साझी विरासत
हिन्दुस्तान की बहुरंगी विरासत

गुजरात जनसंहार न सिर्फ इसलिए भयावह था कि हज़ारों लोग मारे गए और बेघर हो गए थे बल्कि इसलिए भी कि इस जनसंहार के दौरान बड़े पैमाने पर संपत्ति और ढांचों को ध्वस्त किया गया। इस तबाही में कुल मिलाकर 198 मस्जिद, 26 मंदिर, 36 मदरसे ओर सबसे ज़्यादा परेशान करने वाली बात यह है कि 268 मज़ारें और तीर्थस्थल जिन्हें हिन्दू और मुसलमान दोनों ही पूजते थे, गिरा दिये गये थे या तोड़ दिये गये थे। इस तरह की तोड़-फोड़ मंदिरों, मस्जिदों, मदरसों, मज़ारों और तीर्थस्थानों को नियोजित ढंग से गिराना अपने आप में एक सवाल उठाता है ये सब क्यों घटा? सांप्रदायिक भावनाओं के डूबे हुए माहौल में हिंदुस्तान की बहुरंगी विरासत के प्रतीकों को निशाना बनाया गया और उन्हें अपवित्र किया गया। क्या ये सिर्फ एक दुर्घटना थी, बिना सोचे समझे उन स्थानों पर हमला किया गया जो हिन्दुस्तान की बहुल परंपरा के प्रतीक हैं और दोनों हिंदुओं और मुसलमानों की साझा विरासत का हिस्सा हैं। इस साझा विरासत में हिंदुओं और मुसलमानों की भागीदारी  हिंदू और मुसलमान पहचान के रूप में नहीं बल्कि विरासत के प्राकृतिक हिस्से के रूप में होती आई थी। तो क्या ये हमले और जनसंहार सुनियोजित षड्यंत्र का हिस्सा थे जिनका उद्देश्य बहुरंगी संस्कृति को समाप्त कर एकरंगी संस्कृति की स्थापना, एक ही धर्म का वर्चस्व और  गैर बहुल समाज की संरचना करना था।

एक बात तो हमारी समझ में साफ आ जानी चाहिए कि ऐसी ताकतें जो हिंदुस्तानी समाज को एकल संस्कृति वाला समाज बनाने में जुटी है वे पिछले दो दशकों में नई ऊर्जा और शक्ति के साथ सक्रिय हो गईं हैं। राजनैतिक स्तर पर ये ताकतें बे-रोकटोक काम कर रही हैं क्योंकि इनका विरोध न तो किसी सोची समझी रणनीति के तहत हो रहा है और न ही विरोध में निरंतरता है। लेकिन इनको ये भी पता है कि हिंदुस्तान के बेजोड़ सामाजिक ढांचे और बहुरंगी विरासत सम्मिश्र परंपरा की वजह से इन्हें कोई खास कामयाबी (चुनावी नतीजों और जन-मानस में पैठ बनाने, दोनों ही संदर्भों में) में नहीं हासिल हो पायी है। ये जुड़वां हिंदुस्तानी परंपरा चट्टान की तरह अटल है और सांप्रदायिक हमले के खिलाफ एक ढाल का काम करते हैं साथ ही इनकी नाकामयाबी की वजह भी है। यही वजह है कि ये ताकतें इस बहुरंगी विरासत के सभी प्रतीकों को ढहाने और तबाह करने में लगे हुए हैं। अगर इन ताकतों को रोकना है तो इन प्रतीकों को हर हाल में बचाना होगा, महफूज रखना होगा, इनका पुनर्निर्माण करना होगा। क्योंकि सिर्फ यही प्रतीक राजनीति और आर्थिक नीति से कहीं ज्यादा, इन ताकतों को अपने उद्देश्य तक पहुंचने में रोक पाएंगे।

सामाजिक रंगारंगी के दो जुड़वां मूल तत्व-बहुरंगी परंपरा और बहुलता पर्यायवाची या विनिमेय शब्द नहीं हैं। यह पूरी तरह संभव है कि कुछ समाज बहुल न हो पर सिर्फ बहुरंगी हो या फिर बहुरंगी हो पर बहुल न हो। हिंदुस्तानी परंपरा की शक्ति इसी में है कि हिंदुस्तानी समाज का ढांचा बहुल होने के साथ-साथ बहुरंगी भी है। भारत में बहुलता का मतलब हैः भाषाओं और धर्मों के स्तर पर विविधता। ये विविधता और बहुलता इस मायने बहुरंगी है कि इन सब में मूल तत्व एक है, ये एक दूसरे में समान गोलाकारों की तरह व्याप्त हो जाते हैं, किनारों पर एक दूसरे में विलय हो जाते हैं इस सबके बावजूद भी ये अपनी भिन्नता को बनाए रखते हैं।

यह बात भी ध्यान में रखनी चाहिए कि यह जरूरी नहीं है कि ये बहुलता बहुरंगी हो। यही हिंदुस्तान की बेजोड़ और अतुलनीय विशेषता है। यही विशेषता पश्चिमी विद्वानों को पिछली सदी से विस्मय में डाले हुए हैं। उन्नीसवीं सदी के आखिर में और बीसवीं सदी के शुरू में  ब्रिटिश एथनोग्राफरों ने सिर्फ हिंदुस्तान की बहुलता का ही विश्लेषण किया। इन परंपराओं के बीच के परस्पर रिश्ते पर ध्यान ही नहीं दिया नतीजा उन्होंने हिंदुस्तानी समाज को खंडित समाज बताया। उन्होंने सामाजिक ढांचे को बहुत ही सतही ढंग से विश्लेषण किया जहां से वो समाज में बहुलता तो देख पाए पर परंपराओं के अंर्तसंबंधों को नहीं देख पाए। पिछले दो-तीन दशकों में खासकर सोवियत संघ के विघटन के बाद पश्चिमी विद्वान हिंदुस्तान के टूटने की अपेक्षा कर रहे हैं साथ ही हिंदुस्तान के सामाजिक ढांचे के लचीलेपन पर चकित हैं। इस मायने में बिना किसी बाहरी मदद के इस ढांचे के विखंडनवादी शक्तियों को रोकने की क्षमता और सामर्थ्य पर तो बहुत ही ज्यादा चकित हैं। जाहिर है हिंदुस्तान का विघटन मुमकिन नहीं हुआ क्योंकि हिंदुस्तानी बहुलता पूरी तरह अंतर्संबंधित है। इस भारतीय विलक्षण बहुलता और बहुरंगी परंपरा के समुच्चेय को अब तक अपर्याप्त और असंतोषजनक तरीके से प्रभावित किया गया है। मिसाल के तौर पर विविधता में एकता। भारतीय बहुरंगी परंपरा को भारतीय एकता या एकीकरण समझना सरासर गलत होगा। बिना एक दूसरे में समाये या विलय हुए, बिना एक संयुक्त परंपरा को जन्म दिये विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराएं एक दूसरे से संवाद करती रही हैं। भारत की बहुलता और बहुरंगी परंपरा में कभी भी कोई टकराव नहीं रहा है और न ही कभी विलय का। दूसरे शब्दों में भारत में संपूर्ण विलय न होने के साथ-साथ मैत्रीपूर्ण संवाद बरकरार रहा है।

हम इस तरह यह भी नहीं कहना चाह रहे हैं कि भारतीय सामाजिक ढांचे के कुछ संस्थान बहुल हैं और कुछ केवल बहुरंगी बिरासत से जुड़े हैं। सिर्फ दो मिसालें यह साबित कर देंगी कि भारतीय सामाजिक संस्थाओं में दोनों ही विशेषताएं पायी जातीं हैं। भारत में बहुत सारे धर्म हैं। यह एक जाना-पहचाना सच है। ब्राह्मणवाद, बौद्धमत और जैन मत की पुरातन परंपराएं जबकि बहुत पहले से मौजूद थीं और जारी रहीं,कई अन्य धर्म जैसे पारसी और इसाई धर्म बाहर से आये। शायद आपको ये जानकर ताज्जुब होगा कि इसाई धर्म भारत में पहले यूरोप में बाद में आया। इस्लाम और सिक्खमत मध्यकालीन युग में आये। सबसे अहम बात ये है कि (जैनिमत के अलावा शायद) सभी परंपराएं मौजूद रहीं हैं साथ ही इन सब धार्मिक परंपराओं में कुछ समानताएं भी आ गई हैं। पीपुल्स ऑफ इंडिया के एक सर्वे के मुताबिक सभी भारतीय धर्मों में जाति व्यवस्था मौजूद है। हिंदू धर्म में करीब 3 हजार जाति समूह हैं, इस्लाम में 500, सिक्ख मत में 150 और इसाई धर्म में करीब इतनी ही यानी 150, इस नज़रिये से देखा जाए तो कहा जा सकता है कि जाति सिर्फ एक हिंदू ही नहीं बल्कि एक भारतीय संस्था है। सिर्फ एक यही भिन्नता हालांकि भारतीय इस्लामी परंपरा को अरबी इस्लामी परंपरा से अलग करती है। पर फिर भी यह मुख्यतः इस्लामी परंपरा है।

भाषा एक दूसरी मिसाल है। इस क्षेत्र में भी दोनों बहुलता और बहुरंगी विरासत मौजूद हैं। मशहूर भाषाविद् गियर्सन द्वारा उन्नीसवीं शताब्दी के अंत और बीसवीं शताब्दी के शुरू में किए गए लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया के मुताबिक भारतीय कुल मिलाकर कम से कम 179 भाषाएं बोलते हैं जिनमें 544 बोलियां भी शामिल हैं। इस तथ्य ने भारत को सच्चे मायनों में बहुभाषी समाज बनाया। कहा गया था कि सारी भाषाएं केवल चार भाषा परिवारों की सन्तति हैं (इंडो आर्यन, द्रविड, आस्ट्रिक ओर सिनो-तिब्बती) यह भी याद रखना चाहिए कि भारत की प्रमुख भाषाएं एक ही भाषा परिवार से पैदा हुई हैं और उन सब में काफी समान विशेषताएं हैं। इसके बाद भी किसी तरह का भाषायी विलय नहीं हुआ। आज भी ये कहना सरासर बेवकूफी होगी कि भारत में सिर्फ एक ही भारतीय भाषा है।

पिछले दो दशकों से इसी परंपरा पर प्रायोजित हमले हो रहे हैं। ऐसे सभी संस्थानों को जो भारत की बहुरंगी परंपरा के प्रतीक हैं, बेमानी कर देना और अंततः इनको आमूल नष्ट कर देना इन हमलों का उद्देश्य है। इसीलिए गुजरात में 268 से भी ज्यादा सूफी समाधियों को अपवित्र किया गया। इस परंपरा को बचाने और इसका पोषण करने के लिए इसका सार समझना जरूरी है। ये भाषा और साहित्य, सूफी और भक्ति परंपरा, ललित कला और वास्तु कला, संगीत और चित्रकला और भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के माध्यम से समझा जा सकता है।

भारतीय भाषाओं और साहित्य-विश्व भारत की बहुरंगी विरासत का जीता-जागता उदाहरण है। बारहवी शताब्दी से भारतीय साहित्य देश के ज्यादातर हिस्सों में लगातार फलता-फूलता रहा है। इस साहित्य की धर्म या राष्ट्रीयता के आधार पर पहचान कर पाना नामुमकिन था। सिर्फ एक तरह का भेद किया जा सकता था—संस्कृत और फारसी में लिखा प्राचीन साहित्य और दूसरा साहित्य। अमीर खुसरो (1254-1323) सबसे पहले हिन्दवी परंपरा के सर्वश्रेष्ठ कवि फारसी और हिन्दवी दोनों भाषाओं में लिखते थे (हिन्दवी भाषा हिंदुस्तान के क्षेत्र में ग्यारहवीं और बारहवीं शताब्दी के दौरान बोली जाती थी।) साथ ही हिंदवी साहित्यिक रचनाओं पर गर्व भी करते थे।  फारसी पाठकों को संबोधित अपनी एक फारसी कविता में उन्होंने लिखा है “चुम्मन टूटी-ई-हिंदम, अर रास्त पुरसी, जे भान हिंदवी पुर्स, ता नग्ज़ गोयम” (मैं एक भारतीय गुलाब की तूती हूं, अगर तुम मुझसे बात करना चाहते हो, मुझसे हिंदवी में बात करो जिससे मैं तुम्हें खूबसूरत चीजों के बारे में बता सकूं।) 12वीं-13वीं शताब्दी के संत बाबा गोरखनाथ ने बडे़ ही स्वाभाविक ढंग में कहाः “उत्पत्ति हिंदू जरना, जोगी, अक्ल पड़ी मुसलमानी” (मैं जन्म से हिंदू हूं, दिखने में जोगी और अक्ल से मुसलमान हूं।) बिलग्राम क्षेत्र के (आज के उत्तर प्रदेश में हरदोई के पास स्थित) बहुत सारे कवियों मसलन मीर जलाल, रसखान, अब्दुल लाहिद बिलग्रामी और मीर मीरान ने धर्म निरपेक्ष रचनाएं लिखीं। किसी भी तरह के धर्म की छाप अपनी रचनाओं पर नहीं पड़ने दी। इनमें से एक ने लिखा था : पेमी हिंदू तुर्क मैं, हार रंग रहयो समाप, देवल और मसित में, दीप एक ही भाए। (“मैं हिंदू और मुसलमान दोनों हूं और पूरी तरह से अपने ईश्वर में मस्त हूं, मंदिर और मस्जिद के लिए सिर्फ एक दीप ही काफी है।”)

इस तरह की कई मिसालें दी जा सकती है। यह जानना और मानना जरूरी है कि साहित्य में सम्मिश्र परंपरा और कबीर पर्यायवाची हैं। कबीर वास्तव में इस परंपरा के शिखर भी थे और साथ ही परम अभिव्यक्ति भी। साहित्य की यह परंपरा 12वीं शताब्दी से 18वीं शताब्दी तक चली। इसी तरह भाषा के क्षेत्र में कई बोलियों या एक भाषा अपनी क्षेत्रीय सीमा के बाहर भी बोली जाती थी। (हिंदी, हिंदवी, देहलवी, ज़बान-ए-हिंदोस्तान, दकनी, मारवा, ज़बान-उर्दू-ए-मुअल्ला, ज़बान-ए-उर्दू और सिर्फ उर्दू। 18वीं सदी से पहले हिंदी या उर्दू का अपना-अपना अलग इतिहास ढूंढना बेमानी है। सिर्फ इसलिए कि उनका अलग-अलग इतिहास था ही नहीं। आज की हिंदी और उर्दू ने 18वीं और 19वीं सदी में ही अपना-अपना स्वरूप लिया और इस तरह इनका अलग-अलग होना किसी कोई भाषा-विकास का नतीजा नहीं था पर एक निहायत ही बनावटी और अप्राकृतिक कृत्य था। (मिसाल के तौर पर अमीर खुसरो किस ज़बान में लिखते थे उर्दू या हिंदी में?) इसी तरह बहुरंगी परंपरा की समानताएं ललित कला, वास्तु कला, संगीत और चित्रकला के क्षेत्र में पायी जा सकती हैं।

भारत की बहुरंगी विरासत और बहुलता को भारत की साम्राज्यवादी विरोधी राष्ट्रीय आंदोलन से बहुत ताकत मिली। भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन ने मोटे तौर पर ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ की लड़ाई का एक व्यापक रूप ले लिया। ऐसे वक्त में जब भारत की बहुलता पर आधुनिकरण के दौर में एकरूपता का हमला हुआ तब इसी राष्ट्रीय आंदोलन ने सामाजिक बहुरंगी परंपरा को ताकत दी और उसे बचाए रखा। इसी बहुरंगी परंपरा से धर्मनिरपेक्षता और राष्ट्रवाद का जन्म हुआ। इस तरह से भारत की बहुरंगी विरासत और बहुलता में निहित पारंपरिक मूल्य को धर्मनिरपेक्षता और राष्ट्रीय एकता की खातिर कुर्बान करने की जरूरत नहीं पड़ी। इस तरह हम राजनीतिक आधुनिकरण और विदेशी राज पर हमले के मार्ग पर बिना अपने पारंपरिक मूल्यों को छोडे़ चल सके। इस तरह हम अपने पारंपरिक मूल्यों के साथ  आधुनिकरण के पहले चरण में दाखिल हुए। हमें अपने राष्ट्रीय आंदोलन का शुक्रगुज़ार होना चाहिए कि हम इसकी वजह से अपनी बहुरंगी विरासत और बहुलता को बचा पायें। यह याद रखना जरूरी है कि ये परंपराएं बनने में सदियां लग गयी हैं। इन्होंने ही भारतीय लोकतंत्र को प्रमुख मूलतत्व प्रदान हैं। साथ ही ये भी याद रखना चाहिए कि ये बहुरंगी विरासत और बहुलता सिर्फ लोकतंत्र में ही महफूज रह सकती हैं। इसीलिए जो ताकतें इन विरासतों और परंपराओं को धमकी दे रहीं रही हैं वो सीधे-सीधे लोकतंत्र को भी धमकी दे रही हैं और लोकतंत्र विरोधी हैं।

डॉ. खुर्शीद अनवर
माँ और धरती माँ
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