तरजुमा
'POETRY'
पाब्लो नेरुदा के जन्मदिन (12 July 1904) पर
कविता

अनुवाद : खुर्शीद अनवर

आज भी याद है वह उम्र मुझे
जुस्तुजू में मेरी जब शायरी मुझ तक पहुची
क्या खबर, कौन सी जानिब से नमूदार हुई
सर्द मौसम पे या दरयाओं के सीने पे सवार
कौन सा लम्हा था हालात थे क्या
कोई आहट कोई अल्फाज़ न आवाज़ सुनी
और ख़ामोशी हो, ऐसा कोई एहसास नहीं
रहगुज़ारों से मुझे उसने तलब फ़रमाया
रात की बाँहों से, और दहके हुए शोलों से
लौटती राहों से और गुज़रे हुए सालों से
सामने उसके था बेचेहरा इक वजूद के साथ
उसने आहिस्ता से जब थाम लिया मेरा हाथ

फाख्ता हो गए अल्फाज़ थे जो मेरे पास
कोई चेहरा कोई पहचान न रहने पायी
इक सियाही ही थी जो आँखों पे आकर छाई
और फिर रूह पे तूफ़ान उठा कुछ ऐसा
एक परवाज़ भरी, पर मेरे आज़ाद हुए
और मैं चल पड़ा बिखरी सी फिज़ा की जानिब
आग की शक्ति का जो राज़ था मुझ पर वह खुला
धुंधली सी पहली सतर मेरे वरक पर उतरी
जिसके मानी भी न थे
बेसबब, माँ’नी-ओ-मतलब से परे पूरी तरह
अनछुए ज़ेहन से लबरेज़ भी थी पूरी तरह
नागहाँ, खुलने लगे मेरी नज़र के आगे
आसमानों के दरीचे भी ग्रहों के परदे
लहलहाने लगी इक सब्ज़ सी वादी हर सू
सायबानो ने किये चाक गरीबां ऐसे
गुल के बूटे भी समाये तो कहीं आग और तीर
टूटने को हुई पांवों में पडी हर ज़ंजीर
शब् का फैलाव तो क्या एक मुकम्मल सा जहाँ
मेरी हस्ती के मुक़ाबिल था ज़माना सारा

मेरी हस्ती जो अभी खाली थी ज़र्रा भी न थी
उसने पैमाने पिए तारों भारी वुसअत के
उसमे खुलने लगे अनजान जो थे वह खाके
अनखुले राज़ का हमराज़ बना कर मुझको
हमसफर मेरे हुए सारे दमकते तारे
दिल चला साथ हवाओं के उफक पर सारे
डॉ. खुर्शीद अनवर
माँ और धरती माँ
लेबल
© 2011 INSTITUTE for SOCIAL DEMOCRACY. ALL RIGHT RESERVED. Powered by: Datapings
Post on Facebook Facebook