साझी विरासत
यहां नहीं है मज़हब की दीवार कोई

मनोज ठाकुर

नेनू मुहम्मद दुर्गापूजा में प्रतिमा स्थापना से लेकर विसर्जन तक में बराबर शरीक होते हैं। आरती-आचमन भी करते हैं। दरअसल, नेनूभाई तो बानगी भर हैं। पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिला अंतर्गत गांव बलराम बस्ती में कमोबेश सभी मुस्लिम परिवार दुर्गापूजा मनाते हैं। यहां के हिंदू भी पीछे नहीं, ईद की खुशियों में बढ़-चढ़कर शरीक होते हैं। दो राय नहीं कि भाईचारे की इससे बेहतर मिसाल कम ही मिलेगी।

बलराम बस्ती की आबादी है 1650। इनमें महज डेढ़ सौ हिंदू हैं और बाकी मुस्लिम। यहां 19 वर्ष पूर्व यानी 1989 में दुर्गापूजा मनाने की परंपरा शुरू हुई। इसके लिए 12 सदस्यीय कमेटी का गठन किया गया। छह सदस्य हिंदू थे तो छह मुस्लिम। कमेटी के अध्यक्ष चुने गए थे सुलेमान मुहम्मद। फिर तय हुआ कि एक-दूसरे के त्यौहारों में दोनों समुदायों के लोग बढ़-चढ़कर हिस्सा लेंगे ताकि एकता बनी रहे। मौजूदा दुर्गापूजा कमेटी में 26 सदस्य हैं। अध्यक्ष पंकज चौधरी हैं, तो मुस्लिम सदस्यों की संख्या 18 है, इनमें नेनू मुहम्मद, शुक्र मुहम्मद, अलमो मुहम्मद, जनबार मुहम्मद, समसुल मुहम्मद, वजीरूद्दीन मुहम्मद शामिल हैं। कमेटी अध्यक्ष पंकज राय ‘बापी’ का कहना है कि चाहे ईद हो या मुहर्रम, दुर्गापूजा हो या दीपावली। गांव के हिंदू-मुस्लिम सभी त्यौहार साथ-साथ मनाते हैं। इस अवसर पर दोनों समुदायों के लोग साथ-साथ भोजन करते व पूजा-इबादत में शरीक होते हैं। यहां तक कि मुहर्रम में दोनों समुदायों के लोग साथ-साथ गदका खेलते हैं, अन्य परंपराओं का भी निर्वाह करते हैं। शादी-विवाह में भी एक-दूसरे का सहयोग करते हैं। इसी प्रकार 19 वर्षों से मुस्लिम परिवार के लोग दुर्गापूजा विधि का पालन करते हैं। आरती करने व अंजली देने में भी शामिल होते हैं। उत्साह देखकर कहीं से नहीं लगता कि दुर्गापूजा हिंदुओं का त्यौहार है। प्रतिमा विसर्जन में भी दोनों समुदायों के लोग शामिल होते हैं। पूजा पूरी तरह से गांव के निवासी आपस में चंद्रा संग्रह कर करते हैं। जितनी राशि जमा हो पाती है, उसी के हिसाब से पूजा का बजट बनता है। कमेटी के सदस्य सईदुल इस्लाम का कहना है-‘हम लोग पूजा और इबादत में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं मानते। यह नहीं समझते कि दुर्गापूजा हिंदू का पर्व है या मुसलमान का। यह दोनों के लिए बराबर है। दुर्गापूजा ही नहीं, दीपावली और काली पूजा भी दोनों समुदाय के लोग साथ-साथ करते हैं। आप कह सकते हैं कि बलराम बस्ती में राम और रहीम में कोई फर्क नहीं है। दरअसल  खुदा को जिस रूप में याद किया जाए, वह उसे पसंद करता है।’
साभार : जागरण

डॉ. खुर्शीद अनवर
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