साझी विरासत
कुचीपुडी का संसार

शशिप्रभा तिवारी

दिल्ली के गुरु जयराम राव और वनश्री राव के प्रयासों से कुचीपुडी को अंतरराष्ट्रीय क्षितिज पर एक नई पहचान मिली है। नृत्य के प्रति पूर्ण समर्पित इस युगल को भारत सरकार द्वारा 1998 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और गुरु जयराम को 2004 में पद्मश्री से सम्मानित किया जा चुका है। कई राज्य सरकारों ने भी इन्हें सम्मानित किया है। इतना ही नहीं, अमेरिका, मैक्सिको, मॉरीशस में भी इन्हें विशेष सम्मान मिला है।

गुरु जयराम राव के अनुसार कुचीपुडी नृत्य, दक्षिण भारत के आंध्र प्रदेश का शास्त्रीय नृत्य है। इसका जन्म और विकास मूलतः कृष्णा ज़िले के कुचीपुडी ग्राम में हुआ। इसका प्राचीन नाम भागवत मेला नाटकम है। यह नृत्य भगवत अथवा ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए उन्हीं के समक्ष मंदिरों या उसके आसपास किया जाता था।

कुचीपुडी मुख्यतः नृत्य-नाटिका शैली का नृत्य है। इसमें राजनर्तकी भागवत मेला और देवदासी तीनों का सम्मिश्रण है। कुचीपुडी गांव के ब्राह्मण पुरुष नर्तक भागवत मेले में अभिनय करते हैं, जिन्हें ‘भगवतलु’ कहा जाता है। भगवतलु गायन, नर्तन और अभिनय तीनों में पारंगत होते हैं। साथ ही महिला पात्रों को भी मंच पर पुरुष कलाकार ही साकार करते हैं।

ऐतिहासिक मान्यता है कि सोलहवीं शताब्दी के पहले से यह नृत्य अस्तित्व में था। उन दिनों भक्ति आंदोलन चरमोत्कर्ष पर था, जिसका प्रभाव कुचीपुडी नृत्य पर भी पड़ा। साक्ष्य के रूप में अमरावती तथा वारंगल ज़िलों के मंदिरों की मूर्तियों को भी प्रस्तुत किया जाता रहा है। हालांकि, कुचीपुडी नृत्य के विकास में दो योगियों के नाम भी जुड़े हुए हैंµतीर्थ नारायण यती और सिद्धेन्द्र योगी।

ग़ौरतलब है कि सिद्धेन्द्र योगी, नारायण यती के शिष्य भी थे। सिद्धेन्द्र योगी को ही कुचीपुडी का जनक माना जाता है, जिन्होंने गुरु-शिष्य परंपरा की नींव डाली उल्लेखनीय है कि नारायण यती एक कृष्ण भक्त थे, सो उन्होंने कृष्ण लीला तरंगिनी लिखी। उनकी तरंगिनी आज भी कुचीपुडी नृत्यांगनाओं एवं गुरुओं के बीच बहुत लोकप्रिय है। इसी तरंगिनी के आधार पर ‘तरंगम’ की प्रस्तुति हर नृत्य समारोह में पेश की जाती है। जबकि, दूसरी ओर सिद्धेन्द्र योगी ने भामाकलापम जैसी अमरकृति दी। सत्यभामा और कृष्ण की कथा का वर्णन इस कृति में है। सिद्धेन्द्र योगी, खुद युवा नर्तकों को भामाकलापम नृत्य-नाटिका प्रस्तुत करने के लिए प्रशिक्षित करते थे।

इस संदर्भ में एक और घटना का विवरण मिलता है। वह यह कि गोलकुंडा के तत्कालीन नवाब कुली कुतुबशाह भामाकलापम नृत्य-नाटिका देखकर इतने प्रसन्न हुए कि कुचीपुडी नर्तकों को उन्होंने कुचीपुडी ग्राम दान में दे दिया। इस तरह, कुचीपुडी नर्तकों को एक स्थायी निवास और कला-साधना के लिए आधार मिल गया।

परिवर्तन प्रकृति का नियम है। इस नियम के अनुकूल जो ढलता है, वह आगे बढ़ता है। यह एक यथार्थ है। कुचीपुडी नृत्य गुरु लक्ष्मी नारायण शास्त्री ने सबसे पहले कुचीपुडी गांव से निकलकर दक्षिण के सांस्कृतिक केंद्र चेन्नई को अपनी कर्मभूमि बनाया। यहां उन्होंने भरतनाट्यम की तरह कुचीपुडी में एकल नृत्य की शुरुआत की। उनके बाद, वेदांतम राघवैया, वेम्पति चिन्ना सत्यम, पेद्दा सत्यम और पशुपति कृष्णमूर्ति भी मद्रास पहुंचे। वेम्पति चिन्ना सत्यम को छोड़कर तीनों ने नृत्य गुरु के रूप में तमिल-तेलुगु फ़िल्मों की ओर रुख कर लिया। धीरे-धीरे वह फ़िल्मों में नृत्यों का निर्देशन करने लगे। दूसरी ओर, वेम्पति चिन्ना सत्यम ने चेन्नई में कुचीपुडी आर्ट अकादमी की स्थापना की। उन्होंने कुचीपुडी की तकनीकों में कई सुधार किए। इसे अन्तर्राष्ट्रीय पहचान और लोकप्रियता दिलाने की उन्होंने जी तोड़ कोशिश की और वे सफल भी रहे। उनकी लोकप्रियता का अंदाज़ा इस बात से सहज ही लगाया जा सकता है कि उनके शिष्य विश्व के हर कोने में मौजूद हैं। उनकी कुछ मशहूर शिष्यों से प्रसिद्ध कुचीपुडी नृत्यांगनाएं जैसे-शोभा नायडू, यामिनी कृष्णमूर्ति, वनश्री राव, कमला रेड्डी और फ़िल्म अभिनेत्रियां जैसे-हेमामालिनी, वैजंयतीमाला, शशिकला आदि भी रह चुकी हैं। इन गुरुओं एवं नृत्य-निर्देशकों ने महिला कलाकारों की प्रतिभा को पहचाना और उन्हें आगे बढ़ाया। इस तरह, सन् 1940-50 के मध्य ही नृत्यांगनाओं का प्रवेश कुचीपुडी नृत्य में संभव हो सका।

शास्त्रीय नृत्य के कलाकारों में ज्ञान, भावना, संवेदना, परिपक्वता सभी गुणों की आवश्यकता होती है। सामान्यतः एक कलाकार को संस्कृत भाषा के तीन ग्रंथों की जानकारी होनी चाहिए। ये ग्रंथ हैं-भरत मुनि का नाटयशास्त्रा, नंदीकेश्वर का अभिनय दर्पण और नपम सेनानी की नृत्य रत्नावली । वैसे तो शास्त्रीय नृत्यों के मुख्य तीन तत्व हैं-नाट्य नृत और नृत्य। कुचीपुडी के कलाकार नृत्य करते समय मुख्यतः नाट्यशास्त्र के नियमों का ही पालन करते हैं। नाट्य यानी नाटक या अभिनय इसका मुख्य अंश है। नृत यानी विशुद्ध नृत्य जिसमें पैरों की ताल और गति की प्रधानता होती है। इसमें पैरों की गति तीन तरह की होती है-अडवु, जतिस एवं तीरमानम। जबकि नृत्य में तालबद्ध गीत, अभिनय, चेहरे के हाव-भाव आदि का संयोजन होता है।

तकनीकी सूक्ष्मता के बाद अभिनय महत्वपूर्ण होता है। अभिनय भी चार तरह के होते हैं- आंगिक, वाचिक, आहार्य और सात्विक। आंगिक और आहार्य अभिनय सामान्य होते हैं, जबकि वाचिक यानी नृत्य के दौरान कलाकार द्वारा संवाद प्रयोग कुचीपुडी नृत्य का विशेष आकर्षण है। क्योंकि अन्य किसी भी शैली में इस तरह की परंपरा नहीं है। कुचीपुडी गुरुओं का मानना है कि अभिनय की परिपक्वता वर्षों की साधना के पश्चात ही आ पाती है और एक कलाकार में तीस वर्ष की उम्र के बाद ही वह आती है, जब वह अपने भावों को अपनी स्टाइल में पूरी तरह व्यक्त करता है।

गुरु वेम्पति चेन्ना सत्यम ने कई नृत्य-नाटिकाओं जैसे हरविलासम, चंडालिका, कृष्ण-गोपी, अर्धनारीश्वर, रुक्मणी-कल्याणम, भामाकलापम आदि की रचना की है। इसके अलावा कई रचनाओं की कृति और हज़ारों पद्म हैं, जिन पर अभिनय किया जाता है। एक नर्तक या नर्तकी 10-12 पद्म सीखकर उसे प्रस्तुत करते हैं। कुचीपुडी में नृत्य-नाटिका में हर पात्र को अलग वेश-भूषा, अलग अंदाज़ मे दिखाने की परंपरा है। जबकि भरतनाट्यम या ओडिशी में एक पात्र ही सीमित समय में गीत के अनुसार अभिनय करता है। शास्त्रीय परंपराओं का निर्वाह करते हुए भी नाट्यधर्मी के साथ-साथ लोकधर्मी का हल्का-सा असर नृत्य में झलकता है। जैसे क्रोध के भाव को हमें नृत्य में दर्शाना है। हम एक छोटे बच्चे, एक किशोर या युवा और एक वृद्ध पर परिस्थिति और पात्र के अनुसार मन के भाव को अभिव्यक्त करेंगे। मान लीजिए कि नर्तकी को बालक कृष्ण और यशोदा के भावों को प्रस्तुत करना है। ऐसे में सबसे ज़्यादा ज़रूरी है पद के अर्थ को समझना, फिर यह सोचना कि कौन-सा रस या भाव पात्रनुकूल होगा। जैसे कृष्ण शिशु हैं तो वात्सल्य रस का प्रयोग, गोपाल हैं तो करुण रस का, और युवा हैं तब नवरस का प्रयोग उचित है।

‘सिद्धेन्द्र कलाक्षेत्रम’ में प्रहलाद-नाट्यम और भामाकलापम नृत्य-नाटिकाएं नर्तक-नर्तकी को सीखना ज़रूरी है। विष्णु-पुराण से उद्धृत भामाकलापम में अष्ट-नायिका और नव रस का पूर्ण संयोग नज़र आता है। इस नृत्य नाटिका में मंचन में 3-4 घंटे का समय लगता है। दरअसल एकल नृत्य के अभिनय एवं नृत्य-नाटिका के अभिनय में काफ़ी फ़र्क़ होता है। यही बात कुचीपुड़ी के साथ भी लागू होती है।

सभी जानते हैं कि कथकली, कृष्ण अट्टम, कलिमारपट्टू आदि केरल के अन्यतम कला रूप हैं। इसमें कथकली को तो यू.एन.ओ. से अंतरराष्ट्रीय मान्यता भी मिल चुकी है। इसी तरह उड़ीसा का छाऊ भी लोकप्रियता के शिखर पर है। लेकिन, कुचीपुड़ी का मूल स्रोत भागवत मेला और इसके कलाकार आज भी आंध्र प्रदेश तक सीमित हैं। उन्हें इसे आगे लाने का खुद प्रयास करना होगा। साथ ही, नई नृत्य-नाटिका, नए विषयों का चयन भी ज़रूरी है। यह नृत्य शैली लोक-धर्मी अधिक है इसलिए इसमें इस्तेमाल होने वाली हस्तमुद्राओं, भाव-भंगिमा, आंखों की गति, मुखाभिनय आदि में भी शास्त्रीयता का पुट लाना होगा।

विषत वर्षों में हमने (गुरु जयराम राव और वनश्री राव) रवींद्रनाथ ठाकुर की चित्रांगदा, कालिदास के कुमारसंभव आदि पर नृत्य-नाटिकाएं प्रस्तुत कीं, जो बहुत सराही गईं।

दरअसल अभिनय दो शब्दों ‘अभि’ और ‘नि’ के मेल से बना है। इसकी विवेचना भरत मुनि ने नाट्यशास्त्रा में, विश्वनाथ ने साहित्य दर्पण में, जगन्नाथ ने रसगंगाधर आदि में अपने-अपने तरीके से की है। इन विद्वानों के अनुसार पात्र की मानस-स्थिति, भौतिक परिस्थिति और भाव के अनुकूल जब अभिनय किया जाए, जो दर्शकों के हृदय को स्पर्श करे वही सही मायने में अभिनय है। वास्तव में रचनाकार की रचना के निहितार्थ को प्रेषित करना और उसका संप्रेषण सही एवं संतुलित मात्रा में होना कलाकार की सफलता की कुंजी मानी जाती है। संस्कृत ग्रंथों के अतिरिक्त साहित्य कोष (हिंदी) में अभिनय को इन शब्दों में प्रस्तुत किया गया हैµ‘अभिनयति हृदयगत भाव प्रकाशयति’ अर्थात् अभिनय वही है जो हृदय की भावनाओं को उद्घाटित कर दे।

बहरहाल भारत के अनुसार अभिनय के मानदंड को निर्धारित नहीं किया जा सकता। कलाकार की भावना और अभिनय उसकी अपने संसार और उसकी स्वयं की परिधि के अंतर्गत समाहित रहते हैं।

रंग-प्रसग अप्रैल-जून 2005 से साभार

डॉ. खुर्शीद अनवर
माँ और धरती माँ
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