साझी विरासत
विष्णु और अल्लाह के सहस्त्र नाम

के एस राम

अल्लाह का मतलब है ‘अल-अहद’ या ‘एक’। विष्णु को भी ‘एक’ कहा जाता है। यह विचित्र है लेकिन विष्णु और अल्लाह के नामों में आश्चर्यजनक समानताएं हैं।

‘महाभारत’ में सम्मिलित वेद व्यास द्वारा रचित ‘विष्णु सहस्त्रनामा’ (विष्णु के सहस्त्र नाम) में सहस्त्र का तात्पर्य किसी सीमित संख्या से नहीं है बल्कि उसके बिल्कुल उलट है। ‘विष्णु सहस्त्रनामा’ में ‘सहस्त्र’ का मतलब ‘असीमितता’ से है। यह कविता (विष्णु सहस्त्रनामा) ईश्वर का ध्यान करने का एक साधन है। वह ईश्वर जो ‘अव्यक्त’ है, वह ईश्वर जो ‘अनेकामूर्ति’ है। इन दोनों विपरीत दृष्टिकोणों (अव्यक्त और अनेकामूर्ति) को ज़ाहिर करने वाले नाम इस कविता में एक के बाद एक आए हैं—पहले नाम फिर प्रतिनाम। क्योंकि मक़सद नामों को परिभाषित करना नहीं है बल्कि परिभाषाओं के जंजाल द्वारा परिभाषा की व्यर्थता को बताना है। सहस्त्रनामा में विष्णु के जो नाम दिए गए हैं वे सभी नाम संज्ञा नहीं हैं बल्कि वे ज़्यादातर विशेषण हैं। ये सभी ईश्वर के गुण हैं जिन्हें एक ध्वनि या संकेत की रचना के लिए दिया गया है जिससे ये ज़ाहिर हो कि ईश्वर सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान है और अस्तित्व की परिभाषा से परे है।

प्रतिनाम नाम को खारिज नहीं करते हैं, बल्कि प्रत्येक प्रतिनाम, प्रत्येक मूर्ति भी समान रूप से सही और गलत है : यह ‘इति’ भी है और ‘नेती’ भी है। इसलिए इन सभी नामों को जोड़कर एक बीजगणितीय ‘अंत’ (एल्जेबरिक फाइनेलिटी) का ख्याल बिल्कुल व्यर्थ है। विष्णु के सहस्त्र नामों में ‘शून्य’ और ‘अनंत’ भी हैं। सत्य की खोज का अभियान, जैसा कि स्वामी विवेकानंद ने कहा है, असत्य से सत्य की ओर नहीं होता बल्कि एक सत्य से दूसरे सत्य की ओर तब तक होता है जब तक वह ‘वेदांत’ तक, सत्य और परम हर्ष की चेतना तक, नहीं पहुंच जाता। इसे सत्-चित्-आनंद कहते हैं: सत्य-चेतना-परम हर्ष की अवस्था। यही ईश्वरत्व है। वह व्यक्ति जो इसे पा लेता है परिभाषित नहीं कर सकता-वह केवल इसकी ओर संकेत कर सकता है या सहस्त्रनामा के द्वारा बता सकता है।

‘द ग्रेशियस नेम्स ऑफ अल्लाह’ अल्लाह के विभिन्न नामों को सूचीबद्ध करता है जो कुरान में आए हैं। यह बहुत रोचक है कि अल्लाह के नाम और ‘विष्णु सहस्त्रनामा’ में विष्णु के नामों में समानता है। परमात्मा की तरह अल्लाह ‘अल अहद’ यानि ‘एक’ है। वह ‘अल-कुदस’ (पवित्रम) है, ‘अर-रहमान’ (वरदाय), ‘अल-मलिक’ (प्रभु), ‘अल-अज़ीज़’ (महावीर), ‘अल-अलीम’ (सर्वज्ञ) है। वह ‘अल-ख़लीक’ (स्रष्टा) और ‘अल-मुसव्वीर’ (विश्वकर्मा) है। वह ‘अल-हकम’ (विधात्रो) है जो ‘अल-अद्ल’ (न्याय), ‘अल-लतीफ’ (सूक्ष्म), ‘अल-कबीर’ (महान) है।

अल्लाह ‘अल-मतीन’ (स्थिर) भी है और ‘अस-समद’ (अच्युत, स्थवर) है। वह ‘अद-दार’ (भयक्रत) के रूप में दुख और ‘अल-मुमीत’ (यम) के रूप में मृत्यु देता है। वह स्वयं ही ‘अल-मुहाइमन’ (रक्षक) है। अल्लाह ‘अन-नूर’ (प्रकाश) है और ‘अल-हकीम’ (महाबुद्धि) है। वह ‘अन-नफी’ (मंगल) है। वह ‘धुल-जलाल-इक्रम’ (श्रीनिधि) है। जिस तरह विष्णु के प्रतिनाम हैं उसी तरह अल्लाह के भी प्रतिनाम हैं। उदाहरण के लिए अल्लाह ‘अल-मुकद्दिम’ (निर्विघ्न) है और वही ‘अल-मुहाख़िर’ (विलंबक) भी है।

इन सभी नामों का पाठ का क्या महत्व है? सहस्त्रनामा मोक्ष दिलाता है : चिन्तन में सभी तत्वों और अतत्वों को जोड़ देता है। अगर सब कुछ एक ही है तो द्वेष के लिए जगह ही कहां है? विष्णु सहस्त्रनामा की फलश्रुति भक्त को क्रोध, द्वेष, लालच और बुरे ख़्यालों से मुक्त करता है। भक्त जन्म-मृत्यु- जर-व्याधि के विचारों से मुक्त हो जाता है। ये सभी सकारात्मक सोच के चरम रूप हैं। इसी तरह अल्लाह का नाम जपने से भी भक्त को चिर-शक्ति प्राप्त होती है।

साभार - ‘द थाउज़न्डस नेम ऑफ विष्णु एण्ड अल्लाह’,
टाइम्स ऑफ इंडिया, 13 अगस्त 2004
अनुवाद - कुसुम लता

डॉ. खुर्शीद अनवर
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