कविताएं
दामिनी के नाम

डॉ. खुर्शीद अनवर

यह देवी है तो पत्थर है यह इंसां है तो एक शय है
इसे पूजो अगर बुत है इसे नोचो जो यह शय है
यह बस एक जिस्म है और कुछ नहीं है
कोई बेटी किसी की माँ नहीं है
यह सब बातें पुरानी हो चुकी हैं
फ़साना हैं कहानी हो चुकी है
सजाओ सेज पर और फिर जला दो
बुझाओ प्यास फिर हस्ती मिटा दो

यह खेती है तुम्हारी और क्या है
निकालो हल इसे अब जोत डालो
उठो और इसको अब पैमाल कर दो
यह धरती अब किसी की माँ नहीं है
यह औरत है कि इसमें जां नहीं है
यह बस सेजों कि शय है क्यों झिझकना
यह औरत है तो कैसी शर्म करना
यह मरियम है तो क्या औरत ही तो है
यह सीता है तो क्या औरत ही तो है
इसी का नाम ही तो दामिनी है
बढ़ो आगे बढ़ो बस जिस्म है यह

डॉ. खुर्शीद अनवर
माँ और धरती माँ
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