साझी विरासत
अमीरखुसरो की भाषा : प्रयोग और प्रयोजन

डा. आदित्य प्रचण्डिया

अमीरखुसरो का हिन्दी साहित्य के इतिहास में महनीय स्थान है क्योंकि उन्होंने अपनी रचनाओं द्वारा भिन्न-भिन्न विषय प्रस्तुत कर मनोविनोद और मनोरंजन की सामग्री प्रस्तुत की, अपभ्रंश मिश्रित भाषा और डिंगल भाषा के स्थान पर उन्होंने सर्वप्रथम खड़ीबोली, अवधी और ब्रजभाषा का सफलतापूर्वक प्रयोग किया, एक प्रकार से जन साधारण में प्रचलित भाषा का प्रयोग किया और भाषा के क्षेत्र में अपना महत्व स्थापित किया, उनकी रचनाओं में भारतीय और इस्लामी संस्कृतियों के समन्वय का पता चलता है और उनकी रचनाओं से लोकभावनाओं का परिचय प्राप्त हो जाता है। अमीरखुसरो का हिन्दी रचनाओं में उक्ति वैचित्र्य का प्राधान्य है। उनका साहित्य केवल मनोरंजन करने वाला साहित्य है, न कि गम्भीर तत्त्वों का विवेचन और निरूपण करने वाला। उन्होंने पहेलियाँ, मुकरियाँ, ढकोसले, दो सखुने आदि लिखे और सरल, स्वाभाविक एवं प्रवाहपूर्ण भाषा का प्रयोग किया। अरबी, फारसी के साथ-साथ अमीरखुसरो को अपने हिन्दवी ज्ञान पर भी गर्व था, उन्होंने स्वयं कहा है -‘‘मैं हिन्दुस्तान की तूती हूँ। अगर तुम वास्तव में मुझसे जानना चाहते हो तो हिन्दवी में पूछो। मैं तुम्हें अनुपम बातें बता सकूँगा।’’ इन्हें ‘तूती-ए-हिन्द’ की उपाधि से भी विभूषित किया गया था। अमीरखुसरो की लोकप्रियता का कारण उनकी हिन्दवी की रचनाएँ ही हैं। हिन्दवी में काव्यरचना करने वालों में अमीरखुसरो का नाम सर्वप्रमुख है। भावना की दृष्टि से खुसरो का हिन्दी में रचित साहित्य भावी युगान्तर का सूचक कहा जा सकता है।

अमीरखुसरो साहित्यकार और संगीतज्ञ होने के साथ-साथ भाषाओं के सजग साधक थे। उन्होंने दरबारी वातावरण में रहकर चलती हुई बोली से हास्य की सृष्टि करते हुए जन-समुदाय को प्रसन्न करने की चेष्टा की है। मनोरंजन और रसिकता के अवतार अमीरखुसरो हिन्दी साहित्य के इतिहास की निरुपमेय निधि हैं। जनजीवन के साथ घुल-मिलकर काव्य रचना करने वाले कवियों में अमीरखुसरो विशिष्ट हैं। उर्दू, हिन्दी, हिन्दुस्तानी अथवा खड़ीबोली का प्रथम रूप अमीरखुसरो की ही हिन्दी कविता में अभिदर्शित है। अमीरखुसरो ने अपनी मातृभाषा को ‘हिन्दवी’ कहा है। आधुनिक भारतीय भाषाओं के प्रथम उल्लेखकर्त्ता अमीरखुसरो ने अपने ग्रन्थ ‘नुह सिपहर’ में अपने समय की हिन्दुस्तानी भाषाओं की सूची इस प्रकार दी है- (1) सिन्धी (2) लाहौरी (3) कश्मीरी (4) कन्नड़ (5) धुरसमुद्री (तमिल) तिलंगी (तेलुगू) गुजर (गुजराती) (8) मावरी (घाटी) (9) गोरी (पहाड़ी) (10) बंगाली (11) अवध (अवधी) (12) दिल्ली तथा उसके आसपास-अन्दर हमाहद।  अमीरखुसरो ने हिन्दुस्तान की उक्त बारह भाषाओं का उल्लेख करते हुए इन सबको ‘हिन्दवी’ वही खड़ीबोली कहा है जो उस समय मुख्यतया दिल्ली के मुसलमान तथा सामान्यतः दिल्ली वाले बोलते थे। इसी को आज ‘उर्दू-हिन्दी-हिन्दुस्तानी’ कहा जाता है।

अमीरखुसरो के समय में यह भाषा ‘अरबी लिपि’ में लिखी जाती थी। फारसी तथा उर्दू लिपि बादशाह शाहजहाँ के समय से प्रारम्भ हुई। नागरी लिपि में लिखी जाने वाली साधारण बोलियों को ब्रजभाषा के सम्बन्ध में ‘भाषा’ कहा गया है। आगे चलकर ‘भाखा’ का शब्द ‘ब्रज-अवधी-राजस्थानी’ तथा उत्तरी भारत की सभी साधारण बोलियों के समान हो गया। अमीरखुसरो की कविताएँ सामान्यतः ‘देहलवी हिन्दी’ में है परन्तु उनमें गीत तथा दोहे ‘भाखा’ में भी हैं। यहाँ तक कि अमीरखुसरो की रचना ‘खालिकवारी’ में भी जगह-जगह ‘भाखा’ के वाक्य आ गए हैं जबकि रचना का वास्तविक अनुलेख फ़ारसी है तथा रचना का उद्देश्य ‘देहलवी हिन्दी’ के शब्दकोश की शिक्षा हिन्दी शब्दों को फारसी शब्दों के समक्ष रखकर उनके स्तर का अर्थ निर्धारित करना है। ‘खालिकबारी’ में ‘भाखा’ के वाक्य लाने से अमीरखुसरो का अभिप्राय शायद यह हो कि जो बच्चे अपने घर में ‘भाखा’ बोलते हैं उनके मस्तिष्क भी इस रचना के साथ जुड़ जायें। अमीरखुसरो की देहलवी हिन्दी में साधारणतः वह रूप आज भी प्रचलित है—
बाला था तब सबको भाया
बड़ा हुआ कुछ काम न आया

देहलवी हिन्दी के साथ अमीरखुसरो की रचना में ‘भाखा’ की अधिकता देखकर यह प्रतीत होता है कि उत्तरी हिन्दुस्तान की कई सामान्य बोलियाँ देहलवी हिन्दी के साथ-साथ दिल्ली में उपलब्ध थीं परन्तु तत्समय की दिल्ली की मिली-जुली तथा प्रसिद्ध भाषा ‘देहलवी हिन्दी’ ही थी। अनेक सदियों तक हिन्दुस्तान के विभिन्न भागों की जनता के परिवर्तनों के कारण अमीरखुसरो की हिन्दी रचना उनके समय की भाषा का स्पष्ट रूप सामने प्रस्तुत तो नहीं कर सकती परन्तु उपलब्ध हिन्दी भण्डार से उनकी देहलवी हिन्दी का एक अनुमान्य रूप हमारे मन-मानस में अंकित हो जाता है, फिर अवधी, हरियाणी तथा पंजाबी का प्रभाव परिलक्षित है। तत्पश्चात राजधानी में अपने वाली प्राप्य-अप्राप्य बोलियों के शब्द मिलते हैं। विदेशी भाषाओं में अरबी-फारसी तथा किसी सीमा तक तुर्की ‘देहलवी हिन्दी’ की सहायक है। जब अमीरखुसरो हिन्दू नारियों की भाषा में कुछ कहते हैं तो उनकी कविताओं में ‘ब्रजभाषा’ अधिक दिखाई देती है। सम्भव है कि उस समय दिल्ली तथा उसके आस-पास की हिन्दू नारियाँ ब्रजभाषा अथवा उससे मिलती-जुलती अन्य भाषा बोलती रही हों और फारसी से प्रभावित ‘खड़ीबोली’ हिन्दू घरों से बाहर बोली जाती रही हो।

अमीरखुसरो का समय उत्तरी हिन्दुस्तान के भाषायी इतिहास में विशेष महत्व का है। खड़ीबोली के पहले कवि अमीरखुसरो हैं। दक्षिणी खड़ी बोली के पहले गद्य लेखक ख्वाजा बन्दानवाज ‘गेसूदराज़’ हैं और उत्तरी हिन्दुस्तान की खड़ीबोली के पहले उर्दू गद्य लेखक उस्ताद इंशा अल्लाह खाँ ‘इंशा’ हैं। इस भाषा की संरक्षा अधिकतर मुसलमान लेखक करते रहे। खड़ीबोली के जन्म से ही इसकी लिपि फारसी थी। पहले यह अरबी लिपि में लिखी जाती थी। शाहजहाँ के समय से फारसी तथा उर्दू लिपि प्रचलित हुई और यही इस भाषा की लिपि बन गई। ‘खड़ीबोली’ कतिपय राजनैतिक भेदों के कारण डेढ़ सौ वर्ष पहले नागरी लिपि में लिखी गई और तब से ही इसमें संस्कृत के तत्सम शब्दों का प्रयोग प्रारम्भ हुआ तथा उत्तरोतर इसका वर्द्धन होता गया। खड़ीबोली में केवल फारसी शब्द ही नहीं आये हैं वरन् इस बोली की शैली भी फारसी ‘तुम’ (Tum), ‘खिदमत’ (Khid-mat), ‘तदवीर’ (Tadbeer) तथा ‘गीत’ (Geet) इत्यादि। तुर्की और फारसी बोलने वालों का जिन मार्गों से भारत में पदार्पण हुआ उनकी हर मंज़िल ‘खड़ीबोली’ की प्रगति का एक सोपान बना। ‘खड़ीबोली’ में दिल्ली की राजधानी में आने वाली बीसों बोलियों की धाराएँ तत्समरूप तथा तदभ्व शब्दों के साथ मिल रहीं थीं। ब्रजभाषी तथा पूर्वी आदि दिल्ली की इस भाषा को बिल्कुल ‘दोगली’ भाषा समझते होंगे, परन्तु नई-नई भाषाओं के स्त्रोत इस नव उत्पन्न भाषा को बहुत बल दे रहे थे और यह भारत की प्रत्येक भाषा से अधिक प्रगति कर रही थी। इसी भाषा को ‘देहलवी बोली’ कहा गया। अमीरखुसरो इसी भाषा को ‘देहलवी हिन्दी’ कहते थे।

अमीरखुसरो ने खड़ीबोली और अवधी का प्रयोग किया है यों बीच-बीच में भी ब्रज के भी कुछ रूप जैसे-सोवै, डारै, मेरो, भयो आदि हैं किन्तु इसका कारण यह है कि उस काल में हिन्दी की ये बोलियाँ पूर्णतः अलग-अलग नहीं थीं, उनमें एक दूसरे का काफ़ी मिश्रण था। मिश्रण के बावजूद यह बहुत स्पष्ट है कि पहेलियों, मुकरियों तथा दो-सखुनों की भाषा खड़ी-बोली है। ‘खालिकवारी’ में भी हिन्दी के जो रूप हैं, उनमें आंशिक खड़ीबोली के ही हैं, जैसे-कहिए, तू जान, रहिया (रहा का पुराना रूप), बैठरी तथा रात जो गई आदि। इसके विपरीत गीतों, कव्वालियों तथा दोहों की भाषा का मूलाधार अवधी या पूर्वी है यथा—
खड़ी बोली: एक थाल मोती से भरा
सबके सिर पर औंधा धरा
चारों ओर वह थाली फिरे
मोती उसमें एक न गिरे।

पूर्वी अवधी :
छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलायके
प्रेमभटी का मदवा पिलायके
मतवारी कर दीन्हीं रे मोसे नैना मिलायके।

‘ख़ालिकवारी’ की भाषा भी प्राचीन खड़ीबोली है, यद्यपि उसमें ब्रजभाषा का भी छौंक है और कहीं-कहीं ‘तोर’ जैसे पूर्वी रूप भी हैं। उसमें आए ‘कहिया’, ‘रहिया’, आदि  रूप प्राचीन खड़ीबोली के हैं। इन्ही रूपों का विकास आज कहा, रहा आदि रूपों में हुआ है—
कहिया कहया कहा
रहिया रहया रहा

खुसरो की अधिकांश हिन्दी रचनाएँ कई सौ वर्षों तक मौखिक परम्परा में ही रही हैं, अतः हर सदी ने अपनी सुविधानुसार उसकी भाषिक संरचना में परिवर्तन किए हैं। ऐसी स्थिति में यह तो कहा जा सकता है कि इन रचनाओं का कथ्य खुसरो का है लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि इन रचनाओं की भाषा खुसरो की है। उनके समय तक हिन्दी के इतने अधिक अनगढ़ हो जाने की बिल्कुल सम्भावना नहीं है। हर सदी ने उसे अपने अनुकूल परिवर्तित करते-करते यह रूप दे दिया है।9

अमीरखुसरो जिस भाषा में वार्ता करते होंगे उसका उदाहरण उनका निम्न ढकोसला है :
खीर पकाया जतन से, चर्खा दिया चला
कुत्ता आया खा गया, तू बैठी ढोल बजा

अमीरखुसरो के दोहे उस भाषा में हैं जो उनकी मातृभाषा तो नहीं है परन्तु उनके चारों तरफ बोली जाती थी।

अमीरखुसरो गीतों में कहीं मुसलमान दुल्हन की भाषा में मल्हार गाते हैं :
अम्माँ मेरे बाबा को भेजो जी-कि सावन आया

कहीं विष्णुभाव के गीतों में वह हिन्दू नारियों की बोली अलापते हैं जिसको ‘भाखा’ ही कहा जाएगा—
चुरियाँ फोरूँ - पलंग पर डारूँ

पहेलियों में अमीरखुसरो शिशुओं-बालकों की रूचिकर भाषा तक पहुँच जाते हैं। ‘भुट्टे’ की पहेली देखिए—
आगे आगे भेना आयी, पीछे-पीछे भैया
दाँत निकाले बाबा आये, बुर्का ओढ़े मैया

विषयानुसार अमीरखुसरो की पहेलियों की भाषा भी परिवर्तित होती रहती है। अमीरखुसरो की प्रसिद्ध ग़ज़ल ‘ज हाले मिस्कीं’ फ़ारसी तथा ‘भाखा’ के मिश्रित अलंकारादि में रची गई है, जो शुद्ध ‘देहलवी हिन्दी’ नहीं है। ठेठ फारसी तथा शुद्ध ‘भाखा’ के वाक्यों का मिश्रण देखिए—
ज हाले मिस्कीं मकुन तगाफुल
दुर आय नैनाँ बनाय बतियाँ
कि ताबे हिज्राँ नदारम् ऐ दिल
न ली हो फाहे लगाय छतियाँ

तत्समय की सबसे जानदार भाषा ‘देहलवी हिन्दी’ अथवा ‘खड़ीबोली’ थी जो धीरे-धीरे नगरों की सभ्य संस्कृति पर अपना अधिकार जमा चुकी थी। अमीरखुसरो ने अपने विचारों से इस भाषा को सजाने-सँवारने का पूर्ण प्रयास किया। परन्तु फ़ारसी के सामने इस भाषा को साहित्यक प्रतिष्ठा न मिल सकी। यह सत्य है कि खड़ीबोली उत्तरी भारत में सभ्य से सभ्य होती जा रही थी जबकि अमीरखुसरो के बाद कई सौ वर्षों तक खड़ीबोली का कोई उल्लेखनीय कवि नहीं हुआ।

अमीरखुसरो उस समय के काव्यकार हैं, जब हिन्दुस्तान में एक नई भाषा जन्म ले रही थी। उस भाषा के भविष्य पर अमीरखुसरो का पूर्ण विश्वास था और वह उस नव साहित्य की बडे़ प्रेम से सेवा कर रहे थे। उनकी हिन्दी कविता में एक तरफ चिन्तन एवं माधुर्यगान है तो दूसरी तरफ इसमें भाषा के नवनिर्माण का एक महान आन्दोलन भी चल रहा है। अमीरखुसरो का प्रत्येक प्रयास यह रहा है कि फ़ारसी तथा हिन्दी शब्द पानी तथा दूध की भाँति घुल-मिल जाएँ ताकि भविष्य की हिन्दी भाषा के लिए प्रगति का मार्ग तैयार हो सके। अमीरखुसरो की हिन्दी कविताओं में उनकी यह उचित चेष्टा अन्य कविताओं की तुलना में अधिक स्पष्ट है। उनकी पहेलियाँ आदि कविता के आनन्द के साथ-साथ शब्दकोश शिक्षा के पाठ हैं। कहीं-कहीं फ़ारसी कविता में भी वह अपनी मातृभाषा हिन्दी के शब्द तथा मुहावरे बड़ी विशेषता के साथ लिख देते हैं। उनका अभिप्राय बिल्कुल यही है कि इन दोनों भाषाओं को निकट से निकट लाया जाए। हिन्दी की ही भाँति फारसी में शब्दों की आन्तरिक एवं बाह्य जाँच-पड़ताल अमीरखुसरो का रुचिकर कार्य था। अमीरखुसरो अरबी, फारसी, तुर्की तथा संस्कृत के ज्ञाता थे तथा इन भाषाओं के शब्दों पर उन्हें पूर्णधिकार प्राप्त था। इसके अतिरिक्त हिन्दुस्तान की कतिपय प्रान्तीय भाषाएँ भी वह जानते थे। समग्रतः अमीरखुसरो की हिन्दी कविता काव्य की दृष्टि से भले ही उसमें उत्कृष्टता न हो, सांस्कृतिक और भाषा वैज्ञानिक अध्ययन के लिए उसका मूल्य अक्षुण्ण है।

डॉ. खुर्शीद अनवर
माँ और धरती माँ
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