साझी विरासत
मध्यकालीन दक्षिण एशिया की साझी परंपराएं

आई.एस.डी.

जब तुर्कों और मुगलों ने भारत (इसे पूरे भारतीय उपमहाद्वीप के रूप में पढ़ा जाए तो बेहतर होगा) को अपना घर बना लिया तो उन्होंने यहां ऐसी बहुत सारी नई चीजें भी फैला दीं जो उन्होंने फारसी, अरबी और तुर्की परंपराओं से सीखी थीं। आक्रमणकारी विजेताओं के रूप में आने वाले शासक यहां के देशी राजाओं और धार्मिक तौर-तरीकों से शुरुआत में एक तरह की दुश्मनी रखते थे। कई जगह उन्होंने मंदिरों को भी तोड़ा। मगर, एक बार पैर जमा लेने के बाद उन्होंने देशी राजे-रजवाड़ों और महंत/महात्माओं के साथ संबंध विकसित करने शुरू कर दिए। कुछ लोगों का मानना है कि सल्तनत या मुगल काल के राजाओं ने सिर्फ इस्लाम को बढ़ावा दिया और हिंदुओं को प्रताड़ित किया। यह बात कुछ शासकों के बारे में सही हो सकती हैं लेकिन अधिकांश मामलों में ऐसा नहीं रहा है। ये राजा यहां शासन करने आए थे। अगर कुछ इस्लामिक कानून उन्हें ज़्यादा कर वसूल करने से या ज़्यादा ताकत हथियाने से रोकते थे तो उन्होंने फौरन ऐसे कानूनों को भी रद्द करने में कोताही नहीं की। इतनी ही महत्वपूर्ण बात यह है कि उन राजाओं को जनता से राजस्व इकट्ठा करने और राजकाज चलाने के लिए हिंदू राजे-रजवाड़ों, व्यापारियों और जमींदारों की मदद भी चाहिए थी। अगर उन्हें टिकना था तो इन सभी समूहों से अच्छे संबंध विकसित करने के अलावा उनके पास और कोई चारा नहीं था। दूसरी तरफ हिंदू जमींदारों ने भी तुर्कों और मुगलों के शासन में अहम पद संभाले क्योंकि इसमें उन्हें भी अपना फायदा दिखाई देता था। तुर्क और मुगल इसलिए सत्ता कायम करने में कामयाब रहे क्योंकि उन्हें यहां के हिंदू जमींदारों से समर्थन और मदद मिल रही थी। इससे जमींदारों की ताक़त में भी इजाफा हुआ क्योंकि उन्हें तुर्कों की शक्तिशाली सेना का समर्थन हासिल था। धीरे-धीरे यही हिंदू जमींदार हिंदू परंपराओं के संरक्षक बन गए। मुगल राजाओं से अच्छे ताल्लुकात रखने वाले बहुत से राजपूत राजाओं को और भी ज़्यादा ताकत मिली क्योंकि उन्हें मुगल नौकरशाही में बड़े-बड़े पद दिए गए थे। उन्होंने बहुत सारे विशाल मंदिर बनवाए। मिसाल के तौर पर, जयपुर के कछवाहा राजाओं ने आमेर में बहुत सारे मंदिर बनवाए।

छोटी-छोटी रियासतों के बहुत सारे मुस्लिम राजाओं ने स्थानीय भाषाओं और संस्कृतियों को संरक्षण दिया। जैसे, रामायण और गीता का पहली बार बांग्ला भाषा में अनुवाद एक मुस्लिम शासक की देखरेख में ही करवाया गया था।

साझी संस्कृति का निर्माण
शासक शासन कर रहे थे। लेकिन शासकों के अलावा और भी बहुत तरह के लोग भारत आते रहते थे। इनमें बहुत सारे साधु, व्यापारी, विद्वान और सिपाही होते थे।

इस्लाम की दो शाखाएं रही हैं। एक शाखा कुरान और हदीस के कड़े सिद्धांतों पर आधारित है और दूसरी संतों, सूफियों और रहस्यवादियों की शाखा है। यहां आने वाले लोगों के लिए दूसरी शाखा ने पथप्रदर्शक का काम किया है। यहां बस जाने के बाद उनके सामने रोजी-रोटी का सवाल आता था। उन्हें भोजन और कपड़े की तलाश करनी पड़ती थी। उन्हें रहने के लिए घरों की दरकार थी। घर चलाने के लिए उन्हें शादी-ब्याह करने थे। उन्हें लोगों से ताल्लुक कायम करने होते थे। इन सारी चीजों ने मिलकर एक नई परंपरा को जन्म दिया। गाज़ीपुर या मुज़्ज़रफ़रपुर जैसे नाम उस युग की इसी भावना को इंगित करते हैं। जहां एक तरफ गाज़ी और मुज़्ज़फ़र जैसे शब्द अरबी मूल के रहे हैं वहीं दूसरी तरफ पुर संस्कृत का शब्द है। नई आहार शैलियां, नई इमारतें, नई भाषाएं और नई धार्मिक परंपराएं सामने आईं। दरअसल ज़्यादातर शासक इन बदलावों को समझने की स्थिति में नहीं थे। वे इन बदलावों को गहरे संदेह की नजर से देखते थे। उन्होंने कई बार ईशनिंदा के आरोप में मुसलमान या हिंदू धर्मोपदेशकों को दंडित भी किया। वे भारतीय मुसलमानों को नीची नजर से देखते थे। लेकिन आम लोगों की जरूरतों और दृष्टि से बनी लोकप्रिय संस्कृति को दबाना शासकों के वश की बात नहीं थी। इन बदलावों में से कुछ का हम नीचे जिक्र कर रहे हैं।

भोजन और पहनावा
हिंदुस्तानियों के भोजन में रोटी की अहमियत किसी से छिपी नहीं है। लेकिन यह तुर्की भाषा का शब्द है। इसका मतलब है कि भारतीय भोजन के सबसे लोकप्रिय हिस्से की जड़ें तुर्की परंपराओं में रही हैं। उत्तर भारत में जलेबी, कचौरी और आलू की सब्जी नाश्ते का एक बुनियादी हिस्सा है। जलेबी भी तुर्कों के साथ यहां आई। कचौरी प्राचीन भारतीयों की देन थी जबकि आलू यूरोपियों के साथ अमेरिका से यहां आया था। हलवा, समोसे और एक प्याली चाय के बिना हमारी शाम की बैठकें पूरी नहीं होतीं। मजे की बात यह है कि हलवा और समोसा भी तुर्कों से हमें मिले हैं। चाय की खोज चीनियों ने की थी। बाद में यही चाय अंग्रेजों के साथ भारत आ पहुंची। भारत में परांठे का आविष्कार भी तुर्कों ने किया। बिरयानी, कबाब और न जाने कितने मांसाहारी खाद्य पदार्थ भी इन्हीं बाहरी संस्कृतियों से यहां आए हैं।

आज जब कोई खूबसूरत लड़की सलवार शमीज़ और दुपट्टा पहने निकलती है तो दरअसल वह दो परंपराओं के मेल का प्रतिनिधित्व करती है। सलवार और शमीज़ तुर्क-फारसी परंपरा से निकले हैं जबकि दुपट्टा प्राचीन भारतीय परंपरा की देन रहा है।

लोकप्रिय धार्मिक परंपराएं
प्रत्येक इंसानी समुदाय में बहुत सारे ऐसे लोग होते हैं जो ‘जीवन क्या है’, ‘मौत के बाद क्या होता है?’, ‘अच्छा क्या है और बुरा क्या है?’ जैसे बड़े सवाल खड़े करते रहे हैं। इस तरह के आध्यात्मिक रुझान वाले लोग इन सवालों पर अपने-अपने जवाब भी दे जाते हैं। आमतौर पर ऐसे लोगों को मानने वालों का एक छोटा-मोटा समूह रहता है। लेकिन किसी समुदाय के इतिहास में कुछ ऐसे चरण आते हैं जब ये सवाल असंख्य लोगों के लिए बुनियादी सवाल बन जाते हैं। ऐसे ही मौकों पर नये धार्मिक आंदोलन सामने आते हैं। उत्तर भारतीय ब्राह्मणवादी परंपरा पहली सहस्राब्दी के बाद चतुर्वर्ण जातीय संरचना पर आधारित रही है। 10वीं शताब्दी के बाद विशाल भूखंडों में पहली बार खेती-बाड़ी शुरू की गई थी। इन जमीनों को प्रवासी जाट समुदायों ने हरा-भरा बनाया था। बहुत सारे इलाकों में सदियों से जंगलों में रहते आए लोग भी एक जगह टिक कर खेती-बाड़ी करने लगे थे। इन समुदायों में समानता की शक्तिशाली जनजातीय परंपराएं मौजूद थीं। इन नए उभरते किसान समूहों के साथ ही नई धार्मिक परंपराएं भी सामने आ रही थी। समानता का संदेश लेकर इसी समय इस्लाम भारत के दरवाजे पर दस्तक दे रहा था। देशी परंपराओं और इस्लाम के बीच इस आपसी लेन-देन ने ही इस दौरान धर्म के क्षेत्र में बेजोड़ प्रयोगों को जन्म दिया। यदि हम नानक, कबीर, रैदास, दादू आदि संतों के उपदेशों का अध्ययन करें तो उन सब में एक चीज समान दिखाई देती है। उन सभी ने मनुष्यों की समानता पर जोर दिया है। उनके उपदेशों का अध्ययन करने पर पता चलता है कि वे इस्लामिक परंपराओं से वाकिफ थे। सिख धर्म इनमें से सबसे ज्यादा स्थापित और सुज्ञात रहा है। सिखों की पवित्र पुस्तक गुरुग्रंथ साहिब में बाबा फरीद जैसे विख्यात मुस्लिम संतों के दोहों को देखा जा सकता है। कबीर जैसे संतों का हिंदू और मुसलमान, दोनों ही समुदाय के लोग समान भाव से आदर करते हैं। समानता पर यह जोर इस्लामिक परंपरा की देन दिखाई देता है। दूसरी तरफ इन संतों की वाणी में ईश्वर और भक्ति की अवधारणा छठी-सातवीं सदी के तमिलभाषी इलाकों की परंपराओं से उपजी दिखाई देती है। इसका मतलब है कि ये साधु संत दो पूर्ववर्ती परंपराओं के अनूठे मेल को आगे बढ़ा रहे थे। नए किसानों व मजबूत जनजातीय परंपराओं को इन संतों के उपदेश आकर्षक दिखाई देते थे इसलिए उन्होंने इन गुरुओं और संतों को फौरन अपना लिया। साझा संस्कृति की यही विरासत है जिसे सत्यनारायण कथा जैसी लोकप्रिय प्रार्थनाओं में देखा जा सकता है। यह कथा जितनी नारायण की कहानी से प्रेरित है उतनी ही पूर्वी बंगाल के सतिया पीर की कहानी से भी प्रभावित रही है।

यहां आने वाले मुसलमान संत भी भारत की देशी परंपराओं को समझने में गहरी दिलचस्पी रखते थे। मोइनुद्दीन चिश्ती या निजामुद्दीन औलिया इस्लाम और देशी धार्मिक परंपराओं के मेल से उपजे इस्लामिक संस्करण का प्रतिनिधित्व करते हैं। भारत के अलावा और कहीं भी किसी संत की समाधि पर पूजा-अर्चना की परंपरा इस्लाम के लिए अनजानी रही है। हिंदू पहले से ही संतों को दफनाने और उस स्थान पर मंदिर बनाने की परंपरा का पालन करते आ रहे थे। गैर-भारतीय इस्लाम के लिए अल्लाह की प्रशंसा में गीत-गाना एक अजूबी चीज रही है। हिंदुओं के पास ईश-वंदना के लिए गाने-बजाने की एक लंबी परंपरा रही है। कव्वाली गायन सूफी पूजा स्थलों से ही उपजी है। ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की अजमेर स्थित समाधि पर उनकी पुण्यतिथि (उर्स) के समय कव्वालियों का बहुत बड़ा आयोजन होता है। दिल्ली में निजामुद्दीन औलिया की दरगाह भी एक ऐसा ही बड़ा केंद्र है। कव्वालियां आमतौर पर उर्दू में गायी जाती हैं लेकिन उनके शब्द फारसी काव्य शास्त्र से ही निकले होते हैं।

कश्मीर जैसे स्थानों पर मुस्लिम संतों की सबसे शक्तिशाली परंपरा को ऋषि शृंखला के नाम से जाना जाता है। ऋषि संस्कृत का शब्द है। जब लोग इन संतों या ऋषियों के पास जाते थे तो इस भेंट से उन्हें एक आध्यात्मिक परिपूर्णता का आभास मिलता था। उनके लिए यह बात मायने नहीं रखती थी कि वह साधु हिंदू है या मुसलमान। इसीलिए गुरु नानक या निजामुद्दीन औलिया के अनुयायियों में तमाम धर्मों और समुदायों के लोग होते थे।

हसन और हुसैन की कुर्बानी पर निकलने वाले ताज़िये जुलूस भारत के बाहर और कहीं दिखाई नहीं देते। माना जाता है कि ये जुलूस रथयात्रा त्यौहारों की भारतीय परंपरा से उपजे हैं। मोहर्रम के ताज़िये और दिल्ली में रामलीला के लिए राम और रावण के पुतले, सभी मुसलमान कारीगर बनाते हैं। तेरूकुट्टु और कथक्कली जैसी तमिलनाडु और केरल की लोक एवं परंपरागत कलाओं में मुस्लिम संगीतकारों को उनके धर्म के आधार पर पहचानना मुश्किल हो जाता है। यही बात हरियाणा, राजस्थान व मध्य प्रदेश में स्वांग, ख्याल और नाच परंपराओं पर भी खरी उतरती है। इन सभी में मुसलमान गायकों, संगीतकारों, नर्तकों और अभिनेताओं की भरमार रहती है। लोक संगीत के क्षेत्र में राजस्थान की लंगा और मंगनीयार परंपरा का कोई सानी नहीं। लेकिन इन कलाकारों के रूप रंग, पहनावे या भाषा के आधार पर राजस्थान के बाकी हिंदू जनजातीय कलाकारों से उन्हें अलग कर पाना मुश्किल होता है।

भारतीय संगीत की शास्त्रीय परंपरा
भारतीय संगीत की शास्त्रीय परंपरा दुनिया को भारतीय सभ्यता द्वारा दिया गया सबसे रचनात्मक उपहार माना जा सकता है। यही परंपरा है जिसमें हमें हिंदू और मुस्लिम पहचानों का सबसे खूबसूरत मेल दिखाई देता है।

राग
सितार और तबले का आविष्कार अमीर खुसरो ने किया था।

सबसे लोकप्रिय शास्त्रीय गायन संगीत को खयाल कहा जाता है। गायन की यह विधा 16वीं सदी में अस्तित्व में आई थी। इससे पहले की शास्त्रीय गायन शैली को ध्रुपद शैली कहा जाता था। ध्रुपद परंपरा मुख्य रूप से ईश्वर की स्तुति के लिए इस्तेमाल होती थी। कुछ परिवारों ने गायन की इस परंपरा को आज भी जिंदा रखा हुआ है। अमीनुद्दीन डागर और मोइनुद्दीन डागर इस शैली के सबसे विख्यात गायक रहे हैं। शिव की उपासना में गाए गए उनके गीत सुनने वालों को अभिभूत कर देते हैं।

खयाल गायन परंपरा ध्रुपद और फारसी परंपरा के परस्पर मेल से उपजी है। फिलहाल खयाल गायन में कई घराने स्थापित हैं जिनकी शैलियां एक दूसरे से कुछ भिन्न मानी जाती हैं। ये घराने गुरु-शिष्य परंपरा की तर्ज पर काम करते हैं। इसीलिए ग्वालियर घराने के दो सबसे जाने-माने गायकों में एक पंडित कृष्णराव शंकर और दूसरे मुश्ताक हुसैन खान रहे हैं। जयपुर घराने में पंडित मल्लिकार्जुन मंसूर और रजब अली खान का कोई सानी नहीं रहा है।

शास्त्रीय संगीत शैलियों से उपजा सुगम शास्त्रीय संगीत भी इसी तरह के घालमेल को दर्शाता है। रसूलनबाई की कजरी, चैती और होरी (होली के गीत) का जोड़ ढूंढना मुश्किल है। जब भजनों की चर्चा आती है तो बड़े गुलाम अली खान द्वारा गाया गया ‘हरिओम तत्सत’ गीत अपनी अलग पहचान रखता है।

वाद्य संगीत के क्षेत्र में अलाउद्दीन खान का मेहर घराना सबसे बेजोड़ है। अलाउद्दीन खान को रामपुर के सेनिया घराने के उस्तादों से संगीत की दीक्षा मिली थी। सेनिया घराने का दावा है कि वे मियां तानसेन के वंशज हैं। बाद में अलाउद्दीन खान ने सितार वादन में पंडित रविशंकर को दीक्षा दी। जब आप रविशंकर का सितार या अली अकबर खान का सरोद वादन या हरिप्रसाद चौरसिया का बांसुरी वादन सुनते हैं तो वास्तव में सेनिया घराने की धुनों को ही सुन रहे होते हैं। हिंदू और मुसलमान गायक तकरीबन सभी घरानों में दिखाई देते हैं। इनके गीत आमतौर पर माँ सरस्वती की वंदना से शुरू होते हैं। अलाउद्दीन खान कृष्ण के भक्त थे। और बिस्मिलाह खान को भला कौन भूल सकता है। उनकी बजाई शहनाई की धुनें न जाने कितने हिंदू शादी-ब्याहों में गूंजती हैं।

मंचन परंपराएं
कथक-यह उत्तरी भारत की सबसे लोकप्रिय नृत्य विधा है। कथक शब्द ‘कथा’ यानी कहानी शब्द से निकला है। यह मुख्य रूप से एकल प्रदर्शन कला रही है। इस नृत्य शैली की एक अनूठी खासियत यह है कि अपने वाचन और विवरणात्मक टिप्पणियों के जरिए हर कलाकार दर्शकों के साथ एक आपसी संबंध कायम कर लेता है। न जाने कितनी सदियों से सदा सफर में रहने वाले भाट गांव-देहात के लोगों को मिथकीय कहानियों और नायकों के बारे में सुनाते चले आ रहे हैं। उनकी कथाएं अकसर महाभारत और रामायण जैसे महाकाव्यों से ली गई होती हैं। इसके अलावा वे पुराणों की कहानियां भी सुनाते हैं। पुराणों में मुख्य रूप से भगवान कृष्ण और वृंदावन में उनके कारनामों की कहानियां उन्हें पसंद आती हैं।

मध्यकाल में मुगलों के साथ यह नृत्य विधा दरबारों में भी लोकप्रिय हो उठी। चित्ताकर्षक वेशभूषा और आभूषणों से सजे नर्तक-नर्तकियां अपनी काव्यात्मक विवरणों के साथ राजाओं और नवाबों का मनोरंजन करते थे और पूरे परिवेश को सौंदर्य के सागर में सराबोर कर देते थे। इस प्रकार, कथक नृत्य हिंदू और मुस्लिम, दोनों संस्कृतियों के सौंदर्यात्मक आदर्शों के मिलन से बना है।

उन्नीसवीं सदी के मध्य में कथक वाजिद अली शाह के लखनउ दरबार में अपने वर्तमान रूप तक पहुंच चुका था। एक तरफ तो कृष्ण लीला के समावेश से इस नृत्य के उपासनात्मक आदर्श एक नए शिखर तक जा पहुंचे जिन्हें ठुमरी के साथ मंचित किया जाता था। दूसरी तरफ दरबार की अपनी साज-सज्जा और ऐश्वर्य के दम पर प्रस्तुति में भी नया सौंदर्य और नई जान आ गई थी। इसका नतीजा यह हुआ कि कथक हिंदू और मुस्लिम संस्कृतियों का सूक्ष्म मिश्रण बन गया। उसमें मूल हिंदू महाकाव्यों के साथ-साथ फारसी उर्दू काव्यों के विषयों का भी मंचन किया जाने लगा।

आधुनिक भारतीय रंगमंच परंपराएं
आधुनिक काल में रंगमंच को पुनर्जीवित करने का श्रेय आगा हसन अमानत को जाता है। 1856 में उन्होंने ही इंद्रसभा नाटक लिखा था और उसका मंचन किया। कई सदियों बाद इसी नाटक के साथ भारत में रंगमंच के बीज पड़े। कहा जाता है कि वाजिद अली शाह के लखनउ दरबार में मंचित होने वाला यह पहला नाटक था। उल्लेखनीय है कि वाजिद अली शाह खुद कवि, संगीतकार, कथक शैली के रचनाकार और रासलीला को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने वाले एक महान कलाप्रेमी थे। अमानत का संगीतीय नाटक काव्यात्मक शैली में लिखा गया था और यह शैली वाजिद अली शाह के दरबार में होने वाली रास लीला के मंचन से ही प्रेरित थी।

पारसी रंगमंच
आधुनिक भारतीय रंगमंच में पारसी रंगमंच आंदोलन का अपना एक वजूद रहा है। 1850 के दशक में शुरू हुए इस आंदोलन में भारतीय किस्से-कहानियों की रंगमंचीय प्रस्तुति के एक से एक अभिनव प्रयोग किए गए हैं। यह परंपरा 1930 के दशक तक फलती-फूलती रही और इसके बाद धीरे-धीरे भारतीय सिनेमा में विलीन हो गई। पारसी थियेटर के ही साये में बहुत सारे युवा मुस्लिम पटकथा लेखक सामने आए थे। रौनक, बेताब, रुसवा, हफीज़ अब्दुला तालिब, हुबाब, जरीफ, आराम, खुर्शीद और बहुत सारे दूसरे पटकथा लेखक एक से एक कामयाब नाटक रच रहे थे जो प्रायः पुराणों के किस्से-कहानियों और रामायण व महाभारत पर आधारित होते थे। आगा हश्र कश्मीरी पारसी थियेटर के सबसे विख्यात पटकथा लेखकों में रहे हैं। उनकी कृतियों में फिरदौसी के पारसी महाकाव्य शाहनामा पर आधारित रुस्तमो सोहराब से लेकर सूरदास के जीवन को प्रतिबिंबित करने वाले बिल्व मंगल तक एक से एक बेजोड़ नाटक शामिल थे। ये पटकथा लेखक फ्रांसीसी ओपेरा से काफी प्रभावित थे। लेकिन उनके पास नाट्य शास्त्र की भी प्रतियां मौजूद थी।

जब भारत में आवाज वाली फिल्में बनने लगी तो ज़्यादातर पारसी अभिनेता और अभिनेत्रियां फिल्मों में सक्रिय हो गए। भारतीय सिनेमा आंदोलन ने रामायण और महाभारत को केंद्र में रखते हुए विभिन्न भाषाओं में बहुत सारी फिल्में बनाईं और पारसी रंगमंच के बहुत सारे तत्वों का खूबसूरती से समावेश किया। प्राचीन काल में देवी-देवता, नायक-नायिकाएं किस तरह के कपड़े पहनते थे, इस बारे में हमारी सोच पूरी तरह इसी रंगमंच और सिनेमा आंदोलन से जन्मी है। यही परंपरा महाभारत और रामायण जैसे टेलीविजन सीरियलों में भी दिखायी देती है।

हबीब तनवीर जैसे पटकथा लेखक भी मंचन कलाओं की इसी परंपरा की नुमाइंदगी करते हैं। उनके नाटकों में कालिदास द्वारा रचित शकुंतला, विशाखदत्त के मुद्राराक्षस और भवभूति के उत्तर रामचरित जैसी संस्कृत महाकृतियां शामिल हैं। इसके अलावा उन्होंने आगरा बाजार और चरणदास चोर जैसे बेहद सफल नाटक भी लिखे हैं।

भाषा
विभिन्न स्रोतों से आयी चीजों का परस्पर मेल भारतीय परंपरा की विशेषता रही है। विविध संस्कृतियों के इस समागम का सबसे ज़ाहिर उदाहरण भाषाओं के क्षेत्र में दिखाई देता है। उदाहरण के लिए इस वाक्य को ही लीजिए—“मेरे चाचा रिटर्न कर रहे हैं।“ इस वाक्य में संस्कृत (मेरे), तुर्की (चाचा) और अंग्रेजी (रिटर्न), तीनों भाषाओं के शब्द हैं। बहुत सारी भारतीय भाषाओं की वाक्य संरचना ऐसी है कि उसमें विदेशी शब्दों को आसानी से समाहित किया जा सकता है। उत्तर भारतीय भाषाएं पिछले सात-आठ सौ सालों के विकास क्रम की उपज हैं। आज हम जिन शब्दों का इस्तेमाल करते हैं उनमें से बहुत सारे प्राचीन काल से भी प्रचलन में थे। मसलन, हमारी सबसे पवित्र नदी गंगा का नाम संस्कृत भाषा से नहीं आया है। यह लुप्त हो चुकी मुंदरी भाषा का शब्द था। यही स्थिति ‘चावल’ शब्द के साथ है। इन भाषाओं के विकास का सबसे महत्वपूर्ण चरण तेरहवीं शताब्दी के बाद आया। यह वही समय था जब तुर्क शासक उत्तर भारत की ओर बढ़े आ रहे थे। इन शासकों ने फारसी और अरबी भाषाओं को खूब बढ़ावा दिया। क्योंकि पारसी भाषा शासन की भाषा थी इसलिए यहां के लोगों ने भी जल्दी ही उसे इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। हैरत की बात नहीं है कि औरंगजेब के खिलाफ लड़ने वाले मराठों ने भी फारसी को ही शासन की भाषा बनाए रखा। इन्हीं भाषाओं के आपसी लेन-देन से हिंदी का जन्म हुआ। इस भाषा के सौंदर्य पर गर्व करने वाले अमीर खुसरो पहले नामचीन व्यक्ति थे। आज जो हिंदी हम बोलते हैं उसमें संस्कृत भाषा जैसी संरचना तो है लेकिन इसके शब्द भंडार में ब्रज, अवधी, भोजपुरी, अरबी और फारसी, सब भाषाओं के शब्दों का बेजोड़ मिश्रण मौजूद है। आइए अब अरबी से निकले कुछ शब्दों पर ध्यान दें।

अरबी से निकले शब्द
जब हम आदमी या इंसान शब्दों का प्रयोग करते हैं तो हम इस बात पर ध्यान नहीं देते कि ये कहां से आए हैं। ये अरबी भाषा के शब्द हैं। और इन मनुष्यों को अपनी अक्ल में इजाफे के लिए किताब पढ़नी चाहिए और कलम से लिखना चाहिए। इस तरह के मनुष्यों को इंसाफ के लिए लड़ना चाहिए और जालिमों के जुर्म को कभी बर्दाश्त नहीं करना चाहिए। हमें मोहब्बत को प्रोत्साहित करना चाहिए और अपना वादा कभी नहीं तोड़ना चाहिए। शराफत हमेशा जीतती है और गद्दारी हमेशा हारती है—सारी हिंदी फिल्मों का किस्सा बस इतना ही है।

वक्त और लहर इस दुनिया में किसी का इंतजार नहीं करते। मौत सबको आनी है और इसके लिए गम का कोई मतलब नहीं। दिल्ली की गर्मियों में साफ पानी के शर्बत के एक गिलास से बढ़कर कोई चीज नहीं। नहीं तो इंसान को दवा लेनी पड़ती है। इस मुल्क के अमीर गरीबों की फिक्र नहीं करते। हमारी सेहत के लिए सब्जी अच्छी चीज है। और खुले मैदान में घूमना भी सेहत के लिए अच्छा होता है।

फारसी से निकले शब्द
भगतसिंह की सरगर्मियों के बाद करोड़ों हिंदुस्तानी जब-तब इंकलाब जिंदाबाद का नारा लगाते रहे हैं। अब इस बात पर कोई ध्यान भी नहीं देता कि ये दोनों शब्द अरबी और फारसी भाषा से आए हैं। क्रांतिकारी एक ऐसे दिन का सपना देखते हैं जब जमीन उसी तरह हम सबकी होगी जिस तरह आसमान पर हम सबका हक है।

अपने घरों में हम अखबार पढ़ते हैं लेकिन हर साल कीमतें बढ़ती जा रही हैं। इसलिए गरीब आदमी की आमदनी ही उनका खर्चा है। वे कम से कम खाने लायक चीजें खरीद पाते हैं और इस वजह से बीमार पड़ रहे हैं। हमें अपनी सेहत का खयाल रखना चाहिए। गरीब लोग मुकम्मल कपड़े (लिबास, जामा, पाजामा, सलवार, शमीज़) भी नहीं खरीद पाते। झुग्गियों में खुले मैदान नहीं होते और साफ हवा नहीं मिलने से यहां पर बीमारियों का घर बन जाता है। बच्चे तो बहुत जल्दी-जल्दी बीमार पड़ने लगते हैं। इसीलिए उनके हालात खराब होते जा रहे हैं। लेकिन हमारे शासकों के पास गरीबों के दर्द को महसूस करने के लिए दिल ही नहीं है। अगर हम इकट्ठा हो जाएं और जुल्म की जंजीरों को तोड़ने के लिए अपनी ताकत लगा दें तो जमाना बदल जाएगा। हमें एक ऐसे समाज की दरकार है जो दोस्ती की बुनियाद पर खड़ा होगा। जहां चाह वहां राह। हमें ये सवाल अपने हाकिमों से भी पूछने चाहिए।

सिर्फ दौलत, नौकरी और किराया ही जिंदगी नहीं होते। अगर कोई सुबह-शाम इन्हीं सवालों पर सोचता रहे तो जिंदगी अपना जादू खो देगी। हमें अपने मुल्क के बारे में भी सोचना चाहिए।

डॉ. खुर्शीद अनवर
माँ और धरती माँ
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