संस्कृति
भारतीय नृत्य शैलियां

श्रुति चतुर्वेदी

भारत का प्रत्येक क्षेत्र सामाजिक, सांस्कृतिक, पारम्परिक, प्राकृतिक, भौगोलिक आदि पक्षों में भिन्न होने के बावजूद भी एक एकात्मकता रखता है। सच है हर क्षेत्र की अपनी अलग खासियत है व अलग समस्याएं हैं। हर क्षेत्र में तनाव है, विचारों में मतभेद हैं, एक-दूसरे के काम करने के तरीकों में मतभेद हैं। तनाव है सत्ता पक्ष की नीतियों और आम इंसान की ज़रूरतों में। स्वयं को श्रेष्ठ व दूसरे को नीचा दिखाना, विभिन्नताओं को स्वीकार करने के बजाय उन्हें बदलने अथवा अपने जैसा बनाने का प्रयास, यह रवैया हर क्षेत्रा में देखा जा सकता है। चाहे वह राजनीति हो, तकनीक हो, संस्कृति हो या कोई अन्य क्षेत्रा। इन तनावों से कला भी अछूती नहीं है। मतभेद इस बात पर कि कौन-सी कला श्रेष्ठ है गायन, वादन, नृत्य, या थियेटर। अब सवाल ये उठता है कि किसी भी कला के श्रेष्ठ होने का मापदण्ड क्या है? यह कौन तय करेगा कि एक प्रकार की कला दूसरे की तुलना में श्रेष्ठ है? यह विवाद कि शास्त्राीय कलाएं लोक कलाओं से श्रेष्ठ हैं, और लोक कलाऐं शास्त्राीय कलाओं के मुकाबले आम इंसान के जीवन के ज्यादा करीब हैं, देखा जाए तो यह सारे विवाद बेबुनियाद, खोखले और अनावश्यक हैं।

कोई भी कला चाहे वह जीवित हो या हमारे अतीत का हिस्सा दरअसल वह आम इंसानों के जीवन से ही उपजी है। वह उसके व्यवहार, संवेदना और जीवनयापन के तरीकों का ही प्रतिबिम्ब है।

जैसे-जैसे मनुष्य सभ्यता की ओर बढ़ा वैसे-वैसे इन कलाओं में भी परिपक्वता और निखार आया। तमाम कलाएं एक दूसरे पर निर्भर हैं, परस्पर संबद्ध है और एक दूसरे के बिना इसका पनपना और निखरना नामुमकिन है। हर तरह की कला समय व समाज के साथ बदलती है और स्वयं को उक्त परिवेश में ढाल लेती है। चाहे वह लोक कला हो या शास्त्रीय कला। कला कभी भी ठहरती नहीं है। कला अपने समय और युग का प्रतिबिंब और उसकी प्रतिनिधि होती है। यही कारण है चाहे वह आदि मानव हो या आधुनिक युग का इंसान, कलाएं उसके जीवन का केंद्र बिंदु रही हैं।

किसी भी कला को श्रेष्ठ घोषित करने में न सिर्फ इतिहास को बल्कि सामाजिक व राजनैतिक घटनाओं का भी ध्यान रखना चाहिए। देखा गया है कि समाज के उच्च वर्ग, मुख्यतः ब्राह्मण वर्ग और उनके सौंदर्य बोध ने नृत्य शैलियों को श्रेष्ठ होने का दर्जा दिया। यह मानकर चलना चाहिए कि समाज का उच्च वर्ग, जो कि सबसे ज़्यादा शिक्षित व संभ्रांत वर्ग होता है उनका सौंदर्यबोध आम लोगों से भिन्न होगा ही। इसके साथ-साथ इस कुलीन वर्ग का प्रभाव सत्ता पक्ष पर होने की वजह से कला का सामाजिक और राजनैतिक स्थान भी यही कुलीन वर्ग तय करता है। इसका साफ मतलब यह है कि जब हम किसी नृत्य शैली के स्वरूप और परंपरा की बात करते हैं तो हम उसके साथ जुड़ी सामाजिक तथा राजनीतिक व्यवस्था की भी बात करते हैं। हमारे समाज में ब्राह्मणवाद के आधार पर अपनी श्रेष्ठता तथा उत्कृष्टता सिद्ध करने के लिए, समाज के कुलीन और संभ्रांत वर्ग ने कला को भी अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने का माध्यम बनाया। आम इंसान की कला को उसके प्राकृतिक परिवेश से उठाकर एक ऐसे स्तर पर पहुंचाया जिसका स्वामित्व सिर्फ उच्चतम वर्ग के हाथों में हो। परिणाम-स्वरूप जिस कला में कलाकार व दर्शक में कोई अंतर नहीं था, जहां साझेपन की अनुभूति होती थी वहीं कलाकार और दर्शक में अंतर आया और कला को उपभोग की वस्तु के रूप में पेश किया जाने लगा। सामाजिक, ऐतिहासिक, पारम्परिक बदलाव की वजह से कला के रूपों को भी कई उतार-चढ़ाव झेलने पडे़।

आइये देखते हैं भारतीय नृत्य किस तरह हमारी साझी विरासत का हिस्सा है :

भारत की विभिन्न कलाएं, वेश-भूषा, खान-पान, भाषाएं, पर्व, त्योहार, सांस्कृतिक अभिव्यक्तियां व परम्पराएं हमारी साझी विरासत के कई पक्षों में से हैं। साझी विरासत के इन पक्षों का निर्माण इंसान ने अपने लिए और समाज को आपस में जोड़ने के लिए किया। यह सारे पक्ष हमारी आम दिनचर्या का हिस्सा हैं। साझी विरासत के इन रूपों को हम प्रतिदिन, प्रति पल जीते हैं। यह पक्ष हमें आपस में जोड़ते हैं। हमें तनाव और तनाव से फायदा उठाने वाले तत्वों का सामना करने की सामर्थ्य देते हैं। साझी विरासत का एक ऐसा ही पक्ष है नृत्य।

नृत्य व संगीत प्राचीन काल से इंसान के जीवन का अटूट हिस्सा रहा है। एक मान्यता के अनुसार शब्दों की ईजाद से पहले संकेत और मुद्राओं के माध्यम से इंसान ने अपने भाव जैसे प्रेम, वात्सल्य, क्रोध, भय, दया आदि की अभिव्यक्ति नृत्य, संगीत व चित्रों के ज़रिये की। यह कलाएं हमारे जीवन में इतना घुल मिल जाती हैं कि, हमें यह आभास भी नहीं होता कि हम साझी विरासत जी ही नहीं रहे हैं बल्कि इसे और विकसित कर रहे हैं। बदलते मौसम, त्यौहार हम आपस में मिलकर मनाते हैं। फसल काटना, सावन का आना, नई फसल बोना, इन सबका हमारे जीवन में महत्व है और हम इसकी अभिव्यक्ति संगीत, नृत्य, नाटक व अन्य कलाओं के माध्यम से करते हैं। हर इलाके की अपनी एक खास शैली होती है व अपना अलग पहनावा व खान-पान होता है। शादी-ब्याह, सगाई, जन्म आदि को संगीत, नाटक, नृत्य के माध्यम से सामूहिक रूप से मनाते हैं। नृत्य, समाज व इंसान का अभिन्न अंग है। इस कला में अपने शरीर के माध्यम से इंसान अपनी बात कहता है। लय, ताल व सुरों में पिरोकर वह अपनी बात अपने सम्पूर्ण शरीर के माध्यम से लोगों तक पहुंचता है। जहां एक ओर लोक नृत्य में सरलता व सहजता होती है वहीं शास्त्राीय नृत्यों में शैलीगत भाव भंगिमाओं का वर्चस्व होता है। लोक और शास्त्रीय नृत्य दोनों ही आम इंसान के जीवन काल की गाथा बताते हैं। लोक नृत्य परम्परा एवं शास्त्रीय नृत्य परम्परा न सिर्फ इतने सालों से जीवित है, बल्कि अपनी अंदरूनी शक्ति व सजीवता से कला को नए रूप देने में सक्षम है यानि कि लोक व शास्त्रीय कलाएं अलग-अलग नहीं हैं बल्कि आपस में संबंधित हैं। कोई ऐसा क्षेत्रा, वादी, समुद्री तट या ज़मीन नहीं है जिसका अपना लोक नृत्य और संगीत न हो। जैसे :

  • कश्मीर के वत्तल कबीले का दुमहल
  • पूरे उत्तर प्रदेश में रासलीला का मंचन किया जाता है।
  • उत्तरांचल के कुमाऊँ क्षेत्रा में बरसात के मौसम में धान, मडुवा आदि के गुड़ाई-निराई के दौरान हुड़का बौल गाया जाता है। हुड़का का अर्थ है डमरू। डमरू ही एक मात्रा वाद्य यंत्रा है जो कि इसके दौरान बजाया जाता है। किसान समूह में एक साथ गाते-बजाते हैं और ताल के साथ-साथ नाचते हैं।
  • कुमाऊँ का छोलिया नृत्य शादी के दौरान पुरुषों द्वारा तलवार और ढाल लेकर समूह में किया जाता है।
  • आन्ध्र प्रदेश के लम्बाडी कबीले का लम्बाडी नृत्य जो उनकी आम दिनचर्या का हिस्सा है।
  • तमिलनाडु के लोक नृत्य कुम्मी व कोलाट्म।
  • तमिलनाडु की ही एक और नृत्य शैली है करगम। इसमें कच्चे चावल से भरा मटका, जिसके इर्द-गिर्द बांस की पत्तियां होती हैं, को सरों पर संतुलित करते हुए नृत्य करना होता है।
  • कर्नाटक का डोलू कुनीथा, जिसमें आदमी बडे़ ढोलों की थाप पर नृत्य करते हैं।
  • गुजरात का गरबा जो नवरात्रों के दौरान मूलतः महिलाओं का नृत्य है। नवरात्रि को अम्बा देवी के सम्मान में महिलाएं तालियों की थाप पर घेरों में नृत्य करती हैं। यही नृत्य जब पुरुष करते हैं तो उसे गरबा कहा जाता है।
  • पंजाब का उर्जापूर्ण भांगड़ा जो कि बैसाखी त्योहार पर पुरुषों द्वारा नाचा जाता है।
  • पंजाब का लोकनृत्य गिद्दा महिलाओं की शैली है। इस शैली में महिलाएं समूहों में नृत्य करती हैं लेकिन अक्सर एक या दो महिलाएं बीच मेें आकर नृत्य करती हैं और अन्य तालियों की थाप देती हैं।
  • राजस्थान का डांडिया जो पुरुषों और महिलाओं द्वारा लंबी डंडियों के साथ-खेला जाता है।
  • मणिपुर का ढोल चोलम जिसमें पुरुष बड़े-बड़े ढोलों (मणिपुरी मृदंग या पुंग) के साथ-साथ घेरे में चक्कर लगाते हुए उछल-उछल कर नाट्य-नृत्य के करतब दिखाते हैं।
  • सैन्य अंदाज के हाव भाव पर आधारित छऊ नृत्य की तीन शैलियां सरायकेला (बिहार), पुरूलिया (पश्चिमी बंगाल) और मयूरभंज (उड़ीसा) में पनपी और पली बढ़ी। मुखौटों के विस्तृत और व्यापक इस्तेमाल के कारण छऊ नृत्य शैलियों को ‘छाया’, ‘बहरूप’ या फिर ‘शौर्य छवि’ के रूप में भी व्याख्यायित किया जा सकता है।
  • असम का बीहू नृत्य। बीहू उत्सव मध्य अप्रैल में फसल की कटाई के दौरान मनाया जाता है। इस उत्सव में बच्चे, बूढे़, गरीब, अमीर सभी उत्साह के साथ नृत्य करते हैं। ढोल और ‘पाइप’ (एक तरह की बासुरी) बजायी जाती है और मुख्यतः प्रेमगीत गाए जाते हैं। बीहू नृत्य आम तौर पर घेरे में या ‘पैरलल लाईन्स’ में किया जाता है।
  • कोडियट्टम केरल के चकयार समुदाय की नृत्य शैली है। कोडियट्टम प्राचीन संस्कृत नाट्य विद्या से निकली शैलियों की सबसे पुरानी शैली मानी जाती है। इसका रिश्ता नाट्यशास्त्रा से भी जुड़ता है क्योंकि इसमें भी ‘डबल रोल’, कहानी के अंदर कहानी, और चेहरे और शरीर की मुद्राएं नाट्यशास्त्रा की तर्ज़ पर ही होती हैं।

नृत्य कलाओं को सामाजिक व सांस्कृतिक विकास के अनुसार तीन वर्गों में बांटा जा सकता है; आदिवासी, लोक, पारम्परिक नृत्य। मूलतः यह कलाएं सरल होती हैं व आम दिनचर्या के इर्द-गिर्द घूमती हैं। पुरुष, महिलाएं व बच्चे सामूहिक नृत्य के माध्यम से हर पर्व व मौसम को हर्ष और उल्लास के साथ मनाते हैं। यहां कलाकार और दर्शक में कोई अंतर नही होता, सब इसका हिस्सा होते हैं, सहभागी और सृजनकर्ता होते हैं। कश्मीर, हिमाचल, उत्तर प्रदेश या फिर पूर्व और उत्तर पूर्व के पहाड़ी क्षेत्रों के संगीत, तान, लय, वाद्य और नृत्य में असाधारण समानता दिखाई देती है। यहां तक कि मुद्राओं और नृत्य में शरीर के विभिन्न अंगों के इस्तेमाल में भी समानता नज़र आती है। यही साझी विरासत है।

हिमालय के उतार-चढ़ाव, चोटियां और घाटियां, लहराते नज़र आते शिखरों से मेल खाती नृत्य मुद्राएं इन क्षेत्रों की विशेषता हैं। फैलती बाहें पैरों और घुटनों की लचक से लेकर कमर और गर्दन से जुड़ी मुद्राएं यही सब कुछ दर्शाती हैं। पूर्वी क्षेत्रों, विशेषकर असम और उसके आस-पास के नृत्यों की मुद्राओं की अपनी अलग विशेषता है। एक खास लय में चल रहे नृत्य में अचानक शारीरिक मुद्राओं का जल्दी-जल्दी बदलना उस क्षेत्रा की जलवायु, अचानक आने वाले तूफ़ानों और उससे जुड़े बिखराव का प्रतीक है। जंगलों की अनजान वादियों के रहस्य की झलक, नागालैण्ड के नागाओं और मेघालय क्षेत्रा के नृत्यों में देखने को मिलती है। यहां के नृत्य काफी सघन रूप से नृत्य शैली के एक-एक आयाम प्रस्तुत करते हैं। सौराष्ट्र के मछुआरों के नृत्यों की सारी मुद्राएं समुद्र की लहरों से प्रेरित होती हैं जबकि मैदानी क्षेत्रों के लोकनृत्य लय और रंगों से कुछ अलग ही अंदाज़ पेश करते हैं।

आखिर में एक बात ज़ोर देकर कहनी है: कला में हर दायरे को पार करने की क्षमता है। हमें अनावश्यक विवादों में उलझने की अपेक्षा समानताओं को महत्व देना चाहिये। हमें इन समानताओं के साथ-साथ उन पक्षों और कलाओं को भी सम्मान देना है जो हमारी परंपराओं से भिन्न हैं। विभिन्न कलाएं और उनसे जुड़ी विधाएं हमारी साझी विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। समाज को तोड़ने वाले तत्वों के विरुद्ध यह कलाएं एक सशक्त अस्त्र हैं जो सीमाओं के परे भी हमें जोड़ती हैं और पहले से मौजूद हमारे समाजी रिश्तों को मज़बूती प्रदान करती हैं और तनाव को दूर करती हैं। हमें इन कलाओं को महफूज़ ही नहीं रखना है बल्कि इनको और भी विकसित करना है। तभी हम साझी विरासत को आगे बढ़ा पायेंगे। देश के अंदर ही नहीं बल्कि सीमाओं के परे भी।

डॉ. खुर्शीद अनवर
माँ और धरती माँ
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