सांप्रदायिकता
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

पृष्ठभूमि
सर्वप्रथम हम भारत में सांप्रदायिक समस्या की उत्पत्ति की संक्षिप्त रूपरेखा देना चाहेंगे। यह औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था की देन है। 1857 के विद्रोह की असफलता के फलस्वरूप सामंती ढांचा औपनिवेशिक ढांचे द्वारा प्रस्थापित कर दिया गया। औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे विकसित हो रही थी, जिसमें नौकरियों तथा अन्य कामों के अवसर सीमित थे।

प्रारंभ में औपनिवेशिक नीतियों ने व्यापारियों-साहुकारों (जो कि ज़्यादातर हिंदू थे) के विकास और आर्थिक प्रभुत्व को जन्म दिया। हिंदू लोग आधुनिक शिक्षा अपनाये जाने के कारण नौकरशाही में जगहों का अधिकतम लाभ ले सके। 1857 के पश्चात ब्रिटिशों के मुस्लिम विरोधी रवैये से हिंदुओं को थोड़ा लाभ मिला, और उन्होंने बड़ी उत्सुकता से आधुनिक व्यवसायों को अपनाया।

सर सैय्यद अहमद ने इस चीज़ को पहचाना और मुसलमानों को बड़े पैमाने पर आधुनिक शिक्षा ग्रहण करने की सलाह दी। नौकरियों में मुसलमानों के पिछड़ेपन को दूर करने के लिये उन्होंने ‘ब्रिटिशों के प्रति राजभक्ति’ की छवि को प्रचारित किया। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना की प्रतिक्रिया के रूप में सांप्रदायिक राजनीति की शुरुआत हुई। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस उभर रहे नवजात उद्योगपतियों, नौकरशाहों तथा अन्य नए क्षेत्रों के हितों का प्रतिनिधित्व करता था। यह वर्ग अंग्रेजों द्वारा भारत में उनकी लूटमार को जारी रखने के लिये औद्योगिक तथा व्यापारिक गतिविधियों को छूट देने की नीति के कारण आये हुए सामाजिक बदलाव के चलते अस्तित्व में आया। हिंदू तथा मुस्लिम दोनों संप्रदायों के कुलीन तबकों, ज़मींदारों तथा अस्त हो रहे दूसरे तबकों ने इस प्रवाह का समर्थन नहीं किया। इन दोनों संप्रदायों के लोगों ने कांग्रेस की धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की अवधारणा का विरोध किया और सांप्रदायिक हिंदू एवं मुस्लिम राष्ट्रवाद का समर्थन किया। सर सैय्यद अहमद उभर रहे उद्योगपतियों तथा नौकरशाहों के गुट की विरोधात्मक गतिविधियों से चौकन्ने हो गये तथा उन्होंने अपने आप को इससे अलग रखा। इसके बजाय वे मुसलमानों में जागीरदारों, सामंती तत्वों को संगठित करने लगे तथा अपने अनुयायियों के साथ यह प्रचार करने लगे कि कांग्रेस हिंदुओं तथा ‘निचले’ वर्ग के लोगों के हित के लिये बनी है। कांग्रेस द्वारा प्रतिनिधित्व की मांग किये जाने के विपरीत इनका कहना था कि अंग्रेज लोग खुद कुलीन वर्ग से प्रतिनिधि चुनें और भारत में मुसलमानों के हितों के सर्वश्रेष्ठ संरक्षक अंग्रेज लोग ही हैं। आगे चलकर उनके इन प्रयासों की परिणति मुस्लिम लीग के निर्माण में हुई जो कि मुस्लिम ज़मींदारों और रियासतों के नवाबों के हित में खड़ी हुई।

1870 से ही, हिंदू ज़मींदारों, साहूकारों तथा मध्यम वर्गीय व्यावसायिकों के एक तबके के बीच मुस्लिम विरोधी भावनाएं पैदा होने लगीं जो साथ ही साथ कांग्रेस के धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के मकसद का विरोध भी करते थे। वे मुस्लिम शासकों के निरंकुश शासन की बात करते और उससे मुक्ति दिलाने में अंग्रेजों की भूमिका की सराहना करते थे। आर्य समाज के नेता पंडित लेखराम ने तो इस्लाम की हर तरह से निंदा की और उन्होंने मांग की कि मुसलमानों को भारत से निकाल बाहर किया जाय अथवा उनका आर्य धर्म में धर्मांतरण किया जाय। लाला हरदयाल ने भी हिंदू संगठनों को पुनर्जीवित करने का ज़ोरदार प्रयास किया। उन्होंने यह प्रचार किया कि हिंदू जाति का भविष्य हिंदू संगठन, हिंदू शासन, शुद्धीकरण (यानी पुनर्धर्मांतरण) तथा सीमांत प्रांतों को जीतने पर निर्भर है। हिंदू पुनरुज्जीवनवाद को एक गति मिल गयी।

उन्होंने 1909 में ‘पंजाब हिंदू सभा’ की स्थापना की, जो कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रति आक्रामक थी। उनके अनुसार एक राष्ट्र की स्थापना के लिये कांग्रेस द्वारा विभिन्न धर्म के लोगों में एकता लाने का मतलब है मुसलमानों को संतुष्ट करने के लिये हिंदू हितों की बलि चढ़ाना। उनके अनुसार कोई भी हिंदू पहले हिंदू है बाद में भारतीय। इस तरह के प्रयासों ने आगे चलकर हिंदू महासभा, रा.स्व.संघ और मुस्लिम लीग की नींव डाली। हालांकि ये निर्माण एक-दूसरे के काफी विपरीत लगते थे, लेकिन उनमंे काफी कुछ समानतायें थीं। वे लोग धर्मनिरपेक्ष भारत की अवधारणा का विरोध करते थे, दोनों ही धर्म पर आधारित राज्य का समर्थन करते थे, उन्होंने अंग्रेजी शासन का विरोध नहीं किया, वे अंग्रेज विरोधी संघर्षों में शामिल नहीं थे, उन्होंने भूमि सुधार का विरोध किया, वे कांग्रेस की नीतियों के घोर विरोधी थे, वे (अलग-अलग रूप में) ‘दो राष्ट्र के सिद्धांत’ में यकीन रखते थे, एक-दूसरे संप्रदायों के प्रति नफ़रत की भावना पर उन्होंने अपने आधार को मजबूत किया, उनके अनुयायी ज़मींदार तथा पारंपरिक व्यापारी वर्ग के थे। दोनों पक्षों के ‘दो राष्ट्र के सिद्धांत’ एक-दूसरे के विपरीत थे। मुस्लिम लीग का यह कहना था कि चूंकि मुसलमान एक अलग राष्ट्र हैं इसलिये उनके लिये एक अलग देश बना कर दिया जाए। हिंदू महासभा और रा.स्व.संघ का मानना था कि यह भूमि हिंदुओं की है और शेष धर्म यहां के मूल धर्म नहीं हैं इसलिये अन्य धर्म के अनुयायियों को हिंदुओं का मातहत बन कर रहना होगा।

मुस्लिम लीग अमीर मुसलमानों के लिये ज़्यादा से ज़्यादा लाभ हासिल कर लेना चाहती थी। उनका मुख्य कथन यह था कि मुसलमानों की आबादी 25 प्रतिशत है, लेकिन किसी भी विधेयक को पारित करने के लिये दो तिहाई बहुमत आवश्यक है मुसलमानों को विधान मंडल में 1/3 प्रतिनिधित्व मिलना चाहिये ताकि वे मुस्लिम विरोधी विधेयक को पारित होने से रोक सकें। कांग्रेस ने उनकी इस मांग को ठुकरा दिया। जिन्ना मुस्लिम लीग के एक प्रमुख नेता के रूप में उभरे। दो राष्ट्र का सिद्धांत मुस्लिम संप्रदायवादी (चौधरी रहमत अली, मुस्लिम लीग) और हिंदू संप्रदायवादी (हिंदू महासभा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) द्वारा एक साथ स्वीकार कर लिया गया। इस तरह कांग्रेस के जन्म के साथ-साथ दो विभिन्न, लेकिन कुछ मामलों में एक जैसी विचारधाराओं का उद्गम हुआ, जो कांग्रेस की धर्मनिरपेक्ष नीतियों का विरोध करती थीं। सर सैय्यद अहमद द्वारा 1887 में शुरू किया गया अभियान इसका पहला प्रवाह था और हिंदू पुनर्जागरण इसका दूसरा प्रवाह था।

ब्रिटिश शासकों ने हिंदू और मुसलमानों के इन कुलीन तबकों के मतभेदों को पहचाना और उन्होंने ‘बांटो और राज्य करो’ की नीति अख़्तियार कर ली। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के गठन और उसकी मांगों से अंग्रेज खुश नहीं थे। ऐसे मौके पर सर सैय्यद अहमद का इन मांगों से विरोध इनके लिये बहुत काम का था और उन्होंने सर सैय्यद अहमद और उनके कुलीन अनुयायियों को उनकी ‘सांप्रदायिक मांगों’ के लिये और भी प्रोत्साहित किया। अंग्रेज अपनी चाल में कामयाब रहे और हिंदू-मुस्लिम मतभेद का लाभ उठाते हुए उन्होंने कई बार भा.रा.कांग्रेस को नीचा दिखाने का प्रयास किया। उन्होंने मुुसलमानों के प्रतिनिधि के रूप में मुस्लिम नवाबों और जागीरदारों के एक गुट (शिमला प्रतिनिधि मंडल) को मान्यता दे दी और साथ ही साथ हिंदू महासभा और रा.स्व.संघ को प्रोत्साहित किया जिनके ज़्यादातर अनुयायी हिंदू ज़मींदार, रियासतों के राजा, ब्राह्मण और बनिया थे।

उद्गम, विकास और शाखायें
हिंदुत्व आंदोलन को समझने के लिये सावरकर की भूमिका को समझना बहुत ज़रूरी है। एक क्रांतिकारी (अंग्रेजों के ख़िलाफ़ संघर्ष) के रूप में सावरकर की भूमिका केवल उनकी गिरफ़्तारी और अंदमान जेल से छूटने तक ही बनी रही। उसके बाद के काल में उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध कोई भी काम नहीं किया। 1920 के प्रारंभिक दशक में उनकी भूमिका बदल गयी और वे अंग्रेज विरोधी राजनीति से अलग हट गये। बीस के दशक के प्रारंभ में ‘कांगेस-खि़लाफ़त’ गठबंधन की असफलता, गांधीजी द्वारा असहयोग आंदोलन को एकतरफा पीछे ले लेना, और दंगों की लहर ने पूरे वातावरण को सांप्रदायिक बना दिया। यह वह समय था जब आर्य समाजियों का ‘शुद्धीकरण’ अभियान, मुस्लिम सांप्रदायिकों का तबलीग (प्रचार) और तंजीम (संगठन) बहुत ज़ोरों पर था।

महाराष्ट्र एक ऐसा क्षेत्र था जो तुलनात्मक दृष्टि से मुगलों द्वारा कम प्रभावित रहा, लेकिन यह भाग पिछड़ी जातियों द्वारा शक्तिशाली ब्राह्मण विरोधी आंदोलन का गवाह रहा है। यही वह जगह थी जहां पर ब्राह्मणों ने यह महसूस किया कि निचली जातियों पर से उनका वर्चस्व कम होता जा रहा है और अब वे उनकी मातहत वाली भूमिका पर अधिक भरोसा नहीं कर सकते। यही वह पृष्ठभूमि रही है जिसमें गांधीजी के नेतृत्व से निराश उच्च जाति के ब्राह्मणों ने हिंदू बहुलवादी (ब्राह्मणीय) राजनैतिक परिदृश्य में केवल उच्चवर्णीय पुरुषों के लिये अधिनायकतंत्रवादी (एक चालक अनुवर्तित) संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की बुनियाद रखी।

रा.स्व.संघ कभी भी बहुत चर्चा में नहीं रहा क्योंकि इसका ज़्यादातर कार्य नौजवानों को प्रशिक्षित करना और उन्हें जीवनभर के लिये समर्पित कार्यकर्ता बनाने का काम काफी गुपचुप तरीके से चल रहा था। रा.स्व.संघ का नाम पहली बार चर्चा में तब उभरा जब उसके इसके एक पूर्व प्रचारक नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी की हत्या कर दी। आगे चलकर संघ परिवार द्वारा बाबरी मस्जिद ढहाये जाने के बाद हर किसी को इस बात का एहसास हुआ कि भाजपा (भारतीय जनता पार्टी), विहिप (विश्व हिंदू परिषद), अभाविप (अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद) अथवा बजरंग दल जैसे संगठन हिंदुत्व आंदोलन के शीर्ष दल नहीं हैं, बल्कि रा.स्व.संघ है जो अपने संगठन के द्वारा हिंदुत्व आंदोलन के एजेंडा के विभिन्न घटकों का संचालन और नियंत्रण करता है। खुद रा.स्व.संघ के बारे में कोई ज़्यादा सामग्री उपलब्ध नहीं है क्योंकि वे सीधे प्रशिक्षित करने में अधिक विश्वास रखते हैं बजाय वाद-विवाद और संवाद की संस्कृति को बढ़ावा देने के, इसलिये इसके लिये विस्तृत सैद्धांतिक और दार्शनिक सामग्री का विवरण आवश्यक नहीं होता है। हालांकि मज़बूत शिकंजा लिये रा.स्व.संघ का विस्तार 25000 शाखाओं तथा 30 लाख सदस्यों तक हुआ है लेकिन इसकी तुलना में सैद्धांतिक सामग्री उपलब्ध नहीं है।

रा.स्व.संघ के संस्थापकों ने असहयोग आंदोलन को राष्ट्रवाद के उत्साह को ठंडा करने और विभिन्न समुदायों (हिंदू-मुस्लिम, ब्राह्मण-गैर ब्राह्मण) के बीच तनाव बढ़ने के एक कारण के रूप में महसूस किया। मुसलमानों द्वारा असहयोग आंदोलन में शामिल होने को एक अपशकुन के रूप में देखा गया। इस आंदोलन के परिणाम स्वरूप बहुत सी हिंसा और विद्रोह, सांप्रदायिक टकराव, किसान विद्रोह का उभार इत्यादि घटनायें हुईं। इन तमाम घटनाओं को हिंदुत्व की नज़र से देखा गया, और तब हिंदुत्व संप्रदायवादियों को हिंदू राष्ट्र के लक्ष्य की पूर्ति के लिये एक अलग संगठन की आवश्यकता महसूस हुई। इस संगठन का निर्माण इस समझ पर हुआ कि केवल हिंदू ही हिंदुस्तान को आज़ाद करा सकते हैं, कि केवल हिंदू-शक्ति ही देश का नेतृत्व कर सकती है और इसलिये व्यक्तिगत चारित्रय और मातृभूमि के प्रति संपूर्ण भक्ति के आधार पर हिंदू युवकों को संगठित करना चाहिये। इसी पृष्ठभूमि में हेडगेवार ने कुछ अन्य उच्चवर्णीय ब्राह्मणों के साथ मिलकर 1925 में रा.स्व.संघ की स्थापना की। शुरू-शुरू में उसकी खासियत थी (क) शारीरिक प्रशिक्षण पर ज़ोर देना-इस समझ पर कि अब ऊंची जातिवालों को भी लड़ाई के गुर सिखना चाहिये क्योंकि मोहल्लों की लड़ाई में अब निचली जातियों पर भरोसा नहीं किया जा सकता। (ख) भगवा झंडा और मातृभूमि गुणगान जैसे धार्मिक प्रतीकों का मिश्रण (ग) ब्राह्मणों, बनिया और ऊंची जातिवालों के हित में अपील जो कि प्रसंगवश बहुत बड़ी संख्या में संघ के अंग थे और कमोबेश हैं भी। (घ) नौजवान ‘लड़कों’ को मिथकपूर्ण इतिहास, मुस्लिम विरोधी, धर्मनिरपेक्षता विरोधी, कट्टर उच्च वर्णीय विचारों द्वारा शिक्षित किये जाने पर बल। ये व्यापक कार्यक्रम शाखाओं में शुरू किये गये। ‘राष्ट्र’ के साथ हिंदुओं की पहचान पर बल देने के लिये संगठन के नाम के पहले ‘राष्ट्रीय’ शब्द जानबूझकर लगाया गया। भूमिगत क्रांतिकारियों के तौर तरीकों के विपरीत रा.स्व.संघ वाले शारीरिक प्रशिक्षण पर ही ज़ोर देते थे जिसका उपयोग महज़ मोहल्लों की लड़ाई में था, अंग्रेज शासकों के खि़लाफ़ नहीं। इन की शिक्षायें, मुख्य रूप से हिंदू देवताओं, हिंदू राजाओं के विगत गौरव, मुस्लिम शासकों के अत्याचारों, गांधीवादी तरीकों की व्यर्थता और संगठन के अभाव में हिंदुओं को होनेवाली तक़लीफ़ों पर केंद्रित थीं।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इतिहासकारों का कहना है कि श्री हेडगेवार ने सबसे पहले स्वतंत्रता का आहवान किया। 1929 में लाहौर अधिवेशन में कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव पारित किया और सभी को 26 जनवरी का दिन स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाने का आहवान किया। इसके जवाब में संघ ने अपनी शाखाओं को यह सर्कुलर भेजा कि अब कांग्रेस ने भी स्वतंत्रता के ‘हमारे’ लक्ष्य को अपनाया है और हमें इस दिन (26 जनवरी 1930) को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाना चाहिये। सभी शाखाओं ने इस दिवस को मनाया लेकिन एक फर्क था, वह यह कि उन्होंने भगवा झंडा फहराया, और वही केवल एक साल था जब उन्होंने इस दिवस को मनाया।

इधर संघ ने संगठन का प्रारूप तानाशाही कर दिया, प्रमुख सरसंघचालक को जीवन भर के लिये सर्वोच्च पद पर नियुक्त किया गया और उन्हें अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करने का अधिकार दे दिया गया। मौजूदा प्रमुख (श्री राजेन्द्र सिंह) इसकी चौथी कड़ी हैं और अब तक के एक मात्र गैर-ब्राह्मण। हेडगेवार ने महिलाओं को इस संगठन का सदस्य बनाने की याचना को ठुकरा दिया, इसके बदले में उन्होंने याचिका लक्ष्मीबाई केलकर को राष्ट्र सेविका समिति (1936) गठन करने का सुझाव दिया। रा.स्व.संघ का विस्तार धीरे-धीरे हुआ, शुरुआत में नागपुर क्षेत्र में सांप्रदायिक दंगे में उसकी ‘सफल भूमिका’ को भुनाते हुए और बाद में सावरकर की प्रारंभिक क्रांतिकारी छवि का लाभ उठाते हुए। उसके बाद शैक्षणिक संस्थाओं में उसके लोगों की घुसपैठ जारी रही। शुरू में रा.स्व.संघ के कुछ लोग भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य थे लेकिन 1934 में उनकी सदस्यता समाप्त कर दी गयी। संघ ने अपने आप को सभी ब्रिटिश विरोधी संघर्षों से अलग-थलग रखा लेकिन वे हिंदू-मुस्लिम दंगों और दंगा प्रभावित लोगों के पुनर्वास कार्यों में काफी सक्रिय रूप से नज़र आते थे। गांधी और नेहरू जैसे नेताओं को प्रभावित करने का उनका प्रयास विफल रहा। गांधीजी ने संघ को ‘सर्वसत्तात्मक दृष्टिकोण वाला एक सांप्रदायिक संगठन’ करार दिया। हिंदू-मुस्लिम संबंधों के प्रत्येक तनाव को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भुनाया, लोगों को भर्ती करने के लिये संघ ने (विश्वविद्यालयों के) विद्यार्थियों, दुकानदारों और मध्यमवर्गीय बाबूओं के बीच में अपना प्रारंभिक ध्यान केंद्रित किया।

1940 में एम.एस.गोलवलकर (गुरुजी) हेगडेवार के उत्तराधिकारी बने। उन्होंने क्षेत्रीय राष्ट्रवाद की तुलना में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के विचार को विकसित करने का प्रयास किया। उन्होंने दो किताबें लिखीं, ‘We or Our Nationhood Defined’ (विचार-नवनीत)। ये दोनों किताबें जर्मन नाज़ियों के फासीवाद से काफी प्रभावित थीं और उनकी अधिकांश अवधारणाओं की प्रशंसक थीं। उन्होंने प्रजातीय अभिमान, दूसरे लोगों (इस मामले में गैर-हिंदू) के साथ निबटने के लिये क्रूर पद्धतियों का इस्तेमाल करना, हिंदू प्रजाति और हिंदू राष्ट्र गौरव का उपदेश देना, दूसरे लोगों को हिंदुओं का मातहत बनाकर रहना, उनके विशेषाधिकारों और नागरिक अधिकारों को खत्म करना जैसी बातों का समर्थन किया। उनके अनुसार मुस्लिम यह सोचते हैं कि वे यहां पर जीतने और राज करने आये हैं। वे ‘ब्रिटिश विरोधी राष्ट्रवाद’ के घोर आलोचक थे। वे इसे महज़ क्षेत्रीय राष्ट्रवाद कहकर इसकी निंदा करते थे, क्योंकि यह उनके सच्चे हिंदू राष्ट्रतत्व के प्रेरक तत्व से उन्हें वंचित करता था और स्वतंत्रता संघर्ष को वास्तविक ब्रिटिश विरोधी संघर्ष बना रहा था। उनके अनुसार ब्रिटिश विरोधी संघर्ष को देशभक्ति और राष्ट्रवाद के साथ जोड़ने से स्वतंत्रता आंदोलन की पूरी प्रक्रिया पर विपरीत असर पड़ रहा था। रा.स्व.संघ ने सिविल नाफरमानी (1940-1941), भारत छोड़ो आंदोलन (1942), आज़ाद हिंद फौज, भारतीय नौसेना मुकदमा और बम्बई नौसेना विद्रोह (1945-1946) के समय अपने आपको अलग रखा। यह कभी भी युद्धकालीन अंग्रेजी दमन का लक्ष्य नहीं रहा क्योंकि इसने कभी भी सरकार का विरोध नहीं किया।

विभाजन के साथ मिली आज़ादी और उसके साथ-साथ हुए दंगों के समय अफवाहें फैलाने में संघ ने मुख्य भूमिका निभाई जिससे हिंसा की आग और भी भड़क उठी और तब पाकिस्तान से आये हुए हिंदू शरणार्थियों के पुनर्वास के कामों मे वे बहुत सक्रिय रहे। महात्मा गांधी की हत्या से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के उत्थान में एक मोड़ आ गया। कुछ समय के लिये राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर बंदी लगा दी गयी और बाद में इस शर्त पर पाबंदी हटाई गयी कि रा.स्व.संघ एक लिखित संविधान के तहत काम करेगा और बच्चों को रा.स्व.संघ में शामिल करने के पहले उनके माता-पिता की सहमति हासिल करेगा। पाबंदी के समय जेल से गोलवलकर ने सरकार को पत्र लिख कर कम्युनिस्टों का मुकाबला करने के लिये सरकारी सेनाओं के साथ संघ के सहयोग की पेशकश की। पाबंदी उठाये जाने के बाद रा.स्व.संघ बहुत गिरी हालत में हो गया और उसे फिर से सक्रिय होने में कुछ समय लगा। अपने नये रूप में संघ ने कई शीर्ष संगठन शुरू किये। और अब संघ संस्कृति में प्रशिक्षित कई स्वयंसेवक सामाजिक जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में, राज्य प्रशासन तंत्र की शाखाओं, सेना, नौकरशाही, शिक्षा, प्रसार माध्यम इत्यादि में अपनी घुसपैठ करने लगे।

संघ का केंद्रीय प्रशिक्षण उसकी शाखाओं में होता है जो उसकी गतिविधियों की मुख्य इकाई है। आमतौर पर यह खुले मैदान में होता है जहां पर भगवा झंडा फहराता है, जिसमें छोटी उम्र के बच्चे शामिल होते हैं। यहां उन्हें पारंपरिक खेल खेलने का अवसर मिलता है और आगे चलकर उन्हें सड़क-लड़ाई (लाठी चलाना इत्यादि) सिखाया जाता है। सप्ताह में एक बार उनका ‘बौद्धिक’ होता है जहां पर ‘बिना-संवाद’, ‘बिना-बहस’ वाली एकतरफा शिक्षा दी जाती है। संघ परिवार के सिद्धांतों, विचारों को बच्चों और नौजवानों के दिमाग में कूट-कूट कर भरा जाता है। उनके मुख्य सिद्धांत के मुताबिक हिंदू और केवल हिंदू ही भारतीय राष्ट्र का निर्माण कर सकते हैं, क्योंकि वही लोग इस महान भूमि के मूल निवासी हैं। हिंदुओं ने ही इस समाज और इस संस्कृति का निर्माण किया है। हिंदूवाद ही शेष सभी आस्थाओं से श्रेष्ठ है क्योंकि यह सहिष्णु है। दुर्भाग्य से इस सहिष्णुता को कमज़ोरी और नाकारापन समझा गया है, उदाहरणतः मुसलमानों और ईसाई अंग्रेजों ने इस हिंदू राष्ट्र को बार-बार जीता है। इन विदेशी संस्कृतियों के खतरे से निबटने के लिये हिंदुओं को एक संगठन (रा.स्व.संघ) की ज़रूरत है। विभिन्न धर्मों के प्रवेश ने यह ग़लतफ़हमी पैदा कर दी है कि भारत विभिन्न धर्मों और संस्कृतियों का देश है। विदेशी सिद्धांतों वाली व्यवस्था की गुलामी पसंद करने वाले नेहरू जैसे लोगों ने छद्म धर्मनिरपेक्षता वाले संविधान में मिली-जुली संस्कृति की अवधारणा डाल दी है। केवल एक ‘सच्चा धर्मनिरपेक्ष’ हिंदू राष्ट्र ही हिंदुओं के अधिकारों के साथ न्याय कर सकता है और अल्पसंख्यकों को सुरक्षा दे सकता है।

 

संघ में नियमित शाखा के साथ-साथ वार्षिक और समय-समय पर प्रशिक्षण शिविर भी चलते रहते हैं। इसकी अवधि हफ्तों से लेकर महीनों तक की होती है जो पाठ्यक्रम की अवधि और उसके अंतराल पर निर्भर होती है। यहां से प्रशिक्षित ‘लड़कों’ को स्नातक (Graduate), स्नातकोत्तर (Post-Graduate) और डॉक्टर (Doctorate) कहा जाता है। हर शाखा का एक शाखा-प्रमुख होता है। इनका पद क्रम शाखा प्रमुख से प्रचारक, प्रचारक से सर्वोच्च अधिनायक, सर्वोच्च अधिनायक से सरसंघचालक होता है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से निकला हुआ दूसरा शीर्ष संगठन था जनसंघ। यह राजनैतिक संगठन था, जो आगे चलकर जनता पार्टी में विलीन हो गया और बाद में दोहरी सदस्यता (यानी जनता पार्टी और रा.स्व.संघ) के मुद्दे पर जनता पार्टी से फिर अलग हो गया। इसका नया नाम रखा गया भारतीय जनता पार्टी। मध्यमवर्ग के एक तबके तथा उच्चवर्गीय लोगों के समर्थन से जिसकी ताकत बहुत बढ़ गयी है।

प्रथम सहयोगी, मातहत संगठन राष्ट्र सेविका समिति का गठन 1936 में हुआ। यह प्राथमिक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ‘धर्मपत्नी’ का प्रारूप था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की मज़दूर शाखा भारतीय मज़दूर संघ थी जिसकी स्थापना मज़दूरों के बीच कम्युनिस्टों के बढ़ते प्रभाव तथा उनकी जुझारू प्रवृत्ति का मुकाबला करने के लिये हुई। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विद्यार्थी शाखा थी। यह शिक्षकों, व्यवस्थापकों और विद्यार्थियों के बीच पारिवारिक रिश्तों की भावना पर कार्य करती है। नये कार्यकता भर्ती करने के लिये तथा विद्यालयों में आमूल परिवर्तनवाद का विरोध करने के लिये यह उनका मुख्य माध्यम है।

उसी तरह रा.स्व.संघ ने शिशु मंदिरों की स्थापना को भी प्रोत्साहित किया। इन मंदिरों में छोटे-छोटे बच्चों के दिमाग में भारतीय देवी-देवताओं और नायकों की गाथाओं के बारे में जानकारी की तगड़ी खुराक डाली जाती है। इसके अलावा और भी कई क्षेत्र हैं जैसे वनवासी कल्याण केंद्र जो कि आदिवासियों में हिंदू संस्कारों की शिक्षा फैला रहे हैं। इन दिनों इसका मुख्य उद्देश्य है उन आदिवासियों को जो ईसाई या मुसलमान बन चुके हैं, उनका पुनर्धर्मांतरण करके उन्हें फिर से उनके ‘अपने’ घर्म यानी हिंदू धर्म में लाना। सांप्रदायिकता के विस्तारीकरण में संलग्न शीर्ष संगठनों में से विश्व हिंदू परिषद भी एक है। इसका गठन हिंदू समाज को संगठित और मजबूत करने, हिंदुत्व का प्रचार करने, तथा विभिन्न देशों में रह रहे हिंदूओं से संबंध प्रस्थापित करने के लिये किया गया। इसने गैर निवासी भारतीयों और साधुओं के विभिन्न पंथों के बीच आधार बनाया है।

भारत-चीन युद्ध ने इनको मुख्यधारा में वापस आने का अवसर दिया और 1965 के भारत-पाक युद्ध ने इनके आत्मविश्वास को और भी बढ़ाया क्योंकि इन दोनों युद्धों के समय इन्हें अपनी ‘राष्ट्रीयता’ और ‘देशभक्ति’ के प्रदर्शन का मौका मिला। यह जानना दिलचस्प रहेगा कि इस दौर में रा.स्व.संघ का मुख्य लक्ष्य था कम्युनिस्टों का विरोध। गोलवलकर ने अमरीका के राष्ट्रपति जानसन को पत्र लिखकर उनकी वियतनाम नीति (हर तरह के हथियारों का इस्तेमाल करने) का समर्थन किया। यह ऐसा समय था जब वियतनाम नीति पर अमरीका काफी अकेला पड़ गया था, यहां तक कि खुद अमरीका में भी विरोध के स्वर उठने लगे थे। लेकिन गोलवलकर के अनुसार इस मामले में अमरीका ‘धर्म’ का नेतृत्व कर रहा था। पाबंदी उठाये जाने के बाद रा.स्व.संघ ने गो हत्या बंदी के मुद्दे पर आंदोलन किया। इसके साथ-साथ ‘विचार प्रसार’ की दिशा में काम किया जिसके लिये उन्होने अंग्रेजी में ‘ऑर्गनाइज़र’ तथा हिन्दी में ‘पांचजन्य’ नियतकालिक शुरू किया और इसके बाद प्रचलित धारणाओं और समझ में दुष्प्रचार करने के लिये कई अख़बार-पत्रिकायें शुरू की गयीं और एक समाचार एजेंसी ‘हिंदुस्तान समाचार’ शुरू की गयी।

रा.स्व.संघ की ‘सामाजिक पुनःस्थापना’ तब हुई जब 1974-75 में उन्होंने जेपी आंदोलन में हिस्सा लिया। उनकी लगन उनके काम आई और जयप्रकाश नारायण ने उन्हें अपने साथ आंदोलन में शामिल करने पर कोई आपत्ति नहीं की और बाद में उन्हें ‘अच्छे चरित्र’ का प्रमाणपत्र भी दिया। आपातकाल के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर फिर से बंदी लागू हो गयी और उसके प्रमुख नेतागण जेल में बंद कर दिये गये। इससे रा.स्व.संघ के नेतृत्व को धक्का लगा और उन्होंने माफी मांगते हुए इंदिरा गांधी के पास स्मरणपत्र भेजा। आपातकाल के दौरान जनसंघ जनता पार्टी में विलीन हो गयी और चुनावी राजनीति में उसे अच्छी सफलता मिली। 1980 में दोहरी सदस्यता के सवाल पर उन्होंने जनता पार्टी छोड़ दी और वर्तमान भारतीय जनता पार्टी का गठन किया और गांधीवादी समाजवाद (उसका जो भी मतलब हो!) के सहारे चुनाव लड़ा। उन्हें लोकसभा में केवल दो सीटें मिलीं। जनता की भावनाओं का शोषण कर सकने के लिये मुद्दों की तलाश शुरू हो गयी।

मीनाक्षीपुरम में कुछ दलितों द्वारा इस्लाम धर्म स्वीकार किये जाने से सारे देश में काफी हो-हल्ला मचा। इससे संघ परिवार को मुसलमानों से निबटने का एक मुद्दा मिला। जेपी आंदोलन में शामिल होने से मिले सम्मान ने संघ परिवार को नया जीवन दे दिया और इसने अपने हाथ-पैर विदेशों में रहने वाले भारतीयों की ओर बढ़ाये, जिन्हें अपनी पहचान एक भारतीय के रूप में बनाये रखने के लिये, पराये देश में अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिये एक आध्यात्मिक प्रेरणा की ज़रूरत थी। एक तरफ आर्थिक लाभ का मोह और दूसरी तरफ परंपरा से जुड़ने की चाहत ने अनिवासी भारतीयों को बड़े पैमाने पर विहिप से जोड़ा और उन्होंने भारी मात्रा में विहिप को धन दिया। इस तरह बड़े आक्रमण की आधारशिला रखने का काम पूरा हो गया। संघ परिवार को आक्रमण का मौका तब मिला जब शाहबानो के मामले में राजीव गांधी ने अपरिपक्वता दिखाई। तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं को गुज़ारा भत्ता देने के बारे में मुल्लाओं के फैसले पर उनका तुष्टीकरण करने के बाद वे हिंदू संप्रदायवादियों के दबाव में आ गये और बाबरी मस्जिद के दरवाजे हिंदुओं के लिये खोल दिये। दरवाले खोल देने से रामजन्म भूमि के मुद्दे पर लोगों में एक व्यवस्थित तरीके से उन्माद पैदा किया गया, और भावनात्मक अपील, प्रचार के हथकंडे, मुसलमानों के प्रति नफ़रत का तेजी से प्रचार-इन सब का राजनैतिक लाभबंदी के लिये चतुरता से इस्तेमाल किया गया। आगे चल कर संघ परिवार के एक अंग विहिप इस उन्माद की लहर पर सवार होकर इस सांप्रदायिक उन्माद को घृणा के स्तर तक ले गयी। इस पृष्ठभूमि में आडवाणी द्वारा पारंपारिक धार्मिक प्रतीकों और राम मंदिर के साथ राजनैतिक नारों को जोड़ते हुए रथ यात्रा शुरू की गयी, और वे हिंदुत्व सांप्रदायिकता को भगवा फासिस्ट आंदोलन की सीमा तक ले गये। इस अभियान की पराकाष्ठा मस्जिद विध्वंस के कायरतापूर्ण अपराध में हुई, जब भाजपा शासित राज्य के प्रशासन तंत्र का सहयोग पाकर और केंद्र में समय बरबाद कर रही कांग्रेस की दिखावटी मौन की स्वीकृति पाकर, संघ परिवार के दुर्दम्य संगठनों और कारसेवकों ने प्रारंभिक पूर्वाभ्यास के बाद मात्र 5 घंटों में ढांचे को ढहा दिया और अगले कुछ घंटों में मलबे को साफ भी कर गये। इसने ‘कारसेवक पुरातत्वज्ञों’ को व्यावसायिकता के सभी मूलभूत नियमों पर गुस्ताख़ी से इतराते हुए यह घोषित करने का मौका दिया कि कारसेवकों द्वारा निर्मित यह मलबा यह साबित करता है कि जहां पर मीर बकी मस्जिद थी, वहां पर पहले राम मंदिर था।

शिवसेना, जो ‘भूमि-पुत्र’ सिद्धांत पर फली-फूली, जिसे कांग्रेस के कुछ नेताओं ने पीछे से सहयोग दिया, बम्बई में बड़ी तेजी से उभरी। तगड़ी आर्थिक मदद पाकर इसने बंबई में कम्युनिस्ट मज़दूर नेताओं पर जानलेवा हमले शुरू कर दिये। इसके पश्चात हिंदुत्व उभार के चलते मुस्लिम विरोधी लहर पर सवार होने के पहले उन्होंने दक्षिण भारतीयों (लुंगीवालों) तथा गुजरातियों के खि़लाफ़ अस्थायी अभियान शुरू किया। इस प्रक्रिया ने संघ परिवार के हौसले और बढ़ा दिये, उसकी ताकत और बढ़ गयी। शिवसेना ने इसमें ‘लघु-महाराष्ट्रीय भारतीय जनता पार्टी’ और स्टॉर्म ट्रूपर बजरंग दल (रा.स्व.संघ के कार्यकर्ता, जो मुस्लिम विरोधी दंगे करने में माहिर हैं) की मिली-जुली भूमिका निभायी।
साभार :संघ परिवार की राजनीति : लोकतांत्रिक भारत या हिंदू राष्ट्र, राम पुनियानी

डॉ. खुर्शीद अनवर
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