकली गिर पड़ी। कुल खाना ख़राब हो गया।
(4)    बुख़ार में मुँह का मज़ा ख़राब हो जाता है।
(5)    वह कीचड़ में गिर पड़ा और उसके कुल कपड़े ख़राब हो गये।
(6)    वह लड़कपन से ही ख़राब संगत में पड़ गया था।
(7)    हमारा वक़्त ख़राब न कीजिए।
(8)    वकील की ग़लत बहस से हमारा मुक़दमा ख़राब हो गया।
(9)    हाकिम ने बड़ा ख़राब फैसला दिया है।
(10)   उसके इम्तहान का नतीजा बड़ा ख़राब निकला।
(11)   यहाँ की जलवायु ख़राब है।
(12)   तुम ख़ुद भी ख़राब हो और दूसरों को भी ख़राब करोगे।
(13)   उर्दू का प्रसिद्ध शेर है—

यह जो चश्म-पुरआब हैं दोनों,
एक ख़ाना ख़राब हैं दोनों।

ग़ज़ब :
(1)    ग़ज़ब की तक़रीर थी।
(2)    ग़ज़ब की आँख तो है उलफ़त की नज़र न सही।
(3)    आप क्या ग़ज़ब ढा रहे हैं।
(4)    ऐसा कीजियेगा तो ग़ज़ब हो जायेगा।
(5)    ख़ुदा का ग़ज़ब है।
(6)    ग़ज़ब का सैलाब आया।
(7)    यह क्या ग़ज़ब है !

रंग :
(1) रंग लाना; (2) रंग उड़ाना; (3) रंग जमाना; (4) रंग बांधना; (5) रंग पकड़ना; (6) रंग बदलना; (7) रंग चमकाना; (8) रंगे-तबीयत; (9) रंग-ए-महफ़िल; (10) यह शेर ग़ालिब के रंग में है; (11) रंग-ढंग; (12) रंग मलना; (13) रंग खेलना; (14) रंग उछालना।

नाम : (यह शब्द संस्कृत भी है और फ़ारसी भी)
1) नाम रखना; (2) नाम उछालना; (3) नाम कमाना; (4) नाम करना; (5) नाम लेना; (6) नामी गरामी; (7) नाम से काँपना; (8) क्या नाम कि; (9) नाम बनाम; (10) बराये नाम; (11) नाम-वाला; (12) नाम चमकना; (13) नाम तक न लेना; (14) नाम-ए-खुदा।

दाम :
(1) दाम लगना; (2) दाम उठना; (3) दाम बढ़ना या घटना; (4) दाम चढ़ना; (5) दाम उतरना; (6) दाम के दाम; (7) दाम वसूलना; (8) मुनाफ़ा तो नहीं हुआ लेकिन दाम के दाम निकल आये; (9) दाम लिखा हुआ है; (10) दाम बहुत देने पड़े; (11) आम के आम गुठलियों के दाम; (12) दाम गिरना; (13) दाम मारना; (14) बे-दामों मोल ले लेना।

यह हाल तो सिर्फ 6 शब्दों का है जिनके इतने प्रयोग गिनवाये गये हैं। अगर इन अरबी-फ़ारसी शब्दों को हम अपनी बोली से निकाल दें तो इन थोड़े-से शब्दों के स्थान पर अनेक शब्द गढ़ने पड़ेंगे और हमारी बोली बिगड़ कर रह जायेगी। इसी तरह कई सौ और भी अरबी-फ़ारसी के शब्द हैं जो हमारी बोली में खप चुके हैं। अगर हम अरबी-फारसी के ऐसे सब शब्द निकाल दें तो हमें हज़ारों शब्द गढ़ने पड़ेंगे और बोली का मज़ा भी जाता रहेगा। बात बनने के बदले बिगड़ जायेगी। हम ज़बान के कुछ ऐसे टुकड़ों की फ़िहरिस्त नीचे दे रहे हैं जिनमें एक शब्द अरबी-फ़ारसी का है और दूसरा या तो शुद्ध हिन्दी का शब्द है या संस्कृत का। उर्दू कविता अभी आरम्भ नहीं हुई थी और उससे कई सौ बरस पहले से आज तक ये टुकड़े हिन्दी भाषा-भाषियों की ज़बान पर चढ़े हुए हैं।

शादी-ब्याह, हँसी-खुशी, हित-मुद्दई, खोज़-ख़बर, गाँठ-गिरह, रंग-रूप, रंग-पानी, रंग-ढंग, राग-रंग, धन-दौलत, गाली-गुफ़्तार, हँसी-मज़ाक, इज़्ज़त-पानी, बाल-बच्चे, क़िस्सा-कहानी, हल्वा-पूरी, देर-सबेर, सुबह-सबेरे, काग़ज़-पत्तर, जी-जान, नाक-नक़शा, नोंक-झोंक, नोक-पलक, दंगा-फ़साद, हाट-बाज़ार, चोली-दामन, लाज-शरम, पट्टीदार-पहरेदार, थानेदार, जगत-उस्ताद, पूजा-नमाज़, दीन-धरम, बे-लाग, बे-धड़क, बे-सुध, बे-भाव, खुले-बन्दी, धोके-बाज़, मिठाई-नमकीन, सूद-ब्याज, पीक-दान, सिंगार-दान, चादर-दोपट्टा, चोर बाज़ार, गिरह-कट, बैठक-बाज़, दम-भर, बे-धरम, दान-ख़ैरात, जोड़ा-जामा, नशा-पानी, राम-रहीम, साधू-फ़क़ीर, नाश्ता-पानी, तिड़ी-बाज़, छीना-झपटी, मूल-दाम, रोब-दाब, नौकर-मालिक, नफ़ा-घाटा, खुले-आम, दरिया-पहाड़, साधू-बाबा, बू-बास, बालबीका, चौराहा, बनियां-बक़्क़ाल, सादा कपड़ा, सीधा-सादा, बस-एख्तियार, ज़ोर-बस, राह-बाट, लालपरी, जोड़ा-जामा, सोहबत-संगत, शर्बत-पानी, दाना-पानी, हुसेन-सागर, अलीगढ़, मुज़फ़्फ़रनगर, अलीनगर, मछलीशहर, छतरमंज़िल, मोतीमहल, मरहम-पट्टी, पागलख़ाना, चिड़ियाख़ाना, फटेहालों, अन्दर-बाहर, परमासा, खेल-तमाशा, हाल-चाल, ख़ाँसी-ज़ुकाम, आदमी-जन, अच्छा-ख़राब, राज-महल, ख़ुले-ख़जाने, मोम-बत्ती, आराइश, शुभ-सायत, नेक-महूरत, घोड़-सवार, पट्टे-बाज़, मोटा-महीन, बारीक-चावल, जूती-पैज़ार, सरपंच, तीन-चार, दलबंदी, हज़ार बरस।

निम्नलिखित फ़िक़रों, मिसरों, मुहावरों, और शेरों में अरबी-फ़ारसी के साथ हिन्दी शब्दों का मेल ध्यान देने के योग्य हैं—एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाना, ख़ून-पसीना एक करना, ख़ून होना, ख़ून करना, ख़ूबी, दिल को दिल से राह होती है, दिल से उतर जाना, दिल में घर करना, दिल आ जाना, जान का जंजाल, दिल भर आना, बड़ी मुसीबत है, बड़ी मुश्किल है, शामत आयी हुई है, ख़ुदा ख़ैर करे, जवान-जहान, मान न मान मैं तेरा मेहमान, अब आप चलते-फिरते नज़र आइए, होश की दवा करो, जवानी दीवानी, जो शरारत करेगा उसकी ख़ूब ख़बर ली जायेगी, ख़ाक में मिलाना, नयी जवानी मांझा ढीला।

मिसरे—
ख़ाब था जो कुछ कि देखा, जो सुना अफ़साना था—
तबीयत उधर नहीं जाती, (ग़ालिब)

दो चार शेर भी मुलाहिज़ा हो—
मिटा मिटा के मुझे ख़ाक में मिला दोगे।
ख़ुदा जो पूछेगा इसका जवाब क्या दोगे।।
सड़क  पे  सुरखी  कुटती  देखी।
मुफ़्त की दौलत लुटती देखी।।
हमारी तरफ़ अब वह कम देखते हैं।
वह नज़रें नहीं जिनको हम देखते हैं।।
ज़माने के हाथों से चारा नहीं है।
ज़माना हमारा तुम्हारा नहीं है।।

इसी तरह के हज़ारों फ़िकरे और जुमले हमारी भाषा में ऐसे हैं जिनमें से हम अरबी-फ़ारसी शब्द निकालें तो हमारी बोली बिगड़ जायेगी। जैसे राह फ़ारसी का शब्द है, इसे अगर हम अपनी भाषा से निकाल दें तो हम यह नहीं बोल सकते—राह पर लगना, राह पर लाना, अपनी राह लगो, राह या रास्ता लेना, राह कठिन है, राह चलते दिल में राह करना, राह में काँटे बिछाना, राह देखना, राह भूलना, राह न चलना, राह पाना, राह या रास्ता देना, राह छोड़ना, इधर राह कैसे भूल बैठे?

कुछ और वाक्यों में से अरबी-फ़ारसी शब्द अगर हम निकाल लेना चाहें तो हमारी बोली का बुरा होगा।

(1) दिल ने दुनियाँ नयी बसा डाली, और हमें आज तक ख़बर न हुई; (2) तुम्हें कुछ खबर भी है; (3) भाई, खूब आये; (4) वह जो क़ाबू में ही नहीं आये; (5) आज बाज़ार बंद है; (6) खुलता किसी पे क्यों मेरे दिल का मोआमला; (7) शेरों के इन्तख़ाब ने रुसवा किया मुझे; (8) मुझ पर रोब न जमाइए; (9) मैं उनके रोब में आ गया; (10) मेरा बच्चा बीमार है; (11) होश की दवा करो; (12) चुग़ली खाना बहुत बुरी बात है; (13) जी जान से कोशिश करो; (14) खैर, देखा जायेगा; (15) आजकल वह मुझ पर बहुत मेहरबान है; (16) आप अजब आदमी हैं; (17) हँसी-खुशी ज़िन्दगी काट दो; (18) ख़रबूज़े से ख़रबूज़ा रंग पकड़ता है; (19) किफ़ायत करना सीखो; (20) तुम हज़ार मना करो, वह अपनी आदत से बाज़ नहीं आयेगा; (21) दीवार पर सफ़ेदी फेरी जा रही है; (22) यह आदमी सियाह-सफ़ेद का मालिक है; (23) मैदान साफ़ है; (24) यह लड़का हमारे घर का चिराग़ है; (25) दवा पी लो; (26) इलाज करवाओ; (27) नाखून कटवा लो; (28) मेरा बड़ा हर्ज हुआ; (29) यह नया हुक्म जारी हुआ है; (30) शोर मत मचाओ; (31) मुझे मालूम नहीं; (32) अब उसका ब्याह कर दो; (33) बड़ी बदनामी हुई; (34) खर्च कम करो; (35) हैसियत बिगड़ गयी।

अब से लगभग दो सौ वर्ष पूर्व दिल्ली और लखनऊ में जब उर्दू कविता बढ़ी तो बाढ़ की तरह बढ़ी क्योंकि इस कविता में जन-भाषा के हज़ारों ऐसे टुकड़े हैं जो करोड़ों व्यक्तियों की जिह्वा पर अकबर के समय से ही चढ़े हुए थे। उर्दू कविता ने हिंदी के एक शब्द का भी परित्याग नहीं किया और अरबी-फ़ारसी से अधिक से अधिक ऐसे शब्दों का प्रयोग किया जो ज़बानों पर चढ़ चुके थे। अपने जन्म दिन से ही उर्दू कविता की लोक-प्रियता का यही कारण है। दो-तीन सौ बरस तक यही अरबी-फ़ारसी शब्द सिर्फ हमारी बोली में काम आ चुके हैं। घर की बोली, बाज़ार की बोली, हिन्दू-मुसलमान के आपस की बोली, कारोबार की बोली, हर प्रकार और हर भाँति की बोली में जब हिन्दी शब्दों और मुहावरों के साथ यह अरबी-फ़ारसी शब्द शेर के साँचों में ढलने लगते हैं तो सुनने वाले फड़क जाते हैं और ऐसा महसूस करते हैं कि ग़ालिब के शब्दों में—
वाह री तक़दीर की ख़ूबी कि जो उसने कहा,
मैंने यह जाना कि गोया यह भी मेरे दिल में है।

किन्तु यह समझना भ्रम होगा कि हिन्दी शब्दों में केवल अरबी और फ़ारसी शब्दों को मिला देने से उर्दू बनी है। शत-प्रतिशत हिन्दी शब्दों से भी बनी हुई उर्दू गद्य और कविता की किताबें मिलती हैं। इन किताबों में एक भी अरबी-फ़ारसी का शब्द नहीं है। वस्तुतः खड़ी बोली हिन्दी को एक विशेष ढंग से या एक विशेष शैली में प्रयोग करना उर्दू है जो निम्नलिखित उदाहरणों से स्पष्ट हो जायेगा।

थमते थमते थमेंगे आँसू.....रोना है ये कुछ हँसी नहीं है। (मुसहफ़ी)

तारा टूटते सबने देखा यह नहिं देखा एक ने भी।
किसकी आँख से आँसू टपका किसका सहारा टूट गया।। (आरजू लखनवी)

खिसियानी हँसी हँसना एक बात बनाना है।
टपके हुए आँसू को पलकों से उठाना है।। (आरजू लखनवी)

मेरे होते हुए औरों को इतना सताया जायेगा।
यह तो मुझसे देखती आँखों न देखा जायेगा।।

बदनचोर चित्चोर तो थे ही क्या तुम समयचोर भी हो।
यह तो बताओ लिये जाते हो साथ अपने यह रात कहाँ
झिल-मिल, झिल-मिल तारों ने भी पायल की झनकार सुनी थी,
चली गयी कल छमछम करती पिया मिलन की रात कहाँ।
प्रेम पुजारी नेम धरम से जीना था,
तोड़ दिया हर संजम तुझको क्या सूझी।
छिड़ गयी उन आँखों की बात,
दुनियाँ में अब दिन है कि रात।
ये पाँचों शेर मेरे हैं।
बिगड़े न बात बात पर क्यों जानते हैं वो,
हम वो नहीं कि जिसको मनाया न जायेगा।—(हाली)

वह नहीं भूलता जहाँ जाऊँ-हाय मैं क्या करूँ कहाँ जाऊँ  (नासिख़)
बात भी पूछी न जायेगी जहाँ जायेंगे हम,
तेरी चौखट से अगर उट्ठे कहाँ जायेंगे हम।।— (मशहर लखनवी)

रात चली है जोगन होकर--ओंस से अपने मुँह को धोकर,
लट छिटकाये बाल सँवारे--मेरे काली-कमलीवाले।—(शाद अज़ीमाबादी)

यह जो महंत बैठे हैं दुर्गा के कुण्ड पर,
अवतार बन के कूदेंगे परियों के झुण्ड पर।—(इंशा)

बोझ वो सर से गिरा है कि उठाये न उठे।
काम वह आन पड़ा है कि बनाये न बने।।—(गालिब)

किस तरह बन में आँख के तारे को भेज दूँ।
जोगी बना के राजदुलारे को भेज दूँ।।—(चकबस्त)

तेरी चाल टेढ़ी तेरी बात उल्टी,
तुझे मीर समझा है यां कम कसू ने।— (मीर त़की ‘मीर’)

मुँह से निकली हुई पराई बात— (आतश)
हो गयी एक-एक घड़ी तुझ बिन पहाड़— (हाली)
क्या बने बात जहाँ बात बनाये न बने— (ग़ालिब)
रात गये सुला दिया रात रहे जगा दिया— (जिगर)
कभी कुछ रात गये और कभी कुछ रात रहे— (रियाज़ खैराबादी)
सुहाग हिन्द का तेरी चिता में जलता है— (चकबस्त)
अंधे को अँधेर में बड़ी दूर की सूझी— (इंशा)
उन्हें चाहा न पाया अब किसी को और क्या चाहें— (जगत मोहनलाल रवाँ)

झोंके खाने सँभलते रहने के सिवा— (यास यगाना)
कुछ तो कहिए कि लोग कहते हैं— (ग़ालिब)
ऐसा भी कोई है कि सब अच्छा कहें जिसे— (ग़ालिब)
इधर चमकी उधर सुलगी यहाँ फूँका वहाँ फूँका— (दाग़)
घर जला सामने पर मुझसे बुझाया न गया— (मीर)
भरे हैं आँख में आँसू उदास बैठे हो— (तअश्शुक़ लखनवी)
सब ठाट पड़ा रह जायेगा जब लाद चलेगा बंजारा—(नज़ीर)

मेरा एक मिसरा है
थके-थके से ये तारे थकी-थकी सी ये रात।
अब गद्य की ऐसी पंक्तियाँ उद्धृत की जाती हैं जिनमें एक भी फ़ारसी शब्द नहीं है—
(1) चाँदनी खेत कर आयी; (2) लड़ाई में सैकड़ों लोग काम आये; (3) देखना भाई यह छेड़छाड़ अच्छी नहीं; (4) हाथ पर हाथ धरे बैठे हो; (5) बातें बनाने से बात नहीं बनेगी; (6) बात से बात निकलती है; (7) काम में काम किये जाओ; (8) दिन को दिन न समझो, रात को रात न समझो; (9) दिन डूब चला था; (10) रातों रात धावा बोल दिया; (11) मुझे तुमने कहीं का न रक्खा; (12) आज से मुझे कान हो गये; (13) मैंने बड़े बड़ों की आँखें देखी हैं।

ये बहुत थोड़े से उदाहरण हैं और ऐसे बीसों हज़ार उदाहरण दिये जा सकते हैं जिससे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि हिन्दी शब्दों को एक विशेष ढंग से बोलने या लिखने का नाम उर्दू है। यह ढंग या शैली ही उर्दू भाषा की आधार-शिला है। यही वह ढंग है जिसे हम उर्दू का साँचा कह सकते हैं।

दिल्ली में जो खड़ी बोली शहंशाह अकबर के समय से बोली जा रही थी, उसे पढ़े-लिखे मुसलमान घरानों में सँवारा और रचाया जा रहा था और इन्हीं घरानों में उर्दू ने जन्म लिया और फिर औरंगज़ेब के बाद यह बोली कविता के साँचे में ढलती शहरों-शहरों और कस्बों में फैल गयी और पिछले दो सौ बरसों में कई हज़ार हिन्दुओं और मुसलमानों ने उस ज़बान को रचाने और सँवारने में एक-दूसरे का हाथ बँटाया।

अब हम उन सांस्कृतिक मूल्यों पर दृष्टिपात करेंगे जो उर्दू कविता और गद्य ने हमें दिये।
साहित्य एक महान् कला है। कला का गुण यह है कि वह हमारी चेतना और मस्तिष्क को इस प्रकार जागरूक कर दे कि संसार की हर वस्तु, हर दृश्य, हर घटना सुन्दर दिखाई पड़ने लगे और हमें उससे प्रेम हो जाये। उर्दू कविता ने हमारे मस्तिष्क तथा हमारे चरित्र और हमारे विचार को सँवारने और रचाने में बड़ा हिस्सा लिया है। संकीर्ण विचार और कट्टरपन और वे सारी भावनाएँ जो मनुष्य और मनुष्य के बीच में एक खाई खोदती है—इनको हटाने और मिटाने में उर्दू साहित्य ने बड़ा काम किया। जिस तरह कबीर साहब ने राम और रहीम को एक बताया, उसी तरह उर्दू शायरी ने क़ुफ्र और इस्लाम के भेद को मिटाकर रख दिया। उर्दू कविता की दूसरी देन जीवन के प्रति आकर्षण पैदा करना है। मानव में जो निर्बलता है, उर्दू शायरी हमारे दिलों में उसके लिए दया और सहानुभूति की भावना पैदा करती है। वाइज़, शेख़ और अन्य धार्मिक आडम्बरों का उर्दू कविता ने सदैव मज़ाक उड़ाया है। ऐसे बहुत-से धार्मिक कठमुल्ले शारीरिक सुखों और भोग-विलास को और मानव प्रकृति को समझे बिना ही गुनाह कह दिया करते हैं। उर्दू कविता हमें बताती है कि नेकी और शराफ़त का यह तक़ाजा नहीं है कि आदमी हर प्रकार का सुख अपने ऊपर हराम कर ले। इसीलिए हज़ारों शेरों में यह कहा गया है कि जिन चीज़ों को क़ुफ्र व गुनाह कहा जाता है वे चीज़ें भी जीवन को सँवारती हैं क्योंकि उर्दू शायरी में क़ुफ्र व गुनाह का अर्थ है, दुनिया और जीवन से प्यार। माया को सत्य तक पहुँचने का साधन माना गया है। उर्दू काव्य में सबसे बड़ा स्थान प्रेम को दिया गया है। वासना को बहुत बुरा बताया गया है, लेकिन प्रेम को बहुत अच्छा बताया गया है। प्रेम प्रारंभ होता है किसी रंग-रूप या किसी व्यक्तित्व पर मोहित हो जाने से। अगर इस भाव में दृढ़ता और आत्म-शुद्धि नहीं है, तब यह भाव वासना है लेकिन अगर दृढ़ता और आत्म-शुद्धि है तो इसका तात्पर्य यह हुआ कि शारीरिक सुख प्राप्त करने के बाद भी प्रिय की कल्पना हृदय और मस्तिष्क पर छायी रहेगी। धीरे-धीरे प्रिय की प्रिय कल्पना उन्नत होती जायगी। जीवन और सौन्दर्य सृष्टि की कल्पना में परिणत हो जायेंगे और इस तरह एक व्यक्ति से प्रेम करके हम सृष्टि से प्रेम करना समझते हैं। फिर यह भाव अस्तित्व की तल्लीनता और उस बुनियादी सत्य की चेतना को हमारे अन्दर पैदा कर देगा जिससे हम भौतिक संसार और भौतिक जीवन को दिल समझने लगते हें। यह सब प्रेम का ही प्रभाव है। इस आखि़री मंज़िल पर पहुँच कर हम तसव्वुफ़ के उस रहस्य का अनुभव करते हैं जिससे उर्दू कविता मालामाल है।

उर्दू कविता और भाषा हमें अपने जीवन में हृदय-ग्राहिता, रहन-सहन की सुन्दर शैली और सुरुचि उत्पन्न करती है। इस प्रकार हमारे जीवन में नागरिकता को स्थान मिलता है। जब तक मुद्रण-यंत्र का आविष्कार नहीं हुआ था, उर्दू कविता को सुनने-सुनाने की प्रथा बहुत थी। विशेषतया कसबों या शहरों में आये दिन मुशायरे या शादी की सोहबतें होती रहती थीं। इन मुशायरों में उठने-बैठने के अपने नियम और अपने ढंग होते थे, दाद देने के भी ढंग थे, कविता में दोष या अशुद्धि निकालने के भी ढंग थे। इस प्रकार मस्तिष्क इतना तेज़ हो जाता था कि हाज़िर जवाबी और नोंक-झोंक के फूल बरसने लगते थे। उर्दू शायरी ने हज़ारों लतीफ़ों को जन्म दिया। फ़िक़रा बनाने या चुस्त करने के सैकड़ों तरीक़े हमें बताये। बातचीत का वह गुर उर्दू कविता ने हमें बताया कि कहने वाले और सुनने वाले दोनों फड़क उठे। भाषा और वर्णन में रवानी, मौक़े के हिसाब से उचित शब्दों का चयन, इन सारी चीज़ों का वर्णन उर्दू शायरी में प्रचुर भाषा में मिलता है। साधारण से साधारण शब्दों में उर्दू का कवि जादू भर देता है। एक ऐसे शब्द में जिसे हम एक बूँद के बराबर कह सकते हैं कवि उसमें अथाह और अपरम्पार सागर भर देता है। कबीर की उल्टवासियां प्रसिद्ध हैं। उर्दू कवियों ने भी उल्टवासियों की सहायता से परम सत्य तक पहुँचने का प्रयत्न किया है। उर्दू कविता ने हमारे नागरिक जीवन के सैकड़ों वर्षों की सभ्यता को सैकड़ों कोणों से आइना दिखाया है। उर्दू कविता अंग्रेजी राज्य स्थापित होने के बाद तेज़ी से परिवर्तन होने वाले समय का बराबर साथ देती रही। उर्दू काव्य सन् 1857 के बाद से ही पाश्चात्य साहित्य से पर्याप्त प्रभावित होता रहा। इस प्रकार उर्दू का कार्यक्षेत्र काफी बढ़ता रहा। कविता के नये विषयों का चुनाव हुआ। पुरानी उर्दू कविता में प्रकृति-वर्णन पर कम ध्यान दिया गया था। मगर इधर की साठ-सत्तर वर्ष की उर्दू कविता में प्रकृति-वर्णन पर विशेष ध्यान दिया गया। प्रकृति-वर्णन पर उर्दू में बहुत सराहनीय कार्य होता रहा। देश-प्रेम और स्वतंत्रता-प्रेम ने उर्दू कवियों से अमर कृतियाँ और अमर कविताएँ कहला डालीं।

उर्दू में स्वतंत्र छंद और मुक्त छंद बीसवीं शताब्दी में प्रारंभ होते हैं और अब इस प्रकार की कविता बहुत आगे बढ़ गयी है। इसी युग में उर्दू रुबाई भी काफी आगे बढ़ गयी। इसी युग में एक और महान् कार्य यह हुआ कि आरजू लखनवी और कुछ उनके समकालीनों ने कुछ नये प्रयोग किये। उन्होंने कविता में ठेठ हिन्दी के शब्दों और मुहावरों से ही काम लिया और एक भी अरबी-फ़ारसी शब्द प्रयुक्त नहीं हुआ। व्यंग्य काव्य भी इसी युग में अच्छी तरह पनपा। इसी युग में अनुवाद का काम भी अधिक मात्रा में हुआ। संस्कृत और दूसरी भाषाओं की कविताओं और नाटकों का अनुवाद बड़े ही सुन्दर ढंग से उर्दू में हुआ।

भारतवर्ष की हर भाषा का गद्य साहित्य मुद्रण-यंत्र के आविष्कार होने के बाद बहुत उन्नत होता गया। संसार भर को गद्य का सबसे शानदार नमूना ग्रीक दार्शनिक प्लेटो ने दिया। यूनानी अन्य गद्य लेखकों ने भी बहुत सुन्दर गद्य की रचना की। यूनानी भाषा के गद्य के पश्चात् लैटिन भाषा के लिखने वाले ने भी यूनानी गद्य से गद्य लिखना सीखा। जब अरब वालों ने यूनान और यूरोप के दूसरे देशों को जीता तो सैकड़ों यूनानी और लैटिन किताबों का अनुवाद अरबी ज़बान में किया और इस प्रकार अरबी भाषा में बहुत बड़े गद्य-साहित्य का आविर्भाव हुआ। ईरान वालों ने यूनानी, लैटिन और अरबी से गद्य की हज़ारों पुस्तकों का अनुवाद फ़ारसी गद्य में किया। इस तरह फ़ारसी गद्य भी बहुत समृद्धिशाली हो गया। हिन्दुस्तान में संस्कृत भाषा में गद्य की पुस्तकें अवश्य हैं, लेकिन वे अधिक नहीं हैं। यही दशा पाली गद्य की भी है। साहित्यिक दृष्टिकोण से अबुलफ़जल की आईनेअकबरी बहुत महत्वपूर्ण किताब है। बाबरनामा की गद्य-शैली भी बहुत सुन्दर है। इसके अतिरिक्त चूँकि मुसलमानों का सारा शासन-सम्बन्धी कार्य फ़ारसी में होता रहा, इसलिए फ़ारसी गद्य में बहुत काम हुआ और यह भाषा काफ़ी फैलती रही।

प्रारंभ से लेकर आज तक की उर्दू कविता, गद्य की रामकहानी अब समाप्त होती है। यह न भूलना चाहिए कि समृद्धिशाली और उन्नत देशों के समकक्ष में एशिया एक पिछड़ा हुआ महाद्वीप रहा है। यूरोप और अमरीका व्यापार और उद्योग में एशिया से बहुत आगे रहे हैं। इन देशों का साहित्य भी बड़ा समृद्धिशाली रहा है। इंगलिस्तान के एक बहुत बड़े शायर ने लिखा था कि यूरोप के पचास साल चीन के एक पूरे युग से अधिक बेहतर, भरपूर और उन्नतिशील हैं। शताब्दियों के स्वप्न के बाद अब एशिया की नींद टूटी है और अब अफ्रीका की नींद भी टूट चुकी है। पराधीनता के बावजूद हिन्दुस्तान की भाषाएँ और उनका साहित्य काफ़ी आगे बढ़ा है और अब तो बढ़ता ही जा रहा है। हिन्दुस्तान की अन्य भाषाएँ और उर्दू का महत्व अब दर्शनीय होगा जब भारत का जीवन हर दृष्टिकोण से समृद्धिशाली हो जायेगा। हमारा सामाजिक, नागरिक और राजीनतिक जीवन भाषा की उन्नति पर ही अवलम्बित है। साहित्य न तो शून्य में तरक्क़ी करता है और न तो जीवन के अन्य अंगों के निर्बल होने से ही उन्नति करता है। 43, 44 करोड़ जनसमुदाय के जीवन के उन्नतिशील होने पर ही भारतीय भाषाएँ तरक्क़ी कर सकती हैं। यूरोप, अमरीका या संसार के अन्य देशों की पराधीनता हमारे लिए विष है। पाश्चात्य देशों के साहित्य से घृणा करके हम बड़ा साहित्य पैदा नहीं कर सकते। भविष्य में तभी बड़ा साहित्य पैदा हो सकता है, जब हमारे चोटी के लेखक अधिक अंश तक पश्चिमी साहित्य का अध्ययन करें। एक ओर हमें वेदों से लेकर आज तक की सांस्कृतिक निधियों को अपनाना होगा और दूसरी ओर हमें पाश्चात्य देशों के साहित्य से भी भली प्रकार परिचय प्राप्त करना होगा। हमें अपने भूतकाल से बहुत कुछ सीखना है और यूरोप और अमरीका से भी बहुत कुछ सीखना है। ये ही वे दो पहिये हैं जिनके सहारे हमारे देश के जीवन और साहित्य का जलूस आगे बढ़ सकता है।

साभार : उर्दू भाषा और साहित्य

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