जन संघर्ष
काशीपुर में सरकारी दमन

देबरंजन सारंगी, रबिशंकर प्रधान, सरोज मोहंती

पिछले 12 सालों के संघर्ष में उड़ीसा के काशीपुर आंदोलन ने जो कई सवाल खड़े किए हैं उनमें से एक ‘विकास’ से संबंधित है। इस आंदोलन ने प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण, जनजातीय समाज और संस्कृति पर राज्य एवं बाजार के हमले, और हाल ही में, लोगों के प्रति राज्य के अन्यायपूर्ण व्यवहार को देखने की एक नई नजर दी है। 16 दिसंबर 2000 को मैकांच में पुलिस ने तीन निहत्थे लोगों को गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया और कई को बुरी तरह घायल कर दिया। इन हमलों के बावजूद लोग अपना संघर्ष जारी रखे हुए हैं। राज्य ने एक बार फिर तमाम लोकतांत्रिक कायदे-कानूनों को धता बताते हुए आंदोलनकारियों पर निर्मम दमन का सिलसिला शुरू कर दिया है। यह सारी कवायद बॉक्साइट खनन और प्रसंस्करण के क्षेत्र में सक्रिय दो औद्योगिक घरानों को फायदा पहुंचाने के लिए की जा रही है। इनमें से एक भारत की हिंडाल्को कंपनी है और दूसरी कनाडा की अल्कान। ये दोनों कंपनियां उत्कल एल्यूमिना इंटरनेशनल (यूएआईएल) के नाम से एक संयुक्त उद्यम के रूप में काम कर रही हैं और उड़ीसा के दक्षिणी भाग में एक बॉक्साइट खान और एल्यूमिना संयंत्र लगाना चाहती हैं।

पृष्ठभूमि
16 दिसंबर 2000 को मैकांच में हुई पुलिस गोलीबारी के बाद उड़ीसा सरकार ने न्यायमूर्ति पी. के. मिश्रा की अध्यक्षता में एक जांच आयोग का गठन किया था। जनवरी 2004 में मिश्रा आयोग ने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी। जांच रिपोर्ट में पुलिस और जिला प्रशासन की जमकर आलोचना की गई थी। आयोग ने पुलिस फायरिंग के लिए रायगड़ा के तत्कालीन पुलिस अधीक्षक जसवंत जेठवा (फिलहाल मयूरभंज में तैनात), पुसिल उपाधीक्षक के. एन. पटनायक, काशीपुर पुसिल थाने के प्रभारी प्रभाशंकर नायक, पुलिस अधिकारी सुभाष स्वेन, और काशीपुर के बीडीओ गोलकनाथ बडजेना को प्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार ठहराया था। दूसरी तरफ आयोग ने अपनी जांच के दायरे से बाहर जाते हुए इस बात पर भी ज़ोर दिया था कि काशीपुर जैसे पिछड़े खेतिहर इलाके में बॉक्साइट खनन और एल्यूमिना संयंत्र की जरूरत है (और ज्यादा जानकारी के लिए पीयूसीएल की भुबनेश्वर इकाई द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट को देखा जा सकता है)। उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने दोषी पुलिसकर्मियों और प्रशासकीय अधिकारियों पर कार्रवाई करने की बजाय धमकी दी कि ”इस उद्योग का विरोध करने वाली ताकतों के साथ सख्ती से निपटा जाएगा।“

यूएआईएल में हिंडाल्को का हिस्सा 55 प्रतिशत और अल्कान का 45 प्रतिशत है। इससे पहले टाटा, हाइड्रो (नॉर्वे) और अल्कोवा (अमेरिका) भी इस संयुक्त उद्यम का हिस्सा थे मगर बाद में स्थानीय आंदोलन के दबाव में उन्होंने इस उद्यम से हाथ खींच लिया। यूएआईएल परियोजना की लागत 4500 करोड़ रुपए आने वाली है। यह पूरी तरह निर्यातोन्मुखी परियोजना होगी। इस परियोजना के लिए मैकांच के पास स्थित बाफलीमली इलाके में बॉक्साइट की खुदाई की जाएगी। इस इलाके में बॉक्साइट के 19.5 करोड़ टन भंडार बताए जाते हैं। परियोजना के तहत कूचीपदर के पास एक रिफाइनरी भी लगाई जाएगी। यूएआईएल की परियोजना रिपोर्ट के मुताबिक एल्यूमिना संयंत्र की क्षमता सालाना 10 लाख टन एल्यूमिना उत्पादन की होगी जिसे कुछ सालों में 30 लाख टन सालाना तक बढ़ा दिया जाएगा। यदि किसी संयंत्र की उत्पादन क्षमता 30 लाख टन एल्यूमिना प्रतिवर्ष है तो उसे हर साल 90 लाख टन बॉक्साइट की जरूरत पड़ेगी। इसका मतलब यह है कि बाफलीमली इलाके में मौजूद बॉक्साइट के सारे भंडार 22-23 साल के भीतर खत्म हो जाएंगे।

उड़ीसा में यूएआईएल के अलावा कम से कम पांच बॉक्साइट खनन और एल्यूमिना परियोजनाओं पर काम चल रहा है। ये परियोजनाएं तीन जिलों के पांच ब्लॉकों - काशीपुर (जिला रायगड़ा), लक्ष्मीपुर और दसमंतपुर (जिला कोरापुट), लांजीगड़ा और थुआमूलरम्पुर (कालाहांडी) में केंद्रित हैं। स्टरलाइट ने काशीपुर ब्लॉक के ससुबोहूमली में बॉक्साइट की खुदाई का प्रस्ताव रखा है। लार्सन एंड टूब्रो काशीपुर ब्लॉक में सीजीमली और कुतरूमली से जबकि बिरला उद्योग समूह लक्ष्मीपुर ब्लॉक के कोडिंगामली इलाके से बॉक्साइट की खुदाई करना चाहता है। इनके अलावा वेदांता समूह भी है जो कालाहांडी जिले में स्थित न्यामगिरी और खंडुअलमली के इलाके में बॉक्साइट की खुदाई करेगा। दक्षिणी उड़ीसा के इन तीनों जिलों में बॉक्साइट के विशाल भंडार मौजूद हैं। यहां 100 करोड़ टन से ज्यादा बॉक्साइट होने का अनुमान व्यक्त किया गया है। इस पूरे घटनाक्रम के पीछे सबसे दुखद बात यह है कि यह सारी बॉक्साइट अगले 20-25 साल के भीतर खत्म हो जाएगी। बॉक्साइट के इस दोहन से यहां के लोगों पर बहुत बुरा असर पड़ेगा। बॉक्साइट ही वह पदार्थ है जिसकी वजह से आसपास की पहाड़ियों से निकलने वाली इंदरावती, बांसधारा और नागबली जैसी नदियां बारहों महीने भरी रहती हैं। इन नदियों की ही बदौलत यहां के लोगों को पूरे साल पानी की कमी नहीं होती।

यूएआईएल परियोजना में 1400 लोगों को रोजगार मिलेगा। इनमें 400 पद गैर-तकनीकी किस्म के भी हैं। ये पद स्थानीय लोगों को भी दिए जा सकते हैं। मगर यह अकेली परियोजना आसपास के 82 गांवों के 20,000 लोगों की जिंदगी तबाह कर देगी (यूएआईएल का कहना है कि इस परियोजना से केवल 24 गांवों के लोग प्रभावित होंगे)। यूएआईएल की मुख्य हिस्सेदार हिंडाल्को कंपनी आदित्य बिरला उद्योग समूह का हिस्सा है। हिंडाल्को के निदेशक ने मुंबई में कहा था, ”एल्युमीनियम इस कंपनी का मुख्य कारोबार रहा है इसलिए उत्कल परियोजना के मामले में किसी तरह का समझौता नहीं किया जाएगा।“ काशीपुर में यह एकमात्र परियोजना नहीं है। आदित्य बिरला समूह सम्भलपुर के पास भी एक एल्युमीनियम प्लांट लगाना चाहता है। इस संयंत्र के लिए कोडिंगामली में बॉक्साइट की खुदाई की जाएगी। यही उद्योग-समूह कोरापुट में काशीपुर के पास स्थित लक्ष्मीपुर ब्लॉक में भी एक एल्युमिना संयंत्र लगाना चाहता है। इसी प्रकार आदित्य एल्युमिना नामक कंपनी सम्भलपुर के पास एल्युमीनियम उत्पादन संयंत्र लगाना चाहती है। जब स्थानीय लोगों ने आदित्य एल्युमिना कंपनी के प्रस्ताव का विरोध किया तो उन्हें तरह-तरह से परेशान किया जाने लगा। यह घटना तब घटी जब राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड 18 जनवरी 2005 को भारी पुलिस घेरे में सम्भलपुर जिले में प्रस्तावित आदित्य बिरला उद्योग समूह की परियोजना के खिलाफ जनसुनवाई चला रहा था।

वेदांता ब्रिटेन की कंपनी है। वेदांता कंपनी ने अप्रैल 2004 से तमाम कानूनों को ताक पर रखकर कालाहांडी जिले में लांजीगड़ा (काशीपुर के पास) में जबरन अपना काम शुरू कर दिया है। जब 2002 में यहां इस परियोजना की शुरुआत हुई थी तो लांजीगड़ा के लोगों ने न्यामगिरी सुरक्षा समिति के बैनर तले आंदोलन छेड़ दिया था। वेदांता की इस प्रस्तावित परियोजना में लगभग 4000 करोड़ रुपए का निवेश किया जाएगा। इस परियोजना के लिए न्यामगिरी पहाड़ियों से बॉक्साइट निकाली जाएगी और लांजीगड़ा में 10 लाख टन क्षमता वाला एक एल्युमिना संयंत्र स्थापित किया जाएगा। यह संयंत्र न्यामगिरी पहाड़ियों में उपलब्ध बॉक्साइट के भंडारों (7.5 करोड़ टन) को महज 25 साल में खत्म कर देगा। जब स्थानीय लोगों ने परियोजना का विरोध किया तो राज्य सशस्त्रा पुलिस ने दो बार उनके साथ बुरी तरह मारपीट की। अप्रैल 2004 में बहुत सारे कार्यकर्ताओं को झूठे मुकदमों के फंसा कर तकरीबन दो माह जेल में रखा गया। जिस समय आंदोलनकारी जेल में थे उसी समय वेदांता ने जिला प्रशासन और पुलिस की मदद से कानूनों को ताक पर रखते हुए अपना काम शुरू कर दिया। कंपनी ने वन संरक्षण अधिनियम 1980 के प्रावधानों का जमकर उल्लंघन किया। इस अधिनियम में उच्चतम अधिकारी से उचित अनुमति लिये बिना आरक्षित वन में प्रवेश को निषिद्ध घोषित किया गया है। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित की गई केंद्रीय उच्चस्तरीय समिति (सीईसी) ने भी वेदांता की करतूतों के लिए उसको कड़ी फटकार लगाई थी।

इस बीच बी.जे.पी. भाजपा के मुख्यमंत्री ने कई बहुराष्ट्रीय खनन कंपनियों के साथ 10 बॉक्साइट परियोजनाओं और 15 लौह परियोजनाओं पर अपनी मंजूरी दे दी है। इन कंपनियों में रियो टिंटो, बीएचपी बिलिटन, और दक्षिण कोरिया की पोस्को आदि बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियां शामिल हैं। इन परियोजनाओं के जरिए उड़ीसा में 2,50,000 करोड़ रुपए का निवेश होगा और राज्य के 10 लाख से ज्यादा लोग विस्थापित होंगे (उड़ीसा सरकार के अनुसार भी इन परियोजनाओं के कारण विस्थापित होने वालों की संख्या कम से कम 2.5 लाख जरूर रहेगी)। मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने नवंबर 2004 में कहा था कि उड़ीसा के औद्योगिकरण और प्रगति की राह में किसी को भी रोड़े अटकाने की इजाजत नहीं दी जाएगी। उनकी तमाम कार्रवाइयां उनके इस बयान की तस्दीक करती है। दिसंबर 2004 में काशीपुर में हुआ दमन उनके इस ऐलान के बाद ही हुआ था।

दमन का दूसरा दौर
1 दिसंबर 2004 को रायगड़ा के जिला कलेक्टर प्रमोद कुमार मेहरदा, पुलिस अधीक्षक संजय कुमार और टिकरी पुलिस थाने के प्रभारी किशोर चंद्र मुंड पुलिस की लगभग 10 पलटनें लेकर करोल (कूचीपदर के पास) पहुंचे और वहां उन्होंने एक पुलिस चौकी व बैरक तैनात कर दी। पुलिस चौकी और बैरक की स्थापना के खिलाफ तकरीबन 300-400 लोग सड़क पर आकर बैठ गए क्योंकि पुलिस की यह कार्रवाई बॉक्साइट खनन और एल्युमिना संयंत्र के खिलाफ उनके आंदोलन को कुचलने की कोशिशों का हिस्सा थी। हालांकि खुद कलेक्टर वहां मौजूद थे मगर उन्होंने लोगों से बात करने की जरूरत नहीं समझी। इसकी बजाय पुलिस अधिकारियों ने आकर ऊंची आवाज में ऐलान कर दिया कि ‘‘.... औरतों यहां से हट जाओ, सड़क साफ कर दो वर्ना हम तुम्हारी इज्जत लूट लेंगे।“ प्रदर्शनकारियों में शामिल बड़ी-बूढ़ी औरतें फौरन सामने आ गईं और उन्होंने लड़कियों व कम उम्र महिलाओं को पीछे भेज दिया। इसके बाद 11 बूढ़ी औरतों ने अपने कपड़े उतार फेंके और पुलिस को चुनौती दी, ”आओ, लूटो हमारी इज्जत। फिर भी न तो हम अपनी जमीन छोड़ेंगे और न चुपचाप घर वापस जाएंगे।“ इसके बाद पुलिस के जवानों ने तीन बार हवाई गोलियां चलाईं और देखते-देखते वह प्रदर्शनकारियों पर लाठियां बरसाने लगे। इस लाठीचार्ज में दो महिलाओं सहित 6 लोग बुरी तरह घायल हो गए। पुलिस सभी घायलों को थाने में ले गई और बाद में उन्हें जेल भेज दिया गया।

2 दिसंबर 2004 को रायगड़ा में नक्सलवाद विरोधी कार्रवाइयों के लिए तैनात केंद्रीय आरक्षी बल (सीआरपीएफ) की बटालियनों को यहां तैनात कर दिया गया। सीआरपीएफ के जवान रायगड़ा से टिकरी तक (60 किलोमीटर) पैदल मार्च करते हुए आए। इन जवानों को रफकाना से टिकरी तक के पूरे रास्ते (30 किलोमीटर) पर तैनात कर दिया गया। पूरे इलाके में भारतीय आरक्षी बटालियन और उड़ीसा राज्य सशस्त्रा बल के जवानों को भी तैनात कर दिया गया। कूचीपदर की तरफ आने वाले तमाम रास्तों पर सीआरपीएफ की टुकड़ियां तैनात कर दी गईं। सीआरपीएफ के जवान पूरे इलाके में दहशत का माहौल पैदा करने के लिए मुख्य सड़क तथा गांवों में फ्लैग मार्च निकालने लगे। लोगों को डराने-धमकाने के लिए उन्होंने कई बार गांवों में छापे भी मारे। 6 दिसंबर की रात को तकरीबन 100 सशस्त्रा जवानों ने बघरीझोला गांव पर छापा मारा और गांव भर के मर्दों को खूब दौड़ाया। कुछ दिनों बाद सिरीगुड़ा, दिमुंडी आदि गांवों के साथ भी यही सुलूक हुआ।

पिछले दो माह से पुलिस की 8-10 पलटनें स्थायी रूप से टिकरी पुलिस स्टेशन (कूचीपदर से 11 किलोमीटर) में तैनात रही हैं। काशीपुर के ब्लॉक विकास अधिकार (बीडीओ) और तहसीलदार का असली काम वैसे तो ब्लॉक के विकास कार्यों पर नजर रखना और ब्लॉक के ज़मीन संबंधी मामलों का निपटारा करना ही है मगर अब ये अफसर भी फायरिंग का आदेश देने के लिए मजिस्ट्रेट के आदेश से पुलिस थाने में ही तैनात कर दिए गए हैं। पुलिस की दो अतिरिक्त पलटनें करोल-कूचीपदर (यूएआईएल के प्रस्तावित एल्युमिना संयंत्र क्षेत्र के बेहद पास) में नवनिर्मित पुलिस चौकी और बैरक में तैनात हैं। एक पुलिस चौकी मैकांच (यूएआईएल की बॉक्साइट खनन पहाड़ी, बाफलीमली में दाखिल होने का बिंदु) में भी खोल दी गई है। वहां भी पुलिस की एक पलटन तैनात है। इन पुलिस चौकियों में तैनात जवान काशीपुर, लक्ष्मीपुर और दसमंतपुर ब्लॉक की साप्ताहिक हाटों में जाते हैं और लोगों के साथ मारपीट और ज़ोर-जबर्दस्ती करते हैं। ये जवान सड़क पर गुजरने वाले तमाम वाहनों की तलाशी लेते हैं और स्थानीय कार्यकर्ताओं को परेशान करते हैं। अब इन सशस्त्रा बलों की भूमिका लोगों को परेशान करने, उन्हें डराने-धमकाने, लोगों को रातोंरात उठा लेने, साप्ताहिक बाज़ारों में तोड़-फोड़ करने, गांवों में फ्लैग-मार्च करने, औरतों के साथ बदसलूकी करने और लोगों के साथ मारपीट तक सीमित होकर रह गई है।

अब तक काशीपुर और लक्ष्मीपुर ब्लॉक के 18 कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया जा चुका है। इनमें से 15 कार्यकर्ताओं को दिसंबर में केवल चार दिन बाद हिरासत में ले लिया गया था। अब तक सिर्फ एक बूढ़ी महिला और एक आदमी को जमानत मिली है। पुलिस चौकियों और बैरकों की स्थापना के बाद कंपनी के अधिकारी प्रशासन की मदद से उस सरकारी सड़क को चौड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं जो संयंत्र और खनन क्षेत्र को एक दूसरे से जोड़ती है। 4 जनवरी 2005 को पुलिस और सरकारी अधिकारी 40 गाड़ियों में सवार होकर रात के समय इस इलाके में पहुंचे और अगले दिन यूएआईएल ने सड़क को चौड़ा करने का अपना काम शुरू कर दिया। हालांकि पूरा नज़ारा रोंगटे खड़े कर देने वाला था मगर स्थानीय लोग इस काम को रोकने के लिए 5 दिन तक (6-10 जनवरी) लगातार सड़क पर बैठे रहे। वक्ती तौर पर ही सही, उनका संघर्ष रंग लाया है। फिलहाल सड़क को चौड़ा करने का काम रुक गया है। जो लोग खनन गतिविधियों के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं उन्हें ‘समाजविरोधी’ ‘राष्ट्र विरोधी’ ‘विकास विरोधी’ और ‘चरमपंथी’ कहा जा रहा है।

काशीपुर और लांजीगड़ा में खनन विरोधी संघर्ष स्थानीय लोगों के जीवन और आजीविका की सुरक्षा की एक कोशिश है। मगर इससे भी अहम बात यह है कि ये संघर्ष बहुराष्ट्रीय कंपनियों और बड़े औद्योगिक घरानों द्वारा की जा रही प्राकृतिक संसाधनों की लूट-खसोट और तबाही के भी खिलाफ हैं। यह एक ऐसा संघर्ष है जो असंख्य लोगों की दरिद्रता के बदले कुछ लोगों की संपन्नता पर सवाल खड़ा कर रहा है, मुट्ठी भर लोगों के मुनाफे के लिए बहुत सारे लोगों के संसाधनों की लूट-खसोट का विरोध कर रहा है। उड़ीसा के लोग अपने लिए और आने वाली पुश्तों के लिए गैर-पुनर्नवीकृत प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा का संघर्ष लड़ रहे हैं। इस बिंदु पर सभी समान सोच वाले राजनीतिक समूहों, संगठनों और व्यक्तियों से आह्नान किया जाता है कि वह इस सरकारी दमन के खिलाफ आवाज उठाएं और राज्य के प्राकृतिक संसाधनों के स्वार्थपूर्ण दोहन पर केंद्रित ऐसी तमाम परियोजनाओं को रद्द करने की लड़ाई में अपना योगदान दें।
इकॉनॉमिक एण्ड पोलिटिकल वीकली से साभार।

डॉ. खुर्शीद अनवर
माँ और धरती माँ
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