साझी विरासत
लोकसाहित्य में धर्मनिरपेक्षता की परंपरा (आल्हा-ऊदल)

बाबूलाल दहिया

वर्तमान विकास की धारा ने जहां आदमी के शारीरिक श्रम को घटाया है वहीं उसने आदमी को मानसिक स्तर पर भी काफी एकाकी बना दिया है। आज प्रत्येक व्यक्ति बाज़ार से सारी सुख-सुविधाओं को पैसों के ज़रिए खरीद सकता है इसलिए वो दिन-रात पैसे एकत्र करने की धुन में रहता है। आज यदि हमें संगीत का आनंद लेना है तो उसे भी हम बाज़ार से खरीदकर अपने घर में ही टेपरिकॉर्डर, सीडी वगैरह लाकर सुन सकते हैं। परंतु इंटरनेट के द्वारा आज दुनिया इतनी सिमट गई है कि यदि ये आपके पास उपलब्ध है तो आपको इधर-उधर कहीं जाने या किसी से मिलने की जरूरत नहीं है। आप इंटरनेट पर ही सारे तरह के संगीत का आनंद ले सकते हैं। परन्तु विकास की इस दौड़ ने हमसे हमारी साझी विरासतों को छीन लिया है। ये साझी विरासतें हमें सिखाती थी मानवीय मूल्य, धर्मनिरपेक्षता, विविधता में एकता। साझी विरासतों का एक पक्ष हमारा लोकसंगीत (गायन) भी है। प्रत्येक क्षेत्र का लोकसंगीत वहां की जीवन शैली के अनुरूप ही रचा जाता है। लोक संगीत की कई विधाएं वहां के आम जनमानस में प्रचलित होती हैं। ये संगीत वहां की एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी से सुनकर सीख लेती है। जिसमें नई पीढ़ी के लिए संदेश भी होता है जिन्हें वे बिना किसी दबाव के ग्रहण करके अपने जीवन में उतारते जाते थे।

आल्हा गायकी भी इसी तरह बुन्देली गायन की एक लोक विधा है क्योंकि वीर छन्द आल्हा राशो के प्रथम रचनाकार जगनिक भाट बुन्देलखण्ड अंचल के टीकमगढ़ जिले में पैदा हुए थे। लगभग 600 वर्षों तक लोक कंठ में बसकर पीढ़ी-दर-पीढ़ी मुखर होने वाला यह वीर काव्य अन्य क्षेत्रीय बोलियों में भी अनुदित होता रहा। आज से 50-60 साल पहले राजा-सामंतों के दरबार से लेकर झोंपड़ी तक आल्हा के गीत की तान बुन्देलखण्ड, बघेलखण्ड के गांव-गांव में सुनाई पड़ती थी। सावन-भादों वर्षा की झड़ी के समय यह गीत चौपालों में अक्सर गाया जाता था। समाज में इसका इतना प्रभाव था कि उस समय अधिकांश लोग अपने लड़कों का नाम आल्हा राशो के पात्रों से जोड़कर ही आल्हा, ऊदल, इंदल, मलखान, लाखन तथा पृथ्वीराज आदि रखते थे।

बुन्देलखण्ड में जन्मे जगनिक भाट का आल्हा राशो इस तरह का जन इतिहास है, जो लगभग छः सौ वर्षों तक लोक कंठ में पीढ़ी दर पीढ़ी बसता अनेक बोलियों में अनूदित होता रहा। आल्हा राशो के मुख्य पात्र आल्हा, ऊदल, मलखान, ब्रह्म जैसे राजपूत आमत्य हैं तो राजपूत इतर, ढेबा ब्राह्मण, खुन खुन कोरी, धनुहा तेली, लला तामोली, मदन गडरिया, मन्ना गूजर और रूपना बारी आदि भी। उसमें एक पात्र ताल्हन सैयद है, जो बनारस के सरदार और आल्हा, ऊदल, मलखान के पिता दस्यराज बस्यराज के मित्र भी हैं। इसलिये वे आल्हा, ऊदल, मलखान के पिता तुल्य चाचा तथा संरक्षक भी हैं। तभी तो जगनिक भाट बार-बार ऊदल के मुंह से यह बात कहलवाता रहता है कि :

चाचा, चाचा कहि गोहरायो, चाचा मोरे तलंसी राय।
बारे मर गये बाप हमारे, गोद तुम्हारी गये बैठाय।।

जिसका उत्तर ताल्हन सैयद यह कहकर देते हैं कि :

जहां पसीना गिरे आल्हा का, सैयद दे हैं खून बहाय।

फिर चाहे नैनागढ़, पथरीगढ़, माड़ौ अथवा बामन लड़ाइयों का कोई भी गढ़ हो, हर युद्ध में ताल्हन सैयद अपने सातों बेटों के साथ मौजूद हैं। जहां कहीं किसी राजा के सैन्यबल का भेद लेना हो या उन राजकुमारियों को सांत्वना देना हो जो अपने तोते को दूत बनाकर राजकुमारों की वीरता से मुग्ध होकर यह संदेशा भिजवा चुकी हैं कि ‘या तो ब्याह होय महुबे में या जीवन भर रहों कुमारि’, वहां भी सैयद आल्हा ऊदल, मलखान, ढेवा आदि के साथ जोगी के भेष में मौजूद हैं और वरिष्ठ होने के कारण जोगियों के महंत भी हैं। कुछ जगह तो राजकुमारियां जब उनको गंगा की सौगंध खिलाती हैं कि वे उन्हें ब्याहने आयेंगे तो गंगाजल उठाकर ताल्हन सैयद ही उस राजकुमार की ओर से उनसे वायदा करते हैं कि उन्हें वे ब्याहकर अवश्य महोबा ले जाएंगे।

बाकी राशो ग्रन्थों के रचनाकार अपने नायकों को सूर्यवंशी, चन्द्रवंशी, अग्निवंशी आदि श्रेष्ठ कुल का सिद्ध करके उसे महिमा मंडित करते हैं, इसके विपरीत जगनिक भाट बार-बार अपने नायकों को ‘ओछी जाति बनाफर राय’ कहता है। ओछी जाति के होने के कारण न तो श्रेष्ठ कुल के राजपूत उनके साथ चल सकते हैं और न ही कोई राजा अपनी लड़की को खुशी से ब्याह सकता। यह अलग बात है कि कोई राजकुमारी उनकी वीरता से मुग्ध होकर उन्हें मन ही मन वरण कर ले, पर जब ब्याहने जाएंगे तो श्रेष्ठ कुल के क्षत्रिय तो जाने से रहे, उनके साथ खुन खुन कोरी, धनुहा तेली, मदन गड़रिया, मन्ना गूजर जैसे गैर क्षत्रीय ही बाराती होंगे। ढेबा ब्राह्मण जैसे पंडित होंगे जिनके मुंह में वेदमंत्र और बगल में ढाल तलवार बंधी होगी। रूपन बारी जैसे नाई-बारी होंगे जो विवाह की रस्म भी अदा करते जाएं और क्रोध से जला-भुना राजकुमार अपनी बहन की ओछी जाति के साथ ब्याह होता देख यदि तलवार खींच ले तो अपने तथा साथी दूल्हे की रक्षा भी कर सकें।

विवाह में एक रस्म होती है समधि से समधि की भेंट, आल्हा, ऊदल और मलखान के पिता उनके बाल्यावस्था में ही वीरगति प्राप्त कर चुके थे। चन्देल राजा परिमर्दिदेव के लिये यह अपमान की बात थी कि अपने आमत्य के विवाह में समधि बन कर खड़े हों, पर सिर में राजपूती पगड़ी बांध वर पक्ष के समधि की भूमिका के लिए सैयद हर विवाह में मौजूद हैं क्योंकि सलाहकार, संरक्षक और पिता की भूमिका अदा करने वाला ताल्हन सैयद की तरह दूसरा है ही कौन?

आल्हा एक वीर काव्य है, जिसमें अन्य काव्य ग्रन्थों की तरह कल्पना तत्व का होना स्वाभाविक था। उसने समाज को अनेक प्रकार के अन्ध-विश्वास भी दिये, पर इसके बावजूद भी उसमें धर्मनिरपेक्षता के तत्व मौजूद हैं, जिसके आदर्श पात्र ‘ताल्हन सैयद’ हैं। आज जिस तरह देश में सांप्रदायिक शक्तियां सिर उठा रही हैं, हमारी साझी विरासतें जो हमें सदियों से भाईचारे व एकता के सूत्र में बांधती आई हैं उन्हें जिस प्रकार चिन्हित कर के चुन-चुन कर नष्ट किया जा रहा है तथा कुछ राज्यों में तो उन विघटनकारी शक्तियों को सरकारी संरक्षण भी मिल रहा है, ये गहन चिन्ता की बात है। इसलिए समय की आवश्यकता है कि ऐसे ग्रन्थों का पुनः अनुशीलन हो जो समाज को तोड़ने के बजाय जोड़ने का काम करते हों। कहना न होगा कि जगनिक का आल्हा राशो ऐसा ही ग्रन्थ है और उसके आदर्श पात्र ताल्हन सैयद कुछ इसी तरह के पात्र हैं जो हमारे आज के लोकतंत्रीय धर्मनिरपेक्ष समाज के लिये अत्यन्त उपयोगी हैं। आल्हा ऊदल का ताल्हन सैयद बुंदेलखण्ड, बघेलखण्ड लोक साहित्य में धर्मनिरपेक्षता की परम्परा को सुदृढ़ करता नज़र आता है।

डॉ. खुर्शीद अनवर
माँ और धरती माँ
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