कविताएं
  इलाहाबादी अवधी मा कहिन

डॉ. खुर्शीद अनवर

नाचएं भांड नाचावयें गुनी जन
लीला देखए सबहूँ सज्जन
राम पियारे भजन लला के
चढ़ चढ़ गावैं नाचय तन मन
जुम्मन कबहूँ जुम्मा न पढिहें
मगर मसीद की खातिर लडिहें
अऊर भांड किताबन वाले
गुनी जनन का सजदा करिहें
लिखिहें सेना तुरत बुलाओ
जंगल जंगल छापा मारव
बम्बू, डंडा, गोली लई के
आतंकी के सबय घुसाओ
ससुरे जंगल कब्जा कई के
सदियन से इयाहाँ हैं पसरे
छाँट लेव पिछवाडा इनका
नाप लेव सब तिनका तिनका
देखव एक्को भाग न पावय
तबहीं हमरा जियरा जुड़ावय
अऊर भांड है सांड से मोटके
रूपया पईसा जेब मा धर के
बईठे है गुजरात मा जम के
कह्यें नरेन्दर भाई अइहें
खूब तरक्की हमरी करिहें
इनके पीछे सब्बै चलिहें
अऊरो भांड हैं देखैं लुक के
कुदिहैं मगर बस मऊका तक के

डॉ. खुर्शीद अनवर
माँ और धरती माँ
लेबल
© 2011 INSTITUTE for SOCIAL DEMOCRACY. ALL RIGHT RESERVED. Powered by: Datapings
Post on Facebook Facebook