तरजुमा
Men by Maya Angelou

मर्द

अनुवाद : खुर्शीद अनवर

उन जवानी के दिनों के लम्हात
मर्द जब सड़कों पे आवारागर्द होते थे
मर्द कुछ उम्र दराज़, और शराबी कुछ मर्द
नौजवां तेज़ और तर्रार से मर्द
तकती रहती थी उन्हें पर्दों से छिपकर अक्सर
देखो देखो तो इन्हें
मर्द रहते किसी सिम्त रवां हर लम्हा

उनको एहसास था होने का मेरे थी मैं जहाँ
पन्द्रह बरसों की कि होने को थी दोशीज़ा जवाँ
मेरी नज़रों में थी भूक वह छुप सकती कहाँ
वह ठहर जाते थे उस जा मेरी खिडकी थी जहाँ
एक जवाँ लड़की के उभरे हुए सीने की तरह
काँधे उनके भी उठे होते थे इस दर्जा वहां
और इन मर्दों के जिस्मो चढ़े कोट वहां
दूसरे मर्दों के छूते थे जो होते थे वहां

और फिर मर्द हथेली में यूँ भरते हैं तुम्हे
ऐसा एहसास दिलाते हैं जो छूते हैं तुम्हे
जैसे एक नस्ल फ़ना होगी अगर तुम टूटी
फिर ज़रा हलकी सी बढती है उन हाथों की गिरफ्त
खुशनुमा होता है उस लम्हे की लज़्ज़त का समां
और आगोश में भर लेता है ऐसे फ़ौरन
कि कोई रोक भी न पाए न हो ऐसी चुभन
रफ्ता रफ्ता यह गिरफ्त बढती है सारे तन पर
दर्द आता है दबे पांव रगों में चढ कर
डर के एहसास में लिपटी हुई मुस्कान के साथ
गुम हुई जाती हवाओं की हर रफ़्तार के साथ
ज़ेहन फटता है रगें फटती है कुछ लम्हों को
कोई चिंगारी तड़पती है पर कुछ लम्हों को
और जो कतरे फिसलते हैं उनकी टांगों में
और पनाह लेते हैं जूते में ढके पावों में
यह वह कतरे है जो निकले हैं तुम्हारे तन से
और जा टपके हैं उन जूतों में और टांगों में
और जब धरती संभलती ज़रा देर के बाद
ज़ायेक़ा आता है वापस जो ज़बां पर इक बार
जिस्म तब तक तो बिखर चुकता है रेज़ा रेज़ा
बंद हो चुकते है जीवन में हैं जितने भी किवाड़
ढूंढ कर भी नहीं मिलता किसी चाभी का सुराग

तार-ओ-तरीक यूँ हो जाती है दुनिया पूरी
और फिर होती है बंद ज़ेहन पे खिड़की पूरी
उसी लहराते हुए पर्दों से कुछ दूर ज़रा
मर्द आवारा गुज़रते हैं वहां हर एक जा
ज़ेहन में याद लिए कदमों में रफ़्तार लिए
मर्द रहते किसी सिम्त रवां हर लम्हा
और मैं अब से इसी जगह से बस चुप रह कर
देखूंगी सारा नज़ारा पर जुबां बंद रख कर

डॉ. खुर्शीद अनवर
माँ और धरती माँ
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