संस्कृति
नौटंकी—एक साझी विरासत

आई.एस.डी.

भारतीय पारम्परिक थियेटर को दो मूल धाराओं में बांट कर देखा जा सकता हैः ‘धार्मिक’ और ‘लौकिक’। नौटंकी एक धर्मनिरपेक्ष विधा है। ये इस बात से ज़ाहिर होता है कि ये हिन्दी भाषी प्रदेश में प्रचलित धार्मिक थियेटर ‘रामलीला‘ और ‘रासलीला’ की तरह विशेष देवी-देवताओं की स्तुति और पूजा में नहीं की जाती और न ही इसका कोई वार्षिक प्रारूप है (जैसे दशहरा या कृष्णाष्टमी)। नौटंकी केवल मनोरंजन का माध्यम है इसमें स्फूर्तिपूर्ण नृत्य, ढोल पीटने की आवाज़ और पूरी आवाज़ में गीत गाना, ये सब अपने आप एक ऐसा वातावरण बना देता है जो कि न तो धार्मिकता और न ही नैतिकता पर ज़ोर देता है। नौटंकी रामायण या महाभारत से भी प्रेरित नहीं है और नौटंकी करने वाले किसी मंदिर या पूजा संस्थान से नहीं जुड़े होते।

नौटंकी की धर्मनिरपेक्षता इस बात से भी साबित होती है कि नौटंकी हिन्दी और उर्दू दोनों की सांस्कृतिक परम्परा से जुड़े विषयों का मंचन करती है जैसे ‘लैला मजनू’ और ‘शीरी फरहाद’ नौटंकी के सबसे मशहूर प्रेम प्रकरण हैं। मध्यपूर्व की कुछ कहानियां भी नौटंकी ने पूरी तरह अपनायीं हैं। मंचन के दौरान हिंदी और उर्दू दोनों का, दोनों भाषाओं की लय और ताल का इस्तेमाल नौटंकी के धर्मनिरपेक्ष साझी विरासत होने का एक और सबूत है। इसी तरह नौटंकी के ग्रुप में दोनों हिन्दू और मुसलमान होते हैं और दर्शकों में भी दोनों ही रहते हैं।

जहां तक कहानियों और विषयों का सवाल है वहां नौटंकी में दोनों समुदायों से संबंधित अर्ध-धार्मिक, नैतिकता और निष्ठा से जुड़े विषयों का समावेश होता है। मशहूर कहानियां जैसे ‘राजा हरिश्चंद्र’, साधु संतों की कहानियां: ‘गोपीचंद’, ‘भतृरी’, ‘पूरन मल’ और अन्य या फिर बलिदान वाली कहानियां जैसे ‘प्रहलाद’ और ‘ध्रुव’, इसके अलावा जादूई और चमत्कारिक कहानियां भी नौटंकी में खेली जाती हैं। नौटंकी में पंजाब के दलितों के पूज्य ‘गोगा पीर’ या ‘ज़हार पीर’ भी खेला जाता है। अक्सर नौटंकी की कम्पनियों में सभी समुदायों के लोग होते हैं, इनके विज्ञापन का ढंग भी अलग होता है: प्लेकाडर््स, ढोल पीटना या पब्लिक में ऐलान करना। खेल की जगह अलग होती है और स्टेज रिहायशी तम्बुओं से थोड़ा दूर होता है। नौटंकी, इस तरह देखा जाए तो, पाश्चात्य थियेटर से प्रभावित शहरी थियेटर से बिलकुल अलग है। उसे देखने वाले आज भी किसान, मजदूर, खेतिहर, गरीब और दलित हैं मतलब सर्वहारा वर्ग जबकि शहरी थियेटर के दर्शक ज़्यादातर मध्यम वर्ग से आते हैं। नौटंकी के कलाकार उसी प्रदेश से आते हैं जहां वे खेलते हैं। ज़्यादातर कलाकार दलित जातियों से आते हैं पर सवर्ण भी होते हैं। इनमें भी ज़्यादातर कारीगर जातियों का प्राधान्य होता है। मिसाल के तौर पर हाथरस के कवि और गायक उस्ताद ईदारमन, चिरंजी लाल, गणेशीलाल और गोविन्दराम, रंगरेज जाति के यानी छीपी थे। कानपुर के श्रीकृष्ण खत्री पहलवान दर्ज़ी थे। बनारस के नौटंकी के ट्रुप (सत्तरवें दशक में) में ज़्यादातर मुसलमान कलाकार - डफली, भांड और चमार जाति से थे। लखनऊ के पंडित काकूजी जनेऊ धारण करते थे और अपने को ब्राह्मण कहते थे। वो हमेशा मुसलमान कलाकारों जैसे आशिक हुसैन और मलिका बेगम के साथ रहे और अभिनय छोड़ने के बाद ट्रुप के कपड़े सीने का काम करते रहे। नौटंकी में महिला कलाकार अक्सर दलित बैरिन या नटिनी जाति से होती हैं जो अक्सर नाच गाने और वैश्यावृति से जुड़ी होती हैं।

कुछ भारतीय विशेषज्ञों ने नौटंकी को लोक नाट्य विधा कहना शुरू कर दिया है। लेकिन यह गलत है। नौटंकी में व्यावसायिक कलाकार होते हैं। अक्सर उस गांव के नहीं होते जहां नौटंकी खेली जा रही होती है। चूंकि इसका त्योहारों से कोई संबंध नहीं होता इस तरह नौटंकी को पाप्यूलर थियेटर का नाम भी दिया जा सकता है।

आज के बाज़ारीकरण के दौर में नौटंकी को मास कल्चर (आम जन की संस्कृति) के रूप में भी देखा जा सकता है। आज नौटंकी - रिकार्डों, कैसेटों, फिल्मों और टीवी के माध्यम से सभी दर्शकों तक पहुंच रही है। नौटंकी ड्रामें अब किताबों के रूप में खरीदे जा सकते हैं। इस सबके बावजूद नौटंकी को आज एक ऐसी संगीत, विश्वासों, और सभी समुदायों के सांस्कृतिक धारा के रूप में देखा जा सकता है जो शहरी और ग्रामीण दर्शक के बीच संवाद और संबंध बनाने का काम करती है। नौटंकी ने कहानियों और कविताओं के माध्यम से शहरी और ग्रामीण, साक्षर और निरक्षर, हिन्दू और मुसलमान दर्शकों को एक दूसरे से जोड़ा है। चलता-फिरता ट्रुप अपने साथ गांव से आए कामगार के लिए गांव की ज़िन्दगी की खबर लाता है और इसी तरह गांव को शहर के सामाजिक इतिहास से अवगत कराता है। इस नज़रिए से नौटंकी को अंतर्वती या मध्यमवर्ती (इन्टरमीडिएरी) थियेटर भी कहा जा सकता है। अगर संस्कृत नाटक परम्परा से देखा जाए तो नौटंकी को उपरूपक और संगीत कहा जा सकता है। जैसा कि हम बता चुके है कि जहां तक नौटंकी में विषयों का सवाल है तो नौटंकी ने अरबी और फारसी से प्रेम कहानियां, संस्कृत से महाकाव्य और पुराण, राजस्थान, पंजाब और उत्तर प्रदेश से लोक महाकाव्य, साधु सन्तों, राजाओं, स्थानीय नायकों, उपन्यास, ऐतिहासिक घटनाओं और अखबारों सभी से लिए हैं। ज़्यादातर नाटक शौर्य और प्रेम, और वर्तमान सामाजिक जीवन पर आधारित होते हैं। इन कहानियों को संगीतात्मक रूप दिया जाता है। नौटंकी में हिन्दी कविता पद्धति (दोहा और चौबोला) के साथ साथ प्रादेशिक लोकसंगीत विधाओं जैसे दादरा, ठुमरी, सावन, होली, मांड, लावणी आदि और उर्दू से ग़ज़ल, शेर और कव्वाली का इस्तेमाल किया जाता है। लय, ताल और तिहाई का ख्याल रखा जाता है। इस तरह नौटंकी एक ऐसी विधा है जिसने अपने आप में सभी कुछ आत्मसात कर लिया है और भविष्य में भी सभी धर्मनिरपेक्ष धाराओं को आत्मसात करने को तैयार है।

बीसवीं सदी से पहले आज का नौटंकी थियेटर ‘स्वांग’ के नाम से जाना जाता था। शब्द ‘स्वांग’ और उसका पयार्यवाची शब्द ‘सांग’ ‘संगीत’ शब्द से जुड़ा है जो पहले संगीतमय कथावाचन विधा के लिए जाना जाता था। 1920 के बाद ‘स्वांग’ शब्द की जगह नौटंकी ने ले ली। वैसे आज भी हाथरस-ब्रज प्रदेश में खेली जाने वाली ‘नौटंकी’ को ‘स्वांग’ के नाम से जाना जाता था।

‘स्वांग’ थियेटर की उत्पति उन्नीसवीं सदी के बीच से मानी जाती है। शुरू के ड्रामा ‘प्रहलाद संगीत’ और ‘गोपीनाथ राजा के सांग’ ने आगे आने वाले विषयों और छंद के बीज बोये जो हाथरस और कानपुर परम्परा में पूरी तरह प्रफुल्लित हुए। ‘स्वांग’ एक धर्मनिरपेक्ष और आम जनता के थियेटर के रूप में प्रस्थापित हुआ है हालांकि कुछ का मानना है कि इसकी जड़ में धार्मिक लीलाओं या फिर मध्यकालीन भारत की भक्तिमयता थी। लेकिन तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि स्वांग आम जनता के मनोरंजन की विधा के रूप में ही विकसित हुआ और अपने विकास में ये लोकनाट्य परम्पराओं और शहरी थियेटर की परम्पराओं से प्रभावित भी रहा।

उत्तर भारत में दो धार्मिक लीलाएं, ‘रामलीला’ और ‘रासलीला’, धर्मनिरपेक्ष ‘स्वांग’ थियेटर से पहले प्रचलित थीं। ‘रामलीला’ तुलसीदास कृत रामचरितमानस और ‘रासलीला’ कृष्ण के प्रेम जीवन पर आधारित थी। जहां तक धार्मिक थियेटर की विधा का इतिहास है रामलीला के बारे में तो सभी जानते हैं पर कृष्ण थियेटर या रासलीला के बारे में कम ही जानते हैं। रासलीला कृष्ण संप्रदाय से जुड़ी है। कृष्ण संप्रदाय की तरह कृष्ण थियेटर का इतिहास ‘वेदों’ से भी पुराना माना गया है। प्राचीन भारतीय नाटक या ‘संवाद’ संस्कृत भाषा में नही बल्कि प्राकृत (संस्कृत की अपभ्र्रंश) में लिखे गये थे। यूँ तो कृष्ण थियेटर भारत के सभी प्रदेशों में पाया जाता है पर केरल, असम, गोमान्तक क्षेत्र, उत्तर भारत में प्रमुखतः पाया जाता है। कुछ प्रमुख कृष्ण थियेटरों के बारे में नीचे बताया जा रहा है :

कृष्ण आत्तम - कृष्ण गाथा आधारित ये बहुरंगी नाटक विधा सत्राहवीं सदी के मध्य में केरल में पैदा हुई। इसने प्राचीन कोडीयत्तम थियेटर और कत्थककली को बहुत प्रभावित किया। कृष्ण आत्तम आठ नाटकों की एक श्रृखंला है जो आठ रातों में खेले जाते हैं और कृष्ण की पूरी कहानी बताते हैं। ये नाट्यशैली कत्थककली से काफी मिलती-जुलती है। कवि जयदेव का गीत-गोविन्द एक संगीत ओपेराµभारत के कृष्ण थियेटर में अपना एक विशिष्ट स्थान रखता है। जयदेव ने ये कविता-नाटक, नाटक विधा (गंधर्व कला) में निपुण वैष्णवों के लिये रची थी। ये एक भावना प्रधान प्रेम गाथा है। इसमें अध्यात्म भी निहित है। रास-लीला - कृष्ण का गोपियों के साथ पूर्णमाशी की रात के नाच को रास का नाम दिया गया है। लीला का अर्थ है ग्वाले कृष्ण के दैविक चमत्कारों का वर्णन। कृष्ण संप्रदाय में इस संगीत नृत्य का बहुत ही अनुष्ठानिक महत्व है। रास और भगवान कृष्ण की लीला की परम्परा बहुत पुरानी है। कला - छोटे, खूबसूरत और अपने नाटक और संगीत के लिये जाने जाने वाले गोमान्तक क्षेत्रा में (सहयाद्री के पहाड़ों और अरब सागर के बीच स्थित), कृष्ण थियेटर की अनेक विधाएं प्राचीन काल से चली आ रही हैं और आज भी प्रचलित हैं। प्राचीन लोक-नाटक विधा ‘कला’ ने कृष्ण थियेटर के बीज बोये जो बाद में दशावतार कला, गोपाल कला और गउलान कला के नाम से जाने गये। इस कला का कृष्ण मिथक के संदर्भ में काफी महत्व है। अनकाई नट - सोलहवीं सदी में असम में नव-वैष्णव वादी आंदोलन के दौरान जो कृष्ण नाटक उभरा उसे ‘अनकाई नट’ के नाम से जाना जाता है। ये संगीत-एकांकी कृष्ण गाथा को बयान करता है। साथ ही यह विधा पारम्परिक, क्लासिकल और लोक परम्परा का अद्भूत और सुन्दरतम मिश्रण है।

‘राम लीला’ बनारस प्रदेश में बड़े स्तर पर प्रचलित थी जबकि ‘रासलीला’ ब्रज और वृंदावन-कृष्ण की जन्मभूमि में। इसके अलावा बहुत सी चलती फिरती नाटक मंडलियाँ ‘रामलीला’ और ‘रासलीला’ गांव-गांव जाकर खेला करती थीं। इन ‘लीला’ मंडलियों ने गांवों में जन थियेटर का विकास किया और ‘स्वांग’ और ‘नौटंकी’ के बीज बोये। ‘लीला’ थियेटर, ‘स्वांग’ और ‘नौटंकी’ में बहुत सी समान परम्पराएं है : खुले आसमान के नीचे (ओपन-एयर मंचन), संगीत, नृत्य और पौराणिक देवकथाओं का इस्तेमाल। इनमें विभिन्नताएं भी हैं। लीलाएं भगवान में आस्था और प्रेम बढ़ाने के उद्देश्य से की जाती हैं और अभिनेता, ज़्यादातर ब्राह्मण बच्चे, भगवान के रूप में पेश किये जाते हैं उधर ‘स्वांग’ और नौटंकी का उद्देश्य मनोरंजन करना, कामुकता जगाना और कभी-कभी डर जगाने तक होता है। ‘लीला’ एक पुजारी, किसी बड़े राजा या फिर आज किसी सोसायटी के आधिपत्य में खेली जाती है। ‘नौटंकी’ आज भी टिकट खरीद कर देखी जाती है। ‘लीलाओं’ की भाषा उच्च वर्ग की और साहित्यिक होती है जबकि ‘नौटंकी’ सबकी समझ में आने वाली रोजमर्रा और आम आदमी की भाषा में खेली जाती है। आइन-ए-अकबरी में अबुल फैजी ने नाट्यमंडली को ‘भगतिया’ का नाम दिया यानि जो बहुरूपिया बनकर गीत गाते हैं और नकल उतारने में माहिर होते हैं। मौलाना गनीमत की मसनवी नौरंग-ए-इश्क (1685) में भगतबाज़ों का जिक्र किया गया है। ये लोग बहुरूपिये होते हैं और संगीत वाद्यों को बजाते हैं। दूसरे इतिहासकारों के मुताबिक भांड, नकलची और नट सब प्रदेशों में पाये जाते थे।

‘स्वांग’ की पहली लिखित पांडूलिपी ब्रजभाषा में 1686-1689 के बीच रसरूप द्वारा लिखित ‘हास्यनव‘ में पायी जाती है। अठाहरवीं सदी में सोमनाथ चतुर्वेदी द्वारा लिखित (1752) में ‘माधव विनोद’ है। ‘प्रबोध चंद्रोदय’ में भी कई ड्रामों का नाम है। ब्रज भाषा में ड्रामों और उन्नीसवीं सदी के ‘स्वांग’ में काफी विभिन्नताएं हैं: उनकी भाषा साहित्यिक ब्रज है, छंद में दोहा, चौपाई और सवाई का इस्तेमाल है और मंचन अक्सर राजदरबार में न कि आम जनता के सामने होता था। ‘स्वांग’ जन नाट्य विद्या है, आम जनता के सामने खेला जाता है। इसमें लौकिक, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक कविता का इस्तेमाल होता है जो नट और दूसरे कलाकार गाया करते थे।

ब्रज भाषा के ड्रामे में ‘ख्याल’ शब्द का प्रयोग पाया जाता है। जिसका मतलब भी ड्रामा होता है। ‘ख्याल’ शब्द तीन अर्थ बताता हैः सतरहवीं सदी से प्रचलित शास्त्रीय हिंदुस्तानी मौखिक विधा, मारवाड़ी और राजस्थान की दूसरी बोलियों में लिखा गया राजस्थान का लोकनाट्य और ‘लावणी’, हिंदुस्तानी लोक कविता जो उसी समय रची और गायी जाती है। ‘ख्याल’ का मतलब भी वैसे खेल यानी मनोरंजन यानी ड्रामा है। मतलब लोकनाट्य से जुड़ा है। सबसे पहले सोमनाथ चतुर्वेदी ने अपने ‘माधव विनोद’ में ‘ख्याल’ शब्द का इस्तेमाल किया। घोन्कल मिश्रा ने (1799) ‘प्रबोध चंद्रोदय’ में ‘ख्याल’ शब्द का इस्तेमाल किया। मतलब ये शब्द अठारहवीं सदी से प्रचलित है। राजस्थान में ‘ख्याल’ 1750 में शुरू हुआ। राजस्थान में ये होली के बाद रात में देर सुबह तक चबूतरों पर गांव-गांव जाकर और शहरों में खेला जाता है। राजपूताने की शौर्य और प्रेम गाथाएं इसका विषय होती है। प्रेमगाथाओं में ‘ढोला मारू’, ‘पन्ना विरामद’, ‘सदाब्रत सलंगिया’ और शौर्य गाथाओं में ‘राणा रतन सिंह’, और ‘डूंगर सिंह’ का नाम आता है। छिंदवाड़ा में ‘शेखावती’ और जोधपुर के आसपास ‘कुचामन’ परम्परा में ‘ख्याल’ खेला जाता है। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि आगरा-भरतपुर प्रदेश ‘ख्याल’ की जन्मभूमि है और बाद में ‘ख्याल’ सारे उत्तर भारत में फैला। आज स्थिति यह है कि ये विधा आज हर प्रदेश की सांस्कृतिक और भाषाई पहचान से जुड़ गयी हैः राजस्थान में ‘ख्याल’, उत्तरप्रदेश में ‘नौटंकी’, हरियाणा में ‘सांग’ (स्वांग) और मध्य प्रदेश में ‘मंच’। ‘ख्याल’ की काव्य परम्परा विभिन्न धर्मों के अनुयायीयों के बीच दार्शनिक बहस से जुड़ी है मतलब शास्त्रार्थ, समस्या पूर्ति और संगीतमय संवाद यानि सवाल-जवाब दूसरे शब्दों में ‘तुर्रा-कलगी’ परम्परा से बहस जुड़ी है। इस परम्परा में दो प्रतिस्पर्धी ‘लावणी’ या ‘ख्याल’ विधा में ढोलक और चाँग बजाते हुए एक दूसरे से सीधे सवाल जवाब करते हैं। ‘तुर्रा’ शैवाईटों से जुड़ा है और ‘कलगी’ शक्ति से। दोनों प्रतिस्पर्धी अखाड़ों में बंट जाते हैं और इस प्रतिस्पर्धा को ‘दंगल’ का नाम दिया जाता है। ‘तुर्रा-कलगी‘ की विधा महाराष्ट्र में लोक कविता के रूप में अठारहवीं और उन्नीसवीं सदी में प्रारम्भ हुई। इससे पहले धार्मिक शास्त्रार्थ को महाराष्ट्र में ‘गोंधल’ के नाम से जाना जाता था। दोनों विधाओं में शिव बनाम शक्ति, पुरुष बनाम प्रकृति, ब्रह्म बनाम माया, निर्गुण बनाम सगुण इनको लेकर शास्त्रार्थ होता था। ‘गोंधल’ और ‘तुर्रा-कलगी’ परम्परा दोनों बाद में महाराष्ट्र के लोकनाट्य ‘तमाशा’ का हिस्सा बन गयीं। ‘तमाशे’ में शिव और पार्वती के बीच ‘लावणी’ विधा में सवाल जवाब होते हैं। इसके बाद एक ‘गाउलान‘ नाम का कामुक नृत्य होता है। ‘तमाशे’ में ‘तुर्रा-कलगी’ परम्परा का प्रभाव पाया जाता है। इसलिये इसमें ‘झगड़ा’ या सवाल-जवाब होते हैं। ‘तमाशा’ करने वाली मंडलियां अपने को ‘तुर्रा’ और ‘कलगी’ का नाम देती हैं। ऐसा माना जाता है कि ‘तुर्रा-कलगी’ मंडलियां अपनी ‘लावणी’ के साथ महाराष्ट्र से उत्तर भारत में मराठा सेना के साथ-साथ आयीं। 1910 में ये सहारनपुर (उ.प्र.) में पायी गयी। म. प्र. में ये ‘मंच’ या मच, चितौड़ और घोसुन्डा (राजस्थान) में ‘ख्याल’ से जुड़ गयीं। बंगाल में इसी तरह के ड्रामों को ‘कबि’ या ‘कवि’ कहा गया है। ‘कबि’ शिव, शक्ति और कृष्ण या दूसरे मिथकों को लेकर दो मंडलियों के बीच गाया जाता है। बाद में ये ‘जात्रा’ का हिस्सा बन गया।

लोक नाटक ‘स्वांग’ ने भी ‘तुर्रा-कलगी’ परम्परा को अपने में जोड़ लिया। प्रतिस्पर्धी अपने को तुर्रा-कलगी का नाम देने लगे। सवाल जवाब के अलावा तुर्रा-कलगी की एक और विरासत है जो ‘स्वांग’, ‘भगत’, ‘ख्याल’ और ‘मंच’ में पायी जाती है और वो है ‘लावणी’। गैर ड्रामा हिन्दी कविता में उन्नीसवीं सदी के उतरार्ध में ‘लावणी’ का बहुत प्रभाव देखा गया। हिन्दु-मुस्लिम दोनों कवियों ने कृष्ण और इस्लामिक विषयों पर ‘लावणी’ लिखी। मिसाल के तौर आशिक और माशूक के बीच इश्क और प्रेम। लखनऊ में उन्नीसवीं सदी में ‘लावणी’ लिखने वाले कई कवि थे। साफ ज़ाहिर है ‘लावणी’ कविता की परम्परा उत्तर भारत की लोक नाट्य परम्परा का एक हिस्सा बन गयी।

‘स्वांग’ में खेली गयी कहानियों खासकर ‘गोपीचंद’ और ‘पूरनमल’ में पंजाब के गुरु गोरखनाथ के अनुयायीयों यानि ‘नाथ योगियों’ का बहुत बड़ा योगदान रहा है। ‘नाथयोगी’ संसार का त्याग, जादूई, तांत्रिक और अघ्यात्म में विश्वास रखते थे। नाथयोगी, ‘नाथ’ योगी या जोगी के नाम से जाने जाते थे। ये लोग गोपीचंद को चौरासी सिद्दों में से एक सिद्ध मानते हैं। गांवों में नाथ योगी, ज़र्रा, हकीम, जादूगर और चमत्कारिक विद्या में निपुण जाने जाते थे। नाथ योगियों के तीर्थ स्थल बलूचिस्तान में हिंगलाज से गुजरात में घिनोघर, पंजाब में तिल्ला, महाराष्ट्र, नेपाल और बंगाल में पाये जाते हैं। नाथयोगी अक्सर भिखारी जाति से आते थे। बनारस में ये ‘भतृरी’, मेरठ में ‘गोगा’ गाने वालों के नाम से जाने जाते हैं। ‘स्वांग’ में ‘राजा गोपीचंद’, ‘गुरु गोगा’, ‘सिला दाई’, और ‘राजा नल’ गाये जाते हैं। इस तरह उत्तर भारत में धर्म निरपेक्ष थियेटर का विकास पंद्रहवीं सदी से शुरू हुआ माना जा सकता है।

नवाब वाजिदअली शाह थियेटर के बड़े शौकीन थे। वो खुद ‘रासलीला’ में हिस्सा लिया करते थे। उन्होंने एक नाटक ‘राधा कन्हैया का किस्सा’ भी लिखा था जिसे 1843 में हुज़़ूरबाग में खेला गया था। इसके अलावा उन्होंने शास्त्रीय नृत्य ‘कत्थक’ और अर्धशास्त्रीय संगीत ‘ठुमरी’ को बढ़ावा दिया। वाजिद अली के ज़माने में ही आगा हसन अमानत का पाश्चात्य ओपेरा पर आधारित नाटक ‘इंद्रसभा’ लखनऊ में खेला गया। ‘इंद्रसभा’ ने उत्तर भारत में लोक नाटक के नये आयाम कायम किये। इस नाटक में दोनों हिंदू-मुस्लिम कथानक, छंद और हिन्दी उर्दू भाषा दिखाई पड़ते हैं। इसमें कथा कथन, कविता, संगीत और नृत्य सभी मिल जाते हैं। इस तरह ‘इंद्रसभा’ एक हिंदू-मुस्लिम यानि धर्मनिरपेक्ष थियेटर की गर्वीली मिसाल बना। ‘इंद्रसभा’ के बाद से ‘स्वांग’ थियेटर में इस्लामिक प्रभाव भी नज़र आने लगा : स्टेज पर महलों के दरवाजे, पेंट किये हुए पर्दे, दरबारी माहौल मतलब नवाबी पहनावा, तुर्की टोपी और जेवर। उर्दू का चलन भी बढ़ा। ‘बेटा जी’ और ‘प्यारे जी’ जैसे संबोधनों की जगह ‘लख्ते जिगर’ और ‘जानेमन’ जैसे संबोधनों ने ले ली। ‘स्वांग’ में अब उर्दू कहानियां जैसे ‘सियाहपोश’, ‘बेनज़ीर’, ‘बदर-ए-मुनीर’ और ‘लैला मजनूं’ भी आ गयीं। ‘कत्थक’, ‘ठुमरी’ और ‘गज़ल’ भी लोक-मनोरंजन का हिस्सा बन गये। साथ ही लोक गीत - ‘होली’, ‘बसन्त’, ‘दादरा’, ‘सावन’ और ‘बिहाग’ भी ‘स्वांग’ में शामिल हो गये। हाथरस परम्परा में ये सब सबसे ज़्यादा देखने को मिलता है। अगर एक तरफ ‘स्वांग’ या ‘नौटंकी’ अपने विकास में धर्म-निरपेक्षता और लोक मनोरंजन के स्रोत बन रहे थे, तो दूसरी तरफ हिन्दू-मुस्लिम संस्कृति के संगमस्थल भी बन रहे थे, उर्दू हिन्दी दोनों भाषाओं को अपने में समा रहे थे, प्रादेशिक विधाओं से परस्पर प्रभावित हो रहे थे, तो दूसरी तरफ पारसी थियेटर की कुछ परम्पराओं को भी अपना रहे थे। हम जानते हैं पारसी थियेटर की शुरुआत अंगरेजों की देन है और ये यूरोपीय थियेटर से प्रभावित था। इसमें हिन्दी और उर्दू दोनों का इस्तेमाल होता था इसके अलावा प्रादेशिक भाषाओं गुजराती, बंगला और मराठी का भी इस्तेमाल किया जाता था। ‘राजा हरिश्श्चन्द्र’, ‘प्रहलाद’, ‘नल दमयंती’, ‘सावित्री’ और ‘शकुन्तला’ पारसी थियेटर में आम खेले जाते थे। इसी तरह ‘शीरी फरहाद’, ‘लैला मजनूं’, ‘बेनज़ीर’, ‘बद्र-ए-मुनीर’ और ‘गुल बकावली’ भी। जहां तक अंग्रेजी भाषा से थियेटर का सवाल है उनमें शेक्सपीयर सबसे प्रसिद्ध थे। कानपुर ‘नौटंकी’ परम्परा में पारसी थियेटर का सबसे ज़्यादा प्रभाव नज़र आता है।

इस तरह हम देखते हैं कि उत्तर भारत खासकर कानपुर, हाथरस और ब्रज की ‘नौटंकी’ या ‘स्वांग’ लोक मनोरंजन की ये धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक लोक नाट्य विधा विभिन्न आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक स्थितियों में अपने-अपने प्रदेश में जैसे राजस्थान में ‘ख्याल’, मध्य प्रदेश में ‘मंच’, बंगाल में ‘जात्रा’, महाराष्ट्र में ‘तमाशा’ और गुजरात में ‘मवाई’ का नाम लिये विभिन्न प्रभावों को आत्मसात करती हुई अपनी मौलिकता और प्रादेशिक पहचान बनाये हुए हैं और साझी विरासत की जीवन्त मिसाल है। साथ ही यह धर्मनिरपेक्ष और लोकाभिमुख मनोरंजन की विधा जन सांस्कृतिक उत्थान का स्रोत और संप्रेषण का माध्यम भी बनी हुई है। इस साझी विरासत को हमें महफूज़ ही नहीं रखना है बल्कि आगे भी बढ़ाना है।

डॉ. खुर्शीद अनवर
माँ और धरती माँ
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