तरजुमा
Maya Angelou की कविता “Still I Rise” का अनुवाद

फिर से उठती मैं हूं खुद अपनी बुलंदी बनकर

अनुवाद : खुर्शीद अनवर

झूठ और मक्र की चादर में लिटा कर मुझको
ग़र्क करदो मुझे इतिहास के पन्नो अभी
रौंद कर क़दमो तले धूल बना दो मुझको
जिस तरह धूल उठे मैं भी उठूँगी फिर से
तुम मेरे अज़्म से बतलाओ कि डरते क्यों हो ?
इतने नाशाद हो क्यों इतने परेशां क्यों हो ?
'क्योंकि हर एक कदम मेरा बताता है तुम्हे
जैसे मैं तेल का एक पूरा ज़खीरा ले कर
अपने कमरे को उजालों की जिला देती हूँ .'
जिस तरह रोज़ चमकता सरों पर सूरज
जिस तरह चाँद निकलता शबों के ऊपर
जिस तरह पुख्ता इरादे हो मेरे दामन में
उस तरह फिर से उठूँगी मैं इसी दुनिया में

क्या यह ख्वाहिश है कि मैं टूट के टुकड़े होऊँ
और नज़रें मेरी झुक जायें और सर झुक जाये ?
मेरे रोने की सदा सुन के सहम के आखिर
शाने झुक जायें मेरे आंसू के कतरे की तरह

क्यों तुम्हे चोट पहुँचती है मेरे तेवर से
क्या कोई खौफ नहीं तुमको मेरे इस रुख से
' क्योंकि यूँ हंसती हूँ मैं जैसे कि मेरे आँगन में
कोई सोने का ज़खीरा उतर आया हो मेरे दामन में'

अपने लफ़्ज़ों से मुझे कितना ही ज़ख़्मी कर लो
अपनी नज़रों मेरे जिस्म को छलनी कर दो
अपनी नफरत से मुझे कितना ही तुम क़त्ल करो
मैं उभर आऊँगी कि हूँ ताज़ा हवा का झोंका

क्यों तुम्हे चुभता है चढ़ता हुआ मेरा यौवन
तुमको हैरान सा करता है क्या मेरा यौवन ?
क्यों कि मैं रक़्स खो जाती हूँ एहसास जो हो
बीच जांघों के मेरी जैसे कि हीरा चमके

पिछली तारीखों में जो शर्म थी उस से बढ़ कर
फिर से मैं उठती हूँ खुद अपनी बुलंदी बनकर
दर्द के माज़ी को उठ कर उसे ठोकर देकर
फिर से उठती मैं हूँ खुद अपनी बुलंदी बनकर

काला सागर हूँ तड़पती हूँ उमड़ती हूँ मैं
फ़ैल जाती हूँ मैं लहरों में मचलती हूँ मैं
खौफ़ और दर्द की रातों से परे जाकर मैं
फिर से उठती मैं हूँ खुद अपनी बुलंदी बनकर
सुब्ह का तेज़ और शफ्फाफ़ उजाला बनकर
फिर से उठती मैं हूँ खुद अपनी बुलंदी बनकर
अपने पुरखों से कमाई हुई मीरास लिए
और ग़ुलामों की उमीदें लिए और ख्वाब लिए
फिर से उठती मैं हूँ खुद अपनी बुलंदी बनकर

डॉ. खुर्शीद अनवर
माँ और धरती माँ
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