साझी विरासत
द्रविड़ साझी विरासत

डॉ. रिचर्ड देवदॉस

1. द्रविड़ साझी विरासत से आशय

ऑक्सफोर्ड एडवांस्ड लर्निंग डिक्शनरी के मुताबिक विरासत का मतलब होता है किसी भी देश या समाज का वो इतिहास, वे परंपराएं और विशेषताएं जो अनेक सालों से इस देश या समाज की पहचान बनाये रहती हैं और जो इसके चरित्र का अहम हिस्सा मानी जाती हैं; जबकि साझी उसे कहा जाएगा जो विभिन्न हिस्सों या पदार्थों के संगम का परिणाम होती हैं।

2. द्रविड़ियन लोग

उद्गम एवं इतिहास : द्रविड़ों के उद्गम और इतिहास को लेकर अनेक सिद्धांत और दृष्टिकोण पाए जाते हैं।

अगर तमिल लोककथा की मानें तो द्रविड़ भारत के दक्षिणी हिस्से में डूब चुके एक द्वीप कुमारी कंदम से आए थे। कुमारी कंदम का नाता लेमूरिया से भी जोड़ा जाता है।

अगर वर्ल्ड बुक एनसाइक्लोपीडिया के पन्नों को पलटें तो पता चलता है की द्रविड़ लोग भारत के शुरुआती बाशिंदों में से थे। उन्होंने 2500 ईसा पूर्व के लगभग, सिंधु घाटी में आधुनिक सभ्यता की नींव रखी थी।

भारत में एक ख़ास भाषा बोलने वाले समूह के लोगों को द्रविड़ कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि सबसे पहले वे ही मूल रूप से प्राचीन भारत में बसे थे। आज यह समूह मुख्यतः भारतीय समाज के निचले तबके के लोगों का है।

द्रविड़ सभ्यता : द्रविड़ सभ्यता को उस सिंधु घाटी की सभ्यता का पर्यायवाची माना जाता है जिसके ज्यादातर दर्शन वर्तमान पाकिस्तान में होते हैं। एक हजार वर्षों तक चलने वाली और हड़प्पा संस्कृति के नाम से प्रसिद्ध इस सभ्यता के बारे में कहा जाता है कि यह हजारों वर्षों तक चली बसने-बसाने की प्रक्रिया का परिणाम थी। व्यापक खुदाई से संकेत मिलते हैं कि 2500 ईसा पूर्व आते-आते द्रविड़ संस्कृति पूरी तरह अपने पैर पसार चुकी थी। अभी हाल में किए गए अध्ययन तो यह उदघाटित करते हैं कि द्रविड़ संस्कृति सिंधु घाटी के पूरे-के-पूरे निचले इलाके में अपनी जड़ें जमा चुकी थी।

सन् 1920 में पाकिस्तान में और भारत में अहमदाबाद के निकट लोथल में की गई खुदाई में पाए गए मोहनजोदाड़ो और हड़प्पा जैसे विशाल शहर सड़कों की बेहतरीन योजना के साथ बनाए गए थे। इन खुदाइयों के दौरान पाए गए अनेक स्थलों में धार्मिक कार्यक्रमों को इंगित करने वाले चारों ओर से घेरे गए स्थान थे। मोहनजोदाड़ो में मिली विशाल पानी की टंकी का इस्तेमाल धार्मिक अनुष्ठान से जुड़े स्नान की खातिर किया जाता रहा होगा।

सिंधु घाटी की सभ्यता सैकड़ों शहरों को अपने प्रभाव में ले चुकी थी। इनमें से कई शहरों की आबादी तो तीस से चालीस हजार तक थी। उस समय के शहर बेहतरीन सभ्यता के केंद्र थे। प्रत्येक घर में स्नानागार था, और प्रत्येक शहर में गंदी नाली की व्यवस्था थी। मकानों का निर्माण भट्ठे में पके ईंटों से किया जाता था; हालांकि कभी-कभी धूप की गरमी में तपे ईंटों का इस्तेमाल भी किया गया। कुछ मकान तो अनेक कमरों वाले विशाल भवन थे। दूसरे कुछ छोटे मकान थे जिनका निर्माण गरीबों और कारीगरों के रहने के लिए कराया गया था। किलेनुमा भवन यही संकेत देते हैं कि बड़े-बड़े शहरों का प्रशासन चलाने के लिए एक राजनीतिक संगठन भी मौजूद था।

लोथल में तो एक ऐसा बंदरगाह था जो 50 ऐसे समुद्री जहाजों की आवाजाही संभव बनाता था जो दूसरे देशों के साथ व्यापार करते थे और इस सिलसिले में मिश्र तक की यात्रा करते थे।

प्रमुख द्रविड़ समूह : प्रमुख द्रविड़ समूह में निम्न शामिल हैं—पाकिस्तान स्थित बलूचिस्तान के ब्रहूई जो ख़ास मुसलमान हैं, मध्य और उत्तर भारत में बसे गोंड नामक आदिवासी, कन्नड़भाषी लोग, मलयालीभाषी लोग, श्रीलंका और तमिलनाडु में बसे तमिलभाषी लोग और तेलुगूभाषी लोग।

द्रविड़ भाषा : द्रविड़ भाषाई परिवार में 26 भाषाएं शामिल हैं। ये भाषाएं भारत के मुख्यतः दक्षिणी हिस्से में बसे 2 करोड़ लोगों द्वारा बोली जाती हैं, इस प्रकार द्रविड़ लोग दुनिया के चौथे सबसे बड़े भाषाई समूह के रूप में माने जाते हैं। इस समूह में कन्नड़, मलयालम, तेलुगू और तमिल लोग शामिल हैं। दक्षिणी भाषाएं भारत की आबादी के 24 फीसदी हिस्से द्वारा बोली जाती हैं। ये भी माना जाता है कि द्रविड़ भाषाएं पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, अफगानिस्तान, श्रीलंका और ईरान के कुछ इलाकों में भी बोली जाती हैं। बाहर से आकर मलेशिया, सिंगापुर, कनाडा, अमेरिका और इंगलैंड में बसे द्रविड़ भी द्रविड़ भाषाएं बोलते हैं।

द्रविड़ लोगों के लिखने का तरीका बहुत ही जटिल था। मुख्यतः मिट्टी की मोहर पर लिखे अभिलेख उदघाटित करते हैं कि लोगों को लिखने की कला आती थी और वे इसका अभ्यास भी करते थे। द्रविड़ लिपि अभी तक सुलझाई नहीं जा सकी है क्योंकि इसके कोड की कुंजी अनुपलब्ध है। इसलिए इसका पूरा मतलब और महत्व अभी भी नहीं समझा जा सका है। लेकिन कुछ आलेख यह संकेत देते हैं कि लोग गिनना और माप करना जानते थे।

द्रविड़ भाषाओं का अंकित इतिहास 2000 वर्षों से भी ज्यादा का है।

द्रविड़ साहित्य : दक्षिण भारत में बोली जाने वाली द्रविड़ भाषाओं का अपना प्राचीन साहित्य है।

चार मुख्य भाषाए हैं—तमिल, तेलुगू, कन्नड़, और मलयालम।

संगम नाटक शुरुआती पारंपरिक तमिल साहित्य कवियों के दो समूहों द्वारा रचा गया था। एक समूह ने सौंदर्य रस की कविताओं की रचना की। दूसरे समूह ने अपनी कविताओं में सम्राटों के साहस और वैभव तथा अच्छे व बुरे का चित्रण किया। संगम नामक कालजयी साहित्य का रचना काल 300 ईसा पूर्व माना जाता है। संगम साहित्य 473 लेखकों द्वारा रचा गया। इनमें 30 महिलाएं भी शामिल थीं जिसमें से सबसे अधिक मशहूर लेखक कवियित्री अवैयार थीं।

सिलापधिकरम और मणिमेगलाए नामक दो महान ग्रंथ सन् 200 में लिखे गए थे। पांचवी शताब्दी के दौरान तिरुवलूवर ने भद्र जीवन जीने का मार्गदर्शन कराने वाला ग्रंथ थिरुकुरल की रचना की।

छठी शताब्दी के आस-पास तमिल में धार्मिक भक्ति साहित्य लिखे जाने की शुरुआत हुई। नयनार नाम से लोकप्रिय तमिल कवियों का एक समूह भगवान शंकर का भक्त था, वहीं अलवर के नाम से लोकप्रिय दूसरा समूह भगवान विष्णु का भक्त था। दोनों ही समूहों द्वारा रची जाने वाली कविताएं दिल को बहुत गहराई तक छू लेती थीं, वहीं दोनों ही समूहों में महिलाएं कवि भी शामिल थीं।

दूसरी तमिल भाषाओं के साहित्य में भी इसी तरह के गुण पाए जाते थे क्योंकि उन पर भी तमिल व संस्कृत भाषाओं की परंपराओं का असर पड़ा था। तमिल साहित्य मुख्यतः हिंदू व बौद्ध परंपराओं को परिलक्षित करता था, जबकि कन्नड़ साहित्य पर जैनियों का प्रभाव स्पष्ट था। उत्तर भारत के क्षेत्रीय साहित्य की तुलना में दक्षिणी भारत के साहित्य की शुरुआत बहुत पहले हो चुकी थी।

द्रविड़ धर्म : हड़प्पा की खुदाई के दौरान मिली मिट्टी की मूर्तियों से संकेत मिलते हैं कि द्रविड़ लोग मुख्य रूप से मां देवी की पूजा करते थे, जिसकी पहचान बाद में काली के रूप में की गई। पूजा-अर्चना का स्त्रैण आयाम द्रविड़ लोगों के बीच काफी प्रचलित था।

टेराकोटा के मूर्तिशिल्प में स्त्री-आकार शामिल थे, ये आकार देवियों के हो सकते हैं। संभवतः इन देवियों को प्रजनन का प्रतीक माना जाता था और इनके पूजने वाले इनसे स्वस्थ बच्चों और अच्छी फसल की कामना करते थे।

दक्षिण में पहले और आज भी मरिअम्मा, येलेम्मा, कामा, मोरासम्मा, मतांगी, सोलम्मा और मुसम्मा नामक देवियां पूजे जाने वाली स्त्री रूपों में बहुत लोकप्रिय हैं।

द्रविड़ धर्म प्राकृतिक पदार्थों में दैवीय गुण और प्रकृति के शक्तियों में महा प्राकृतिक उपस्थिति की खोज कर सका। पेड़, पत्थर, प्रकृति—ये सभी द्रविड़ पूजा-अर्चना के हिस्से थे। पृथ्वी, अग्नि, वायु, जल और आकाश नामक प्राकृतिक तत्वों की आराधना की जाती थी। पैतृक पूजा-अर्चना भी द्रविड़ धर्म का आंतरिक हिस्सा था। गण चिन्हवाद यानी किसी जानवर या प्राकृतिक वस्तु को किसी ख़ास समूह या परिवार के ख़ास चिन्ह के रूप में चुनना और उसका सम्मान करना भी द्रविड़ लोगों की आदत में शुमार था।

जानवरों की भी पूजा की जाती थी, इनमें सबसे अधिक लोकप्रिय था कूबड़ वाला बैल। मिट्टी की मोहरों में हाथियों, मगरमच्छों व दूसरे जानवरों की आकृतियां पाई गईं जिससे यही पता चलता है कि जानवरों के प्रति सम्मान द्रविड़ धर्म का अहम हिस्सा था।

द्रविड़ व्यापार और दस्तकारी : पुरातत्वविदों ने खासी मात्रा में सुनिर्मित मिट्टी के बर्तन, बैलगाड़ी की शक्ल की आकृतियों, मानव चेहरे वाली मूर्तियों, तांबे की वस्तुओं और कांच के मनकों को शामिल किया है। इससे साबित होता है कि द्रविड़ लोग दस्तकारी में निपुण थे। उनके द्वारा की जाने वाली दस्तकारी में मूर्तिकला, धातु का काम और शीशे का काम शामिल थे। सिंधुघाटी की सभ्यता और मध्य-पूर्व में मेसोपोटामिया की प्राचीन सभ्यता के बीच मजबूत समानता है। ऐसा माना जाता है कि उत्तर-पश्चिमी भारत और फारस की खाड़ी के बीच समुद्री व्यापार का सिलसिला जरूर रहा होगा।

इस व्यापार से द्रविड़ लोगों को रोज़मर्रा की जरूरी खाद्य पदार्थ और लकड़ी, कपास, रंगने वाली डाई, धातुएं और कांच जैसे कच्चे माल की आपूर्ति होती थी।

द्रविड़ सामाजिक व्यवस्था : इतिहास गवाह है कि द्रविड़ लोग मातृवंशीयता का पालन करते थे। मातृवंशीयता ने महिलाओं को ताकत और सत्ता प्रदान की थी। सामाजिक कार्य व्यापार पर महिलाओं का नियंत्रण था। इससे साफ है कि सम्पत्ति संबंधी पैतृक अधिकार बेटियों को मिलते थे और वो भी मां के द्वारा।

3. प्राचीन द्रविड़ संस्कृति का पतन

द्रविड़ संस्कृति के पतन के कारण के बारे में अनेक सिद्धांत पेश किए जाते हैं :

आर्य संबंधी दृष्टिकोण : द्रविड़ संस्कृति के पतन के बारे में सबसे अधिक लोकप्रिय नज़रिया आर्यों वाला सैन्यवादी नज़रिया है। भारत में आर्यों के इतिहास की जानकारी आर्यों के धार्मिक ग्रंथ चतुर्वेद (चार वेद) से प्राप्त होती है। ये चारों वेद और संस्कृत में अन्य पौराणिक साहित्य बताता है कि आर्य जनजातियों में संगठित थे। वैदिक धर्म और सैन्य शक्ति, दोनों में ही, अश्व यानी घोड़े की महत्वपूर्ण सांकेतिक भूमिका थी। इससे ये संकेत मिलते हैं कि आर्य यूरोप और एशिया के घास के मैदान वाले इलाकों से आए थे क्योंकि घास के मैदान घोड़ों को पालने के लिए उपयुक्त होते हैं। आर्य मुख्य रूप से भारत के जिस हिस्से पर बसे उसे उन्होंने सप्त-सिंध यानी सात नदियों वाली भूमि नाम दिया (आज इसे पंजाब के नाम से जाना जाता है)। पंजाब के मैदानी इलाकों में आर्यों ने पशु-पालन के साथ-साथ अधिक स्थाई खेती भी करी। उन्होंने जंगलों को साफ कर गेहूं और जौ की खेती शुरू की। उन्होंने बढ़ईगीरी का काम भी शुरू किया।

आर्यों ने स्थानीय संस्कृति की अवहेलना की। उत्तर भारत के इलाकों को उन्होंने जीतना और उन पर नियंत्रण करना शुरू कर दिया। साथ ही उन्होंने स्थानीय लोगों को उत्तरी भारत में दक्षिण की ओर या जंगलों की ओर, और दक्षिणी भारत में पहाड़ों की ओर खदेड़ना शुरू कर दिया। इस सिद्धांत के अनुसार इस तरह भारतीय समाज का सामान्य वर्गीकरण कर दिया गया। उत्तर भारतीय आर्य हैं और दक्षिण भारतीय द्रविड़ हैं।

ये भी माना जाता है कि सफेद चमड़ी वाले आर्य जाति-व्यवस्था के जनक हैं। वर्ण का तात्पर्य रंग से है। जाति-व्यवस्था को वर्णाश्रम धर्म के रूप में भी जाना जाता है। जिसे काली चमड़ी वाले द्रविड़ों पर गोरी चमड़ी वाले आर्यों के प्रभुत्व के रूप में देखा जा सकता है।

हालांकि अनेक ऐसे लोग भी हैं जो इस मान्यता को पूरी शंका से देखते हैं कि भारत में भी आर्यों द्वारा अतिक्रमण किया भी गया था। यह शंका भारत पर आर्यों के अतिक्रमण का काल 1500 ईसा पूर्व मानने के कारण है। लेकिन हिन्दुत्व के कुछ जानकारों की मानें तो हिन्दुत्व में कुछ घटनाएं बहुत पहले घटित हो चुकी थी। उदाहरण के तौर पर, महाभारत युद्ध के आर्य-काल के दौरान घटित होने के दावे के बावजूद ऐसा माना जाता है कि यह युद्ध उस काल से 7000 साल पहले हुआ था।

बाढ़ : इतिहासकारों ने अनेक दूसरे विकल्प भी सुझाए हैं, इनमें से एक यह है कि सिंधु घाटी के बाढ़-ग्रसित होने के कारण पतन हुआ था।

खेती की विफलता : एक अन्य संभावना यह बताई गई है कि आबो-हवा में आए बदलाव के कारण बरसात में कमी आ गई जिसके कारण खेती सूख गई, लिहाजा देश के दक्षिणी हिस्से की ओर व्यापक पलायन होने लगा।

अंतर्समूह प्रतिस्पर्धा : अंतर्समूह प्रतिस्पर्धा और युद्ध के चलते कुछ समूहों को मिली जीत और दूसरे समूहों के खात्मे को भी द्रविड़ सभ्यता के पतन के कारणों में शामिल माना जाता है।

4. नई प्रवृत्तियों का उभार

प्राचीन द्रविड़ संस्कृति प्राचीन भारत के इतिहास का एक गौरवपूर्ण अध्याय था। यह एक सभ्य, शांत और मातृसतात्मक साम्राज्य रूपी भारत था जिसका अनेक कारणों से अवसान होता चला गया।

फिर भी तमिलनाडु में पेरियार महाराष्ट्र में बाबा साहेब अंबेडकर, केरल में श्री नारायण गुरु और अय्यानकली, आंध्र प्रदेश में कवि मोई मीमाना व रंगास्वामी और सी आर रेड्डी जैसी महान विभूतियां तथा कर्नाटक का ब्राह्मण विरोधी आंदोलन धन्यवाद के पात्र हैं क्योंकि इनके कारण द्रविड़ अभिमान की अग्नि एक बार फिर प्रज्वलित हुई है।

पेरियार रामासामी ने द्रविड़ भूमि के मूल बाशिंदों या स्थानीय लोगों को रेखांकित करने के लिए आदि द्रविड़ शब्द की रचना की। इनके आधिकारिक दलित दर्ज़े को घोषित करने के लिए कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में क्रमशः आदि कर्नाटक और आदि आंध्र शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है। आदि द्रविड़ उन दलितों की ओर संकेत करता है जो पंचम हैं यानी पांचवा समूह है जिसे वर्णाश्रम धर्म के तहत चतुर्जातीय व्यवस्था में शामिल करने लायक भी नहीं समझा जाता है। दूसरी तरफ, दलित मानते हैं कि वे इतने कमज़ोर नहीं हैं कि उन्हें जाति व्यवस्था के खांचे में बांधा जाए। वे जाति-संबंधों के पार हैं... उनकी जाति, जाति-व्यवस्था से परे है..

आज उपरोक्त प्रवृत्तियों के अलावा अनेक ऐसे कारण हैं जो भारत के दक्षिणी हिस्से के लोगों को द्रविड़ साझी विरासत की श्रेणी में रखते हैं।

आज आदि द्रविड़ के नाम से जाने जाने वाले और तमिलनाडु में दलित कहलाए जाने वाले द्रविड़ लोगों की एक साझी भाषा है। यह भाषा तमिल है। ऐसा ही कुछ आंध्र, कर्नाटक और केरल में भी है जहां क्रमशः तेलुगू, कन्नड़ और मलयालम भाषाएं जोड़ने का काम करती हैं।

पूजा-अर्चना से जुड़ी गतिविधियों के मामले में भी संयोजक काम करते हैं क्योंकि तमिलनाडु के उप-दलित समूह पलार, पेरियार और अरुंथाथियर, साथ ही आंध्र के मलास एवं मघिगा जैसे उप-दलित समूह अपने ही समूहों के पुरखों, नायक-नायिकाओं की पूजा करते हैं और प्रकृति, जीवों व जड़ पदार्थों के प्रति विस्मय का भाव रखते हैं।

हालांकि जहां तक संगीत, गीत, नृत्य और पेशे का सवाल है हर एक उप-समूह की अपनी एक अलग पहचान होती है। उदाहरण के तौर पर पेरियार उत्कृष्ट ढोल वादक होते हैं और उनके गीत लयपूर्ण होते हैं और आरोही स्वर उत्कर्ष पर पहुंच जाता है।

हम समसामयिक द्रविड़ साझी विरासत के संदर्भ में निम्न को भी शामिल कर सकते हैं—
अंबेडकर जयंती मनाना, चुनावी गठबंधन करना, ख़ासकर स्कूलों में बच्चे भी अच्छे समन्वयक बन सकते हैं। पोंगल का जश्न, जो कि वास्तव में फसलों की कटाई का त्यौहार है। युवाओं के लिए व्यावसायिक प्रशिक्षण, वैकल्पिक आजीविका संबंधी विकल्प, शांति स्थापित करने की दिशा में प्रयास, स्कूल, पूजा-स्थल, दमन का साझा इतिहास और दमनकारियों में साझापन।

हालांकि हर एक इलाक़े की अपनी विशिष्ट साझी विरासत होती है, यह अपनी विरासत हम अपने पड़ोसियों के साथ भी बांटते हैं। इस मामले में द्रविड़ साझी विरासत भी अपवाद नहीं है। अपनी ख़ासियत और ख़ास पहचान होने के बावजूद द्रविड़ साझी विरासत खुद को भारत और दक्षिण एशिया के दूसरे हिस्सों के साथ बांटती है। इसका प्रमुख उदाहरण आजादी की लड़ाई का वो साझा इतिहास है जिसके पूरे इलाके के द्रविड़ और गैर द्रविड़ हिस्सेदार हैं और मालिक भी हैं।

डॉ. खुर्शीद अनवर
माँ और धरती माँ
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